उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के राजगढ़ गांव के किसान अमरजीत सिंह पिछले करीब 10 वर्षों से खेती कर रहे हैं. परिवार में पहले से खेती होती रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अमरजीत ने खेती के तौर-तरीकों में बदलाव करना शुरू किया. खासकर, उन्होंने रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम करके जैविक उत्पादों का इस्तेमाल बढ़ाने पर जोर दिया. इसी बदलाव के दौरान उन्होंने जायडेक्स कंपनी की जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित जैविक उत्पाद का इस्तेमाल शुरू किया.
अमरजीत सिंह के अनुसार, जायटॉनिक उत्पाद के इस्तेमाल से उन्हें कई फायदे देखने को मिले. उनका कहना है कि इससे यूरिया की लागत कम करने, खेत में नमी बनाए रखने, मिट्टी को भुरभुरा बनाने और फसल में फंगस जैसी समस्याओं को कम करने में मदद मिली. किसान के मुताबिक, पहले जहां गेहूं की उपज करीब 20-22 क्विंटल प्रति एकड़ थी, वहीं अब जैविक और रासायनिक दोनों तरीकों को मिलाकर खेती करने पर उत्पादन करीब 23-24 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच गया है.
अमरजीत की कहानी इस बात पर केंद्रित है कि किस तरह एक किसान धीरे-धीरे अपनी खेती में बदलाव करते हुए जैविक उत्पादों को शामिल कर रहा है और मिट्टी की सेहत, लागत और उत्पादन के बीच बेहतर संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में आइए उनकी सफलता की कहानी के बारे में विस्तार से जानते हैं-
50 एकड़ में करते हैं खेती
लखीमपुर खीरी के राजगढ़ गांव के रहने वाले अमरजीत सिंह के पास करीब 30 एकड़ जमीन है. वह मुख्य रूप से गेहूं, गन्ना और धान की खेती करते हैं. अमरजीत के लिए खेती केवल आय का साधन नहीं है, बल्कि परिवार से जुड़ा हुआ पारंपरिक काम भी है. हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने खेती में नए प्रयोग शुरू किए और आधुनिक कृषि तकनीकों के साथ जैविक उत्पादों को भी अपनाया.
पहले पूरी तरह रासायनिक खेती पर था जोर
अमरजीत बताते हैं कि कुछ साल पहले तक उनकी खेती में रासायनिक उत्पादों का इस्तेमाल ज्यादा होता था. उस समय उन्हें फसल में फंगस और दूसरी बीमारियों की समस्या देखने को मिलती थी. इसके अलावा, यूरिया की खपत भी अधिक होती थी.
किसान के अनुसार, रासायनिक खेती में लागत भी ज्यादा आती थी. इसलिए उन्होंने धीरे-धीरे खेती के तरीके में बदलाव करने का फैसला किया.
पिछले करीब तीन वर्षों से उन्होंने जैविक खेती से जुड़े प्रयोग शुरू किए. हालांकि, वह अभी पूरी तरह से रासायनिक खेती से बाहर नहीं आए हैं. वर्तमान में वह जैविक और रासायनिक दोनों तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन उनके खेतों में जैविक उत्पादों की हिस्सेदारी बढ़ती जा रही है.
अमरजीत के अनुसार, अब उनकी खेती में करीब 70 प्रतिशत जैविक और 30 प्रतिशत रासायनिक इनपुट का इस्तेमाल होता है.
जायडेक्स की जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित उत्पाद से हुई शुरुआत
जैविक उत्पादों के इस्तेमाल की शुरुआत अमरजीत ने किसी बड़े प्लान के तहत नहीं की थी. उनके गांव और आसपास कंपनियों के प्रतिनिधि किसानों को नए उत्पादों के बारे में जानकारी देने के लिए आते रहते थे. इसी दौरान उन्हें जायडेक्स के जायटॉनिक उत्पाद के बारे में जानकारी मिली.
