उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले के कल्यान नगर गांव के प्रगतिशील किसान हिमांशु दुबे ने खेती में बदलाव की शुरुआत एक छोटे से प्रयोग से की, लेकिन इसके परिणामों ने उन्हें अपनी खेती का तरीका बदलने के लिए प्रेरित कर दिया. पहले वे पूरी तरह रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर होकर खेती करते थे. इससे खेती की लागत अधिक आती थी और खेतों में अपेक्षित परिणाम भी नहीं मिल पाते थे. साथ ही सिंचाई के लिए अधिक पानी की जरूरत पड़ती थी. इसके बाद उन्हें जायडेक्स कंपनी की जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित उत्पादों- जायटॉनिक एनपीके, जायटॉनिक किट, जायटॉनिक गोधन, जायटॉनिक जिंक, जायटॉनिक पोटाश, जायटॉनिक-एम और जायटॉनिक सुरक्षा के बारे में जानकारी मिली.
उन्होंने सबसे पहले जायटॉनिक गोधन को गोबर के साथ मिलाकर प्रयोग किया. खेत में इसके परिणाम अच्छे देखने को मिले तो उन्होंने धीरे-धीरे इन उत्पादों का इस्तेमाल बढ़ा दिया. आज वे रासायनिक और जैविक उत्पादों का लगभग 50-50 अनुपात में उपयोग कर रहे हैं. किसान के अनुसार, जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित उत्पादों के इस्तेमाल से प्रति एकड़ लागत करीब 15 हजार रुपये से घटकर लगभग 10 हजार रुपये रह गई है, जमीन भुरभुरी हुई है, पानी की जरूरत कम हुई है और उत्पादन में भी बढ़ोतरी देखने को मिली है. ऐसे में आइए जानते हैं हिमांशु दुबे की खेती में आए इस बदलाव और उनकी सफलता की पूरी कहानी-
खेती के साथ जुड़ा है परिवार
प्रगतिशील किसान हिमांशु दुबे उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले के कल्यान नगर गांव के रहने वाले हैं. उनका परिवार लंबे समय से खेती से जुड़ा हुआ है. खेती उनके लिए सिर्फ आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है. वे अपनी जमीन पर अलग-अलग मौसम के अनुसार कई फसलों की खेती करते हैं. हालांकि, उनके खेतों में सबसे ज्यादा रकबा गन्ने का है. इसके अलावा वे धान, गेहूं और सरसों जैसी फसलों की भी खेती करते हैं.
हिमांशु बताते हैं कि उनके पास लगभग 10 हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की खेती है. गन्ना उनकी प्रमुख फसल है और इसी वजह से खेती में लागत, पानी और उत्पादन जैसे विषय उनके लिए हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं.
गन्ने के साथ धान, गेहूं और सरसों की भी खेती
हिमांशु दुबे मुख्य रूप से गन्ने की खेती करते हैं. इसके अलावा खरीफ और रबी सीजन के अनुसार धान, गेहूं और सरसों जैसी फसलों की खेती भी करते हैं. उनका मानना है कि किसान को अपनी जमीन और मौसम के अनुसार अलग-अलग फसलों का चयन करना चाहिए. इससे किसी एक फसल पर निर्भरता कम होती है और खेती से आय के अलग-अलग अवसर मिलते हैं.
हालांकि, गन्ने का रकबा उनके यहां सबसे अधिक है, इसलिए गन्ने में उत्पादन बढ़ाना और लागत कम करना उनकी प्राथमिकता रही है.
पहले पूरी तरह रासायनिक खेती पर था भरोसा
हिमांशु दुबे बताते हैं कि पहले वे मुख्य रूप से रासायनिक उर्वरकों के बारे में ही जानते थे. इसलिए उनकी खेती भी पूरी तरह रासायनिक उर्वरकों पर आधारित थी. उनका कहना है कि उस समय उन्हें लगता था कि अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरक डालने से ही फसल का उत्पादन अच्छा मिलेगा. लेकिन समय के साथ उन्होंने महसूस किया कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है.
रासायनिक उर्वरकों पर खर्च अधिक होने के बावजूद खेतों में उन्हें उतने अच्छे परिणाम नहीं मिल पा रहे थे, जितनी उम्मीद रहती थी. इसके साथ ही सिंचाई के लिए भी अधिक पानी की जरूरत पड़ती थी. यही वजह रही कि उन्होंने खेती में कुछ नया करने के बारे में सोचना शुरू किया.
जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित उत्पादों से हुआ परिचय
इसी दौरान हिमांशु दुबे को जायडेक्स कंपनी की जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित उत्पादों के बारे में जानकारी मिली. इनमें जायटॉनिक NPK, जायटॉनिक किट, जायटॉनिक गोधन, जायटॉनिक जिंक, जायटॉनिक पोटाश, जायटॉनिक-एम और जायटॉनिक सुरक्षा जैसे उत्पाद शामिल हैं. हिमांशु बताते हैं कि शुरुआत में उन्होंने सभी उत्पादों को एक साथ बड़े स्तर पर इस्तेमाल नहीं किया. उन्होंने पहले जायटॉनिक गोधन का प्रयोग किया. उन्होंने जायटॉनिक गोधन को गोबर के साथ मिलाकर इस्तेमाल किया और इसके बाद खेत में बदलाव को देखा.
