खरीफ 2026 का सीजन किसानों के लिए कई नई चुनौतियां लेकर आ सकता है. मौसम वैज्ञानिकों द्वारा El Nino की चेतावनी, बढ़ती गर्मी, अनियमित वर्षा और खाद की संभावित किल्लत ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. ऐसे समय में सही खेती प्रबंधन और टिकाऊ कृषि तकनीकों को अपनाना बेहद जरूरी हो जाता है. इन्हीं महत्वपूर्ण मुद्दों पर कृषि जागरण की टीम ने ज़ायडेक्स ग्रुप के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर एवं वरिष्ठ जैविक कृषि विशेषज्ञ डॉ. शैलेन्द्र सिंह से विशेष बातचीत की.
इस बातचीत में उन्होंने El Nino के प्रभाव, मिट्टी की जल-धारण क्षमता, खाद संकट, जैविक उर्वरकों की भूमिका और फसलों को गर्मी एवं सूखे से बचाने के व्यावहारिक उपायों पर विस्तार से जानकारी दी. साथ ही किसानों के लिए चरणबद्ध समाधान भी साझा किए, जो खरीफ सीजन में बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं. पेश है बातचीत के संपादित अंश -
सवाल: इस साल किसानों को मौसम को लेकर क्या सावधान रहना चाहिए?
जवाब: देखिए, अमेरिकी मौसम एजेंसी NOAA ने इस साल El Nino की चेतावनी जारी की है. मई-जुलाई 2026 के बीच El Nino आने की 61-62% संभावना है और यह नवंबर-जनवरी 2026-27 तक बने रहने की 72-80% आशंका है. इसका सीधा असर यह है कि जून-जुलाई में बारिश ठीक-ठाक रहेगी, लेकिन अगस्त-सितंबर में कम और असमान हो सकती है. और यही वो समय है जब कपास में टिंडे बनते हैं, सोयाबीन-मूंगफली में फली भरती है, धान में दाना पड़ता है. इसके साथ गर्मी की लहरें भी बढ़ सकती हैं - यानी दोहरी मार. किसानों को पहले से तैयारी करनी होगी, नुकसान होने का इंतजार नहीं करना.
सवाल: बारिश कम हो तो फसल बचाने में मिट्टी का क्या रोल है?
जवाब: यह बहुत जरूरी बात है. मिट्टी में दो तरह का पानी होता है - एक जो नहर-नलकूप से आता है, और दूसरा जो बारिश के रूप में जमीन में समाता है और जडें खींचती हैं - इसे "ग्रीन वाटर" कहते हैं. हमारे देश की 60% से ज्यादा खरीफ फसल इसी पर निर्भर है. लेकिन सालों की रासायनिक खेती से मिट्टी कठोर हुई, जैविक कार्बन घटा - जिससे मिट्टी की पानी सोखने और रोकने की क्षमता 15-25% कम हो गई है. जब मिट्टी पोली और जीवंत होती है और जडें 2-3 फुट गहरी जाती हैं, तो फसल 10-15 दिन का सूखा भी झेल लेती है.
ज़ायटॉनिक टेक्नोलॉजी, जो बायोडिग्रेडेबल पॉलिमर के साथ माइकोराइजा और लाभकारी बैक्टीरिया का मिश्रण प्रदान करती है, मिट्टी की संरचना को बेहतर बनाती है और उसकी जल-धारण क्षमता बढ़ाती है. यही तकनीक सूखे की स्थिति में फसल को सुरक्षित रखने की मजबूत नींव तैयार करती है.
सवाल: इस साल खाद की किल्लत की खबरें हैं - किसानों पर क्या असर पड़ेगा?
जवाब: यह गंभीर है और इसके दो अलग पहलू हैं. पहला: सब्सिडी वाली खाद जैसे यूरिया की उपलब्धता. खरीफ में यूरिया की जरूरत 18-19.4 मिलियन टन है, लेकिन शुरुआती स्टॉक सिर्फ 5.5 मिलियन टन है. फरवरी 2026 में Hormuz Strait बंद होने से भारत के 50% से ज्यादा यूरिया आयात और LNG सप्लाई बाधित हुई, मार्च में घरेलू उत्पादन 30% घट गया. आयात कीमत जनवरी के $400-450 प्रति टन से बढ़कर अप्रैल में करीब $950 प्रति टन हो गई. सरकार ने रिटेल कीमत नहीं बढ़ाई, लेकिन फर्टीलाईजर सब्सिडी बिल 2 लाख करोड़ रुपये पार कर गया. जिले स्तर पर नतीजा यह होगा कि बुवाई के peak समय खाद देरी से या कम मात्रा में मिल सकती है.
