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ट्रैक्टर-ट्रॉली पलटने से किसानों मौतें, युद्धों के शहीदों से भी ज्यादा, जबकि साधारण तकनीकी सुधारों से रोकी जा सकती हैं यह मौतें.
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भारत के 84% किसान छोटे 4 एकड़ से कम, फिर भी बड़े ट्रैक्टरों की होड़ आर्थिक आत्मघात बन चुकी है.
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देश में हर वर्ष लगभग 8 से 9 लाख ट्रैक्टर बिकते हैं, जबकि वास्तविक आवश्यकता इससे बहुत कम है.
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50 से 60 HP ट्रैक्टर छोटे खेतों में 2 से 3 गुना अधिक डीजल खर्च करते हैं, जिससे राष्ट्रीय आयात बोझ बढ़ता है.
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ट्रैक्टर आधारित ऋण मॉडल ने देश भर के बहुसंख्य किसानों को डिफॉल्टर बनाकर जमीन नीलामी तक पहुंचाया है.
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पावर टिलर और पावर वीडर की नीतियों में कृत्रिम अनावश्यक सीमाएं लगाकर किसानों को अनुपयोगी व महंगे विकल्पों की ओर धकेला जा रहा है.
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पावर टिलर के लिए न्यूनतम 12 HP आवश्यक, जबकि पावर वीडर में अधिकतम सीमा तय करना अव्यावहारिक और किसान विरोधी है.
भारत की खेती ने अकाल, सूखा, बाढ़ और कीटों के हमले जैसे अनेक संकट देखे हैं. लेकिन यदि निष्पक्ष होकर पूछा जाए कि इस देश के किसान और खेती को सबसे गहरी चोट किसने दी, तो उत्तर आपको असहज कर देगा. वह है ट्रैक्टर! जी हां सचमुच.
वही ट्रैक्टर जिसे “धरतीपुत्र”, “भीम”, “अर्जुन”, सिकंदर, टाइगर, “सरपंच” जैसे आकर्षक नामों के साथ ताकत और प्रतिष्ठा का प्रतीक बनाकर बेचा गया. समाचार पत्रों के उनके फुल पेज विज्ञापन बहुत ही आकर्षक होते हैं.
देश में आज अनुमानित रूप से 1 करोड़ से अधिक ट्रैक्टर चल रहे हैं और हर साल लगभग 8 से 9 लाख नए ट्रैक्टर बिक रहे हैं. यह दुनिया का सबसे बड़ा ट्रैक्टर बाजार है. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वास्तविक जरूरत का परिणाम है या एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दबाव का परिणाम?
भारत में 84% किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास 4 एकड़ से भी कम भूमि है. ऐसे खेतों के लिए 50 से 60 हॉर्सपावर का ट्रैक्टर लेना आर्थिक विवेक नहीं, बल्कि दिखावे की मजबूरी बन चुका है. गांवों में यह खेती का नहीं, प्रतिष्ठा का प्रश्न, पगड़ी का सवाल बन गया है.
यदि एक किसान ने 50 HP का ट्रैक्टर लिया, तो उसका पड़ोसी 60 HP का लेगा. परिणाम यह कि जहां पूरे गांव की खेती 4 मध्यम श्रेणी के ट्रैक्टर से हो सकती थी, वहां 20 से 25 बाहुबली ट्रैक्टर बेकार खड़े हैं.
ज्यादातर ट्रैक्टर साल में मुश्किल से 300 से 400 घंटे ही चल पाता है, जबकि बैंक ऋण मॉडल में इसे 1200 से 1500 घंटे चलने का अनुमान दिखाया जाता है. यही अंतर किसान को धीरे-धीरे कर्ज के जाल में धकेल देता है.
एक 50 से 60 HP ट्रैक्टर औसतन 4 से 5 लीटर डीजल प्रति घंटा पीता है. यदि देश में 1 करोड़ ट्रैक्टर हैं और प्रत्येक साल औसतन 300 घंटे भी चलते हैं, तो कुल खपत लगभग 1200 से 1500 करोड़ लीटर डीजल बैठती है. यह केवल खेत का सवाल नहीं, देश की ऊर्जा सुरक्षा का प्रश्न है.