छोटे प्रयोग से शुरू हुई बड़ी बदलाव की कहानी
हिमांशु दुबे के लिए यह शुरुआत एक तरह का प्रयोग था. वे पहले पूरी तरह रासायनिक खेती करते थे, इसलिए जैविक उत्पादों को अपनाना उनके लिए एक जोखिम भी था. लेकिन उनका कहना है कि खेती में अगर कुछ नया करना है तो किसान को रिस्क लेना ही पड़ता है. उन्होंने पहले जायटॉनिक गोधन का इस्तेमाल किया. जब उन्हें खेत में अच्छे परिणाम देखने को मिले तो उनका भरोसा बढ़ा. इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे अन्य जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित उत्पादों का भी उपयोग शुरू किया.
आज वे अपनी खेती में रासायनिक और जैविक उत्पादों का लगभग 50-50 प्रतिशत अनुपात में इस्तेमाल कर रहे हैं.
लागत में आई करीब 5 हजार रुपये प्रति एकड़ की कमी
हिमांशु दुबे के अनुसार, जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित उत्पादों को खेती में शामिल करने के बाद सबसे बड़ा फायदा खेती की लागत में कमी के रूप में मिला.
वे बताते हैं कि पहले उनकी खेती में प्रति एकड़ लगभग 15 हजार रुपये की लागत आती थी. अब यह लागत घटकर करीब 10 हजार रुपये प्रति एकड़ रह गई है. यानी उन्हें लगभग 5 हजार रुपये प्रति एकड़ की बचत हो रही है. किसान के लिए यह बचत काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि खेती में लागत कम होने का सीधा असर उसके मुनाफे पर पड़ता है.
हिमांशु कहते हैं कि आज खेती में खाद, दवा, पानी, मजदूरी और अन्य इनपुट की लागत लगातार बढ़ रही है. ऐसे में यदि किसान उत्पादन को बनाए रखते हुए लागत कम कर सके, तो उसकी आमदनी बेहतर हो सकती है.
प्रति एकड़ उत्पादन में भी बढ़ोतरी का दावा
हिमांशु दुबे बताते हैं कि लागत कम होने के साथ-साथ उन्हें उत्पादन में भी अच्छा बदलाव देखने को मिला है. उनके अनुसार, जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित उत्पादों के इस्तेमाल से प्रति एकड़ लगभग 50 क्विंटल तक उत्पादन की वृद्धि देखने को मिली है. वे बताते हैं कि इसका असर विशेष रूप से खेत की स्थिति और फसल की बढ़वार में दिखाई देता है. उनका कहना है कि पहले जहां उत्पादन और लागत दोनों चिंता का विषय थे, वहीं अब उन्हें खेती में बेहतर संतुलन दिखाई देता है.
मिट्टी हुई अधिक भुरभुरी
हिमांशु दुबे के अनुसार, खेती में बदलाव का एक महत्वपूर्ण असर उनकी जमीन की स्थिति पर भी पड़ा है. वे बताते हैं कि अब खेत की मिट्टी पहले की तुलना में अधिक भुरभुरी रहती है. मिट्टी की यह स्थिति खेत में काम करने और फसल की जड़ों के विकास के लिए बेहतर महसूस होती है.
सिंचाई के लिए भी कम पानी की जरूरत
हिमांशु दुबे ने खेती में एक और महत्वपूर्ण बदलाव महसूस किया है. उनके अनुसार, जैविक उत्पादों का इस्तेमाल शुरू करने के बाद खेत में पहले की तुलना में कम पानी की जरूरत पड़ रही है. वे बताते हैं कि पहले फसल को बार-बार पानी देना पड़ता था. लेकिन अब खेत की मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है और सिंचाई की जरूरत कुछ कम हुई है. किसान के लिए पानी की बचत का मतलब सिंचाई की लागत में भी कमी है. इसके अलावा, पानी की बचत आज के समय में पर्यावरण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है.
गन्ने के साथ गेहूं में भी किया इस्तेमाल
हिमांशु दुबे बताते हैं कि उन्होंने जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित उत्पादों का प्रयोग केवल गन्ने तक सीमित नहीं रखा है. वे गन्ने के साथ गेहूं में भी इन उत्पादों का इस्तेमाल कर चुके हैं. उनका कहना है कि किसान को किसी एक फसल तक सीमित रहने के बजाय अलग-अलग फसलों में तकनीक के परिणामों को समझना चाहिए. उनके अनुभव में गन्ने के साथ गेहूं में भी इन उत्पादों के इस्तेमाल से सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं.
धीरे-धीरे बढ़ाया जैविक उत्पादों का इस्तेमाल
हिमांशु दुबे का मानना है कि खेती में किसी भी बदलाव को अचानक लागू करने के बजाय धीरे-धीरे आगे बढ़ना बेहतर है. उन्होंने भी शुरुआत में पूरी खेती में बदलाव नहीं किया. पहले उन्होंने सीमित स्तर पर जायटॉनिक गोधन का प्रयोग किया. परिणाम देखने के बाद उन्होंने इसका इस्तेमाल बढ़ाया और फिर अन्य जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित उत्पादों को भी अपनी खेती में शामिल किया. आज वे लगभग 50 प्रतिशत रासायनिक और 50 प्रतिशत जैविक उत्पादों के मॉडल पर खेती कर रहे हैं.
भविष्य में पूरी तरह जैविक खेती की इच्छा
हिमांशु दुबे बताते हैं कि फिलहाल वे संतुलित तरीके से खेती कर रहे हैं. यानी रासायनिक और जैविक उत्पादों का लगभग बराबर अनुपात में इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन उनका लक्ष्य भविष्य में पूरी तरह जैविक खेती की ओर बढ़ना है.