सवाल: बिना सब्सिडी वाली खाद जैसे स्पेशलिटी फर्टिलाइजर्स का क्या हाल है?
जवाब: वहां समस्या उपलब्धता की नहीं, बल्कि बढ़ती कीमतों की है. वैश्विक बाजार में डीएपी (DAP) की कीमत 625 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 865 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है. वहीं अमोनिया और सल्फर, जो कॉम्प्लेक्स फर्टिलाइजर्स के प्रमुख कच्चे माल हैं, उनकी कीमतें भी 900 डॉलर प्रति टन से अधिक हो चुकी हैं. वॉटर-सॉल्युबल एनपीके, माइक्रोन्यूट्रिएंट्स और अन्य स्पेशलिटी फॉर्म्युलेशन्स पर किसी प्रकार की सब्सिडी नहीं मिलती, इसलिए उनकी लागत में 20 से 30 प्रतिशत तक की वृद्धि सीधे किसानों पर पड़ रही है.
इसके अलावा सबसे बड़ी चिंता यह है कि किसान द्वारा डाली गई यूरिया का फसल कितना उपयोग कर पाती है. हरित क्रांति के समय न्यूट्रिएंट यूज़ एफिशिएंसी लगभग 48 प्रतिशत थी, जो अब घटकर केवल 35 प्रतिशत रह गई है, जबकि अमेरिका में यह लगभग 53 प्रतिशत है. इसका मतलब है कि डाली गई करीब 65 प्रतिशत यूरिया या तो उड़ जाती है या पानी के साथ बह जाती है, जिससे महंगी खाद की भारी बर्बादी होती है. ऐसे में पॉलिमर-कोटेड स्लो रिलीज यूरिया जैसी आधुनिक तकनीक भविष्य में बेहतर समाधान साबित हो सकती है, क्योंकि यह फसल की आवश्यकता के अनुसार धीरे-धीरे पोषक तत्व उपलब्ध कराती है.
सवाल: तो जैविक उर्वरक इस साल कितने कारगर हो सकते हैं?
जवाब: इस वर्ष जैविक उर्वरक किसानों के लिए सबसे प्रभावी और व्यावहारिक समाधान बनकर उभर सकते हैं. ज़ायटॉनिक के जैसे पोटाश मोबिलाइजिंग बैक्टीरिया, जो ज़ायटॉनिक प्लेटफॉर्म पर आधारित हैं, मिट्टी में मौजूद बंद पड़े पोटाश को पूरे सीजन धीरे-धीरे फसल तक पहुंचाते हैं, जबकि रासायनिक एमओपी (MOP) डालने के 7-10 दिन बाद ही उसकी उपलब्धता कम हो जाती है.
इसी तरह ज़ायटॉनिक PROM+ एक फॉस्फेट-समृद्ध जैविक खाद है, जो ज़ायटॉनिक तकनीक से विकसित की गई है और डीएपी की 80 प्रतिशत से अधिक आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम है. इसके साथ नाइट्रोजन फिक्सिंग बैक्टीरिया, फॉस्फेट सॉल्युबिलाइज़र और जिंक मोबिलाइज़र मिलकर जड़ों के आसपास पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाते हैं.
ऐसी स्थिति में, जब रासायनिक खाद महंगी हो और समय पर उपलब्धता भी अनिश्चित हो, तब जैविक उर्वरक केवल एक विकल्प नहीं बल्कि किसानों के लिए आर्थिक रूप से आवश्यक समाधान बन जाते हैं.
सवाल: फसल खड़ी हो और अचानक गर्मी या सूखा पड़ जाए, तब किसान क्या करें?
जवाब: यही एल नीनो का सबसे खतरनाक प्रभाव होता है. जब फसल फूल या टिंडे/फली बनने की अवस्था में होती है और अचानक तेज गर्मी या सूखे की स्थिति बन जाती है, तब पौधा अपनी सुरक्षा के लिए पत्तियों के सूक्ष्म छिद्र यानी स्टोमाटा बंद कर लेता है. इससे प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की प्रक्रिया प्रभावित होती है, फूल झड़ने लगते हैं और टिंडे या फलियां ठीक से विकसित नहीं हो पातीं.