कंपनी की ओर से उन्हें उत्पाद का डेमो दिया गया. अमरजीत ने पहले इसे अपने खेत में इस्तेमाल करके परिणाम देखने का फैसला किया.
किसान बताते हैं कि डेमो के दौरान उन्हें अपने खेत में अच्छा परिणाम दिखाई दिया. इसके बाद उन्होंने गेहूं में इसका इस्तेमाल शुरू किया और धीरे-धीरे धान तथा गन्ने की फसल में भी इसका प्रयोग किया.
अमरजीत के अनुसार, अब वह अपने कुल खेती क्षेत्र में जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित उत्पादों का इस्तेमाल कर रहे हैं.
गेहूं में मिला खास अनुभव
अमरजीत के अनुसार, उनके खेत की मिट्टी का एक हिस्सा ऐसा है जहां पानी देने के बाद गेहूं की फसल पहले बैठ जाती थी और पौधों में पीलापन दिखाई देता था. इस स्थिति को लेकर वह काफी समय से परेशान थे.
उन्होंने ऐसे ही खेत में जायटॉनिक उत्पाद का इस्तेमाल किया. किसान का कहना है कि उत्पाद के इस्तेमाल के बाद जब उन्होंने गेहूं की फसल में पानी लगाया तो उन्हें पहले की तुलना में बेहतर परिणाम दिखाई दिया.
धान और गन्ने में भी किया इस्तेमाल
गेहूं में प्रयोग के बाद अमरजीत ने जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित उत्पाद का इस्तेमाल धान और गन्ने की फसल में भी शुरू किया.
किसान का कहना है कि उन्हें इन फसलों में भी अच्छा अनुभव मिला. इसी वजह से अब वह अपने खेतों में इसका इस्तेमाल लगातार कर रहे हैं.
अमरजीत के अनुसार, किसी भी नए कृषि उत्पाद को बड़े क्षेत्र में इस्तेमाल करने से पहले उसका परिणाम देखना जरूरी है. उन्होंने भी पहले डेमो के माध्यम से इसे आजमाया और परिणाम से संतुष्ट होने के बाद अपने अधिक क्षेत्र में इसका इस्तेमाल शुरू किया.
यूरिया की लागत में कमी का दावा
खेती में लगातार बढ़ती लागत किसानों के लिए बड़ी चुनौती है. खासकर खाद और अन्य कृषि इनपुट पर होने वाला खर्च किसान की कुल लागत को प्रभावित करता है.
अमरजीत बताते हैं कि जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित जैविक उत्पाद का इस्तेमाल करने के बाद उनकी यूरिया पर होने वाली लागत कम हुई है.
उनके अनुसार, पहले खेत में यूरिया की जरूरत अधिक पड़ती थी, जबकि अब वह इसकी मात्रा को कम करने की कोशिश कर रहे हैं. जैविक उत्पादों की मात्रा बढ़ने के साथ रासायनिक खाद पर निर्भरता भी धीरे-धीरे कम हुई है.
मिट्टी को भुरभुरा बनाने में मदद
लगातार खेती और भारी मशीनों के इस्तेमाल से कई खेतों की मिट्टी सख्त हो जाती है. ऐसी मिट्टी में जड़ों को फैलने में परेशानी हो सकती है और पानी के प्रबंधन में भी दिक्कत आ सकती है.
अमरजीत का कहना है कि जायटॉनिक उत्पाद के इस्तेमाल से उन्हें मिट्टी की संरचना में भी बदलाव देखने को मिला. उनके अनुसार, उत्पाद खेत की ज्यादा सख्त मिट्टी को भुरभुरा बनाने में मदद करता है.
पानी की जरूरत भी कम होने का दावा
अमरजीत के मुताबिक, जायटॉनिक उत्पाद के इस्तेमाल से खेत में नमी बनी रहने में मदद मिलती है. उनका कहना है कि इसके कारण उन्हें फसल में पहले की तुलना में पानी कम लगाने की जरूरत महसूस हुई.