हमने स्वयं देखा है कि राजस्थान से अनेक ट्रैक्टर मालिक अपने ट्रैक्टर लेकर बस्तर और छत्तीसगढ़ में 3 से 4 महीनों के लिए आते हैं. उनका कहना साफ होता है कि यदि वे लगातार काम न करें, तो ट्रैक्टर की किस्त नहीं चुका पाएंगे. 12 से 14 घंटे मशीन चलाना उनके लिए विकल्प नहीं, मजबूरी है. यह मेहनत की कहानी कम और कर्ज की कहानी ज्यादा है.
इसी कर्ज की कहानी का एक भयावह अध्याय पंजाब के एक गांव शेखूपुर में सामने आया था. लगभग डेढ़ दशक पहले खबर छपी कि “शेखूपुर गांव बिकाऊ है”. कारण यह नहीं था कि गांव छोड़ दिया गया था, बल्कि इसलिए कि गांव के लगभग सभी किसानों ने ट्रैक्टर, ट्रॉली और कृषि यंत्रों के लिए बैंक से ऋण लिया था. धीरे-धीरे कर्ज इतना बढ़ गया कि पूरी की पूरी जमीन नीलामी पर चढ़ गई.
दुर्भाग्य यह है कि आज भी देश में न जाने कितने “शेखूपुरा” चुपचाप बन रहे हैं.
ट्रैक्टर खरीद के साथ किसान को एक सपना बेचा जाता है. अधिक उत्पादन, किराये से आय और आर्थिक समृद्धि का सपना.
किसान को सब्जबाग दिखाते हुए ट्रैक्टर का सेल्समेन प्रायः एक डायलॉग जरूर दोहराता है - किसान भाई भले आपका सगा बेटा अपनी पत्नी के बहकावे में आकर आपको अपनी कमाई का हिस्सा ना दे, लेकिन यह ट्रैक्टर आपके आज्ञाकारी पुत्र की तरह हर महीने पैसे कमा कर देगा.
खेती और बाजार के तमाम जोखिमों से जूझते किसान को जब ट्रैक्टर को किराये पर चलाकर नियमित आय का भरोसा दिलाया जाता है, तो वह मित्रों से कर्ज लेकर, यहां तक कि पत्नी के जेवर बेचकर भी मार्जिन मनी की व्यवस्था करता है. एक बार मार्जिन व्यवस्था हो गई तो आगे का काम ट्रैक्टर बेचने वालों के लिए बहुत आसान होता है. क्योंकि बैंको फाइनेंस कंपनियों के साथ ट्रैक्टर कंपनियों का पहले से ही गठजोड़ रहता है. मनमाना ब्याज लगाया जाता है. डॉक्यूमेंटेशन खर्च तथा अन्य कई खर्चों को मनमानी तरीके से कर्ज खाते में जोड़ दिया जाता है.और अब दो-चार दिनों के भीतर ही जरूरी तथा गैर जरूरी कृषि यंत्रों के साथ ट्रैक्टर और ट्राली ले जाकर किसान के दरवाजे पर खड़ा कर दिया जाता है.
लेकिन जब एक ही गांव में जरूरत से कई गुना अधिक ट्रैक्टर हो जाते हैं, तो किराये का काम समाप्त हो जाता है. आय नहीं बढ़ती, लेकिन कर्ज और ब्याज सुरसा के मुख की तरह दिन प्रतिदिन बढ़ते जाते हैं. ट्रैक्टर का कर्ज अब एनपीए हो जाता है, और किसान घोषित तौर पर डिफाल्टर . जो ट्रैक्टर कल तक दरवाजे की शान था, वही आज बोझ बन जाता है. कुछ गलियों के अंदर ही बैंक अथवा फाइनेंसिंग संस्थाएं इंस्पेक्टर ट्राली को खींचकर वापस ले लेती है और सांठ गांठ कर कौड़ियों के दम पर उसे नीलाम कर दिया जाता है. क्योंकि इस राशि से भी कर्जा पूरा नहीं पड़ता इसलिए अब बारी आती है किस की जमीन की. हालात यहां तक बन जाते हैं कि मार्जिन मनी के लिए रिश्तेदारों मित्रों से लिया गया कर्ज पता नहीं होता और ट्रैक्टर भी हाथ से चला जाता है और जमीन भी नीलामी की ओर अग्रसर हो जाती है. किसान की हालत ऐसी हो जाती है कि ‘ना खुदा ही मिला, ना विसाले सनम’ ट्रैक्टर भी हाथ नहीं आया और जमीन भी नीलामी में चली गई.