ज़ायटॉनिक सुरक्षा ऐसे ही तनावपूर्ण मौसम के लिए विकसित की गई तकनीक है. इसकी विशेष हाइग्रोस्कोपिक तकनीक वातावरण से नमी खींचकर पत्तियों पर एक सूक्ष्म परत बनाती है, जो तापमान को नियंत्रित रखने में मदद करती है और स्टोमाटा को सक्रिय बनाए रखती है. कपास, सोयाबीन, धान और मूंगफली जैसी फसलों में किए गए फील्ड परीक्षणों में देखा गया है कि इससे गर्मी के कारण होने वाला फूल एवं टिंडा झड़ना काफी कम होता है.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसका छिड़काव नुकसान होने के बाद नहीं, बल्कि गर्मी या सूखे की आशंका होते ही करना चाहिए, विशेषकर V3-V4 अवस्था, फूल आने के समय और टिंडे/फली बनने की अवस्था में.
सवाल: क्या El Nino के मौसम में कीट और रोगों का खतरा भी बढ़ जाता है?
जवाब: बिल्कुल, और यह समस्या अक्सर किसानों द्वारा नजरअंदाज कर दी जाती है. जब फसल गर्मी और सूखे के कारण कमजोर हो जाती है, तब रस चूसने वाले कीट जैसे थ्रिप्स, माहू और सफेद मक्खी के साथ-साथ इल्लियों का प्रकोप तेजी से बढ़ने लगता है. ऐसी परिस्थितियों में ज़ायटॉनिक नीम (2-3 मिली प्रति लीटर) काफी प्रभावी साबित होता है. इसकी माइक्रो-एन्कैप्सुलेटेड नीम तकनीक कीटों के अंडों को नष्ट करती है, उन्हें अंडे देने से रोकती है और साथ ही लाभदायक कीटों को सुरक्षित बनाए रखती है.
इसे ज़ायटॉनिक सुरक्षा के साथ टैंक मिक्स करके उपयोग करने से एक ही स्प्रे में फसल तनाव प्रबंधन और कीट नियंत्रण दोनों कार्य हो जाते हैं. इसके अलावा हर स्प्रे में ज़ायटॉनिक बायो-बूस्टर (1 मिली प्रति लीटर) मिलाने से सभी कृषि इनपुट्स की कार्यक्षमता और टिकाऊपन बढ़ता है.
विशेषज्ञों की सलाह है कि फसल की 40-50 दिन की अवस्था पर ज़ायटॉनिक बायो-पेस्टिसाइड फोलियर किट का निवारक छिड़काव अवश्य करें. इस किट में बैसिलस सब्टिलिस, ब्यूवेरिया बेसियाना, वर्टिसिलियम लेकानी और ज़ायटॉनिक नीम जैसे जैविक तत्व शामिल हैं, जो फसल को रोग और कीटों से सुरक्षित रखने में मदद करते हैं.
सवाल: फसल खड़ी हो और अचानक गर्मी या सूखा पड़ जाए, तब किसान क्या करें?
जवाब: यही एल नीनो का सबसे खतरनाक प्रभाव होता है. जब फसल फूल या टिंडे/फली बनने की अवस्था में होती है और अचानक तेज गर्मी या सूखे की स्थिति बन जाती है, तब पौधा अपनी सुरक्षा के लिए पत्तियों के सूक्ष्म छिद्र यानी स्टोमाटा बंद कर लेता है. इससे प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की प्रक्रिया प्रभावित होती है, फूल झड़ने लगते हैं और टिंडे या फलियां ठीक से विकसित नहीं हो पातीं.
ज़ायटॉनिक सुरक्षा ऐसे ही तनावपूर्ण मौसम के लिए विकसित की गई तकनीक है. इसकी विशेष हाइग्रोस्कोपिक तकनीक वातावरण से नमी खींचकर पत्तियों पर एक सूक्ष्म परत बनाती है, जो तापमान को नियंत्रित रखने में मदद करती है और स्टोमाटा को सक्रिय बनाए रखती है. कपास, सोयाबीन, धान और मूंगफली जैसी फसलों में किए गए फील्ड परीक्षणों में देखा गया है कि इससे गर्मी के कारण होने वाला फूल एवं टिंडा झड़ना काफी कम होता है.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसका छिड़काव नुकसान होने के बाद नहीं, बल्कि गर्मी या सूखे की आशंका होते ही करना चाहिए, विशेषकर V3-V4 अवस्था, फूल आने के समय और टिंडे/फली बनने की अवस्था में.