किसान के अनुसार, पानी की बचत खेती के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि सिंचाई पर होने वाला खर्च भी किसानों की लागत को प्रभावित करता है.
अगर खेत में नमी लंबे समय तक बनी रहे तो किसान को बार-बार सिंचाई करने की जरूरत कम हो सकती है. हालांकि, वास्तविक सिंचाई की जरूरत मिट्टी, मौसम, फसल की अवस्था और क्षेत्र की परिस्थितियों पर निर्भर करती है.
गेहूं की उपज में भी बढ़ोतरी
अमरजीत के खेती के अनुभव में उत्पादन में भी बदलाव देखने को मिला है. वह बताते हैं कि जब वह मुख्य रूप से रासायनिक तरीके से खेती करते थे, तब गेहूं की उपज करीब 20 से 22 क्विंटल प्रति एकड़ रहती थी.
अब जैविक और रासायनिक दोनों तरीकों को मिलाकर खेती करने के बाद उनके अनुसार गेहूं की उपज करीब 23 से 24 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच गई है.
यानी किसान के अनुभव के अनुसार, उत्पादन में करीब 2 क्विंटल प्रति एकड़ तक की बढ़ोतरी हुई है.
अमरजीत इस बदलाव को बेहतर फसल प्रबंधन और जैविक उत्पादों के इस्तेमाल से जोड़ते हैं. हालांकि, किसी भी फसल की उपज पर मौसम, बीज, मिट्टी, सिंचाई, खाद, कीट-रोग और खेती की तकनीक जैसे कई कारकों का प्रभाव पड़ता है.
खेती की लागत में 3-4 हजार रुपये का अंतर
अमरजीत के अनुसार, रासायनिक खेती के समय उनकी लागत ज्यादा आती थी. जैविक उत्पादों को खेती में शामिल करने के बाद उन्होंने लागत में भी कमी महसूस की है.
किसान का कहना है कि अब उनकी खेती की लागत पहले की तुलना में करीब 3 से 4 हजार रुपये प्रति एकड़ तक कम हुई है.
उनके मुताबिक, इसकी एक वजह यूरिया समेत कुछ रासायनिक इनपुट की मात्रा में कमी आना है. साथ ही, फसल में समस्याएं कम होने से अतिरिक्त खर्च भी कम हो सकता है.
दूसरे किसानों को भी बताते हैं तरीका
अमरजीत खुद एक युवा किसान हैं और बड़े क्षेत्र में खेती करते हैं. अपने अनुभव से प्रभावित होकर वह दूसरे किसानों को भी जैविक उत्पादों के बारे में जानकारी देते हैं.
उनका कहना है कि जब भी उन्हें दूसरे किसान मिलते हैं तो वह अपने खेत के अनुभव उनके साथ साझा करते हैं. उनके मुताबिक, कुछ किसानों ने उनकी सलाह के बाद इन उत्पादों का इस्तेमाल शुरू भी किया है.
अमरजीत मानते हैं कि किसान को किसी भी तकनीक को अपनाने से पहले अपने खेत में उसका परिणाम देखना चाहिए. अगर परिणाम अच्छा मिलता है तो धीरे-धीरे उसका क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है.
आगे जैविक खेती बढ़ाने की तैयारी
अमरजीत अब अपनी खेती में जैविक उत्पादों का इस्तेमाल और बढ़ाना चाहते हैं. उनका कहना है कि फिलहाल उनके खेतों में जैविक इनपुट की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है और आने वाले समय में इसे और बढ़ाने की योजना है.
उनका मानना है कि रासायनिक खेती पर पूरी तरह निर्भर रहने की बजाय किसानों को धीरे-धीरे जैविक खेती की तरफ बढ़ना चाहिए.
अमरजीत के अनुसार, लगातार रासायनिक इनपुट के इस्तेमाल से मिट्टी की स्थिति प्रभावित हो सकती है. इसलिए किसानों को अभी से मिट्टी की सेहत पर ध्यान देना चाहिए.