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Updated on: 2 February, 2026 12:06 AM IST
डॉ. राजाराम त्रिपाठी, राष्ट्रीय संयोजक, अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा)

वर्तमान में कृषि एवं कृषक कल्याण मंत्रालय के लिए लगभग ₹1.62 लाख करोड़ प्रावधानित करने की बात कही गई है है. यह सुनने में बड़ा लगता है, पर जब इसे देश की खेती की वास्तविक तस्वीर से जोड़कर देखा जाए तो यह राशि छोटी पड़ जाती है.

देश की लगभग 60 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, जबकि कुल केंद्रीय बजट में खेती का हिस्सा मुश्किल से 3.3 प्रतिशत के आसपास सिमट जाता है. सवाल सीधा है, जो आधा भारत को रोजगार देता है और पूरे भारत को भोजन देता है, उसके हिस्से में बजट का इतना छोटा हिस्सा क्यों?

किसानों की सबसे बड़ी मांग थी 'न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी' MSP. सरकारी समितियों और नीति आयोग की रिपोर्टें स्वयं स्वीकार करती हैं कि उचित मूल्य न मिलने के कारण किसानों को हर वर्ष ₹5 से 7 लाख करोड़ तक का नुकसान होता है. इसके बावजूद बजट इस मुद्दे पर चुप है. जब किसान घाटे की खेती करे और बाजार मुनाफा बटोरे, तो इसे सुधार नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता कहा जाएगा.

जलवायु परिवर्तन अब खेती की सबसे बड़ी आपदा बन चुका है. असमय वर्षा, ओलावृष्टि, सूखा और बढ़ता तापमान हर वर्ष उत्पादन को 10 से 20 प्रतिशत तक प्रभावित कर रहा है. इसके बावजूद फसल बीमा योजना आज भी सीमित दायरे, विलंबित भुगतान और जटिल प्रक्रियाओं में उलझी है. जलवायु जोखिम के लिए कोई समर्पित राष्ट्रीय सुरक्षा कोष इस बजट में नहीं दिखता.

बागवानी क्षेत्र का हाल और चिंताजनक है. देश में कोल्ड स्टोरेज व भंडारण क्षमता कुल उत्पादन की मात्र 10 प्रतिशत है, जिसके कारण हर वर्ष 25 से 30 प्रतिशत फल-सब्ज़ियां नष्ट हो जाती हैं. किसान मेहनत करता है, नुकसान व्यवस्था करती है.

यह बजट खेती को समुचित सहारा नहीं, धैर्य का उपदेश देता है. यदि MSP गारंटी, सिंचाई ,जलवायु बीमा, भंडारण-प्रसंस्करण ढांचा और लागत आधारित मूल्य नीति लागू होती, तो यह बजट ऐतिहासिक बन सकता था. फिलहाल किसान और खेत अभी भी इंतजार में हैं.

लेखक: डॉ. राजाराम त्रिपाठी, राष्ट्रीय संयोजक, अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा)

English Summary: union budget 2026 agriculture farmers msp climate insurance storage issues
Published on: 02 February 2026, 12:08 AM IST

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