सवाल: क्या El Nino के मौसम में कीट और रोगों का खतरा भी बढ़ जाता है?
जवाब: बिल्कुल, और यह समस्या अक्सर किसानों द्वारा नजरअंदाज कर दी जाती है. जब फसल गर्मी और सूखे के कारण कमजोर हो जाती है, तब रस चूसने वाले कीट जैसे थ्रिप्स, माहू और सफेद मक्खी के साथ-साथ इल्लियों का प्रकोप तेजी से बढ़ने लगता है. ऐसी परिस्थितियों में ज़ायटॉनिक नीम (2-3 मिली प्रति लीटर) काफी प्रभावी साबित होता है. इसकी माइक्रो-एन्कैप्सुलेटेड नीम तकनीक कीटों के अंडों को नष्ट करती है, उन्हें अंडे देने से रोकती है और साथ ही लाभदायक कीटों को सुरक्षित बनाए रखती है.
इसे ज़ायटॉनिक सुरक्षा के साथ टैंक मिक्स करके उपयोग करने से एक ही स्प्रे में फसल तनाव प्रबंधन और कीट नियंत्रण दोनों कार्य हो जाते हैं. इसके अलावा हर स्प्रे में ज़ायटॉनिक बायो-बूस्टर (1 मिली प्रति लीटर) मिलाने से सभी कृषि इनपुट्स की कार्यक्षमता और टिकाऊपन बढ़ता है.
विशेषज्ञों की सलाह है कि फसल की 40-50 दिन की अवस्था पर ज़ायटॉनिक बायो-पेस्टिसाइड फोलियर किट का निवारक छिड़काव अवश्य करें. इस किट में बैसिलस सब्टिलिस, ब्यूवेरिया बेसियाना, वर्टिसिलियम लेकानी और ज़ायटॉनिक नीम जैसे जैविक तत्व शामिल हैं, जो फसल को रोग और कीटों से सुरक्षित रखने में मदद करते हैं.
सवाल: अंत में किसान भाइयों के लिए चरणबद्ध सलाह क्या देंगे?
जवाब: किसानों के लिए चार आसान और प्रभावी कदम सबसे महत्वपूर्ण हैं-
पहला - बुवाई से पहले बेसल डोज के रूप में ज़ायटॉनिक मिनी किट यानी ज़ायटॉनिक एम, ज़ायटॉनिक एनपीके और ज़ायटॉनिक जिंक का प्रयोग करें. यह पॉलिमर आधारित तकनीक मिट्टी को नरम और भुरभुरी बनाती है, नमी को लंबे समय तक बनाए रखती है और जड़ों को गहराई तक विकसित होने में मदद करती है. यदि डीएपी की कमी हो तो ज़ायटॉनिक PROM+ का उपयोग करें. साथ ही ज़ायटॉनिक बायो-पेस्टिसाइड सॉइल किट, जिसमें ट्राइकोडर्मा, मेटाराइजियम, पैसिलोमाइसिस और ज़ायटॉनिक नीम शामिल हैं, का प्रयोग कर जड़ों को मिट्टी जनित रोगों, रूट ग्रब और निमेटोड से सुरक्षित रखें.
दूसरा - पूरे सीजन पोटाश की उपलब्धता बनाए रखने के लिए ज़ायटॉनिक के का उपयोग करें और उर्वरकों की मात्रा मौसम की नमी के अनुसार विभाजित करके दें, न कि तय कैलेंडर के अनुसार.
तीसरा - यदि 7 से 10 दिनों तक सूखे या अत्यधिक गर्मी की संभावना दिखाई दे, तो तुरंत ज़ायटॉनिक सुरक्षा, ज़ायटॉनिक नीम और ज़ायटॉनिक बायो-बूस्टर का छिड़काव करें.
चौथा - फसल की 40-50 दिन की अवस्था पर ज़ायटॉनिक बायो-पेस्टिसाइड फोलियर किट का निवारक छिड़काव करें.
एल नीनो जैसे चुनौतीपूर्ण वर्ष में अधिक खर्च करने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि सही समय पर सही कृषि इनपुट का उपयोग ही किसानों की सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है.