प्रायः हर ट्रैक्टर के पीछे एक ट्राली जुड़ी होती है. यह किसा के लिए बहुत उपयोगी भी होती है. अब उस ट्राली के बारे में एक खास बात. एक ओर तो भारत चाँद पर पहुँच चुका है, चंद्रयान की सफल उड़ान भर चुका है, मंगलयान के जरिए मंगल पर दस्तक दे चुका है और आदित्य-एल1 के माध्यम से सूर्य का अध्ययन कर रहा है. लेकिन उसी देश में ट्रैक्टर-ट्रॉली के पलटने से लगभग हर गाँव ने कम से कम एक किसान को खोया है, और यह संख्या अब तक के सभी युद्धों में शहीद हुए सैनिकों से भी अधिक मानी जाती है. विडंबना यह है कि इस समस्या का समाधान कोई रॉकेट साइंस नहीं है. ट्रॉली की बनावट में थोड़े से तकनीकी सुधार और उन्हें अनिवार्य बना देने भर से हजारों जिंदगियाँ बचाई जा सकती हैं. पर हमारी नीतियों में किसान आज भी प्राथमिकता नहीं, परिशिष्ट है. शायद इसलिए अंतरिक्ष की चीजें तो हमें साफ दिखाई देती हैं, लेकिन किसान के खेतों की यह नजदीकी त्रासदी अब भी अदृश्य बनी हुई है.
नीति का छिपा हुआ पक्ष - पावर टिलर बनाम ट्रैक्टर
हमारे देश के 85% किसानों के लिए ट्रैक्टर का सबसे उपयुक्त विकल्प है सक्षम बहुउपयोगी पावर टिलर. किंतु इसे दुर्भाग्य और विडंबना ही कहेंगे कि पावर टिलर के लिए न्यूनतम शक्ति सीमा 8 आठ एच पी रखी गई है.
यहीं से एक और जरूरी सवाल उठता है. जब ट्रैक्टर में कोई अधिकतम सीमा नहीं, कंबाइन हार्वेस्टर में कोई सीमा नहीं, तो पावर टिलर और पावर वीडर में “हॉर्सपावर की लक्ष्मण रेखा” क्यों?
यहां एक बुनियादी तकनीकी तथ्य समझना जरूरी है, जिसे जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है. पावर टिलर और पावर वीडर एक जैसे नहीं हैं.
पावर टिलर जुताई और मिट्टी पलटने जैसे भारी कार्यों के लिए होता है, जहां पर्याप्त शक्ति अनिवार्य है. इसके विपरीत, पावर वीडर का उपयोग फसलों के बीच गुड़ाई-निराई के लिए होता है, जहां मिट्टी, कतार चौड़ाई और फसल के अनुसार लचीलापन अधिक महत्वपूर्ण होता है.
ऐसी स्थिति में पावर टिलर के लिए 8 HP की न्यूनतम सीमा तय करना न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि तकनीकी रूप से गलत है. वास्तविक खेत परिस्थितियों में प्रभावी जुताई के लिए कम से कम 12 HP आवश्यक है. 8 HP मशीनें बार-बार चलाने की मजबूरी पैदा करती हैं, जिससे लागत और समय दोनों बढ़ते हैं.
इसी प्रकार पावर वीडर के लिए अधिकतम HP की सीमा तय करना और भी अधिक तर्कहीन है. अलग-अलग फसल, अलग मिट्टी, अलग क्षेत्रीय परिस्थितियों में एक निश्चित सीमा थोपना किसान के विकल्पों को सीमित करना है. माय फ्रेंड किसान हूं कई तरह की खेती करता हूं और किसान संगठनों से पिछले कई दशकों से जुदा करने के कारण देश के हर क्षेत्र के किसान तथा उनके खेतों से और खेती की प्रक्रिया से भारी भांति परिचित हूं, इसलिए यह बातें मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूं .
वर्तमान में भारतीय मानक ब्यूरो संस्थान इस कृषि यंत्रों की की गुणवत्ता नियंत्रण तथा प्रमाणीकरण की दिशा में बहुत ही उल्लेखनीय कार्य कर रहा है. जिस तेजी के साथ यह संस्थान कार्य कर रहा है उससे उम्मीद जगी है कि जल्द ही इन विसंगतियों को दूर कर लिया जाएगा.
मेरे द्वारा आईफा की ओर भारतीय मानक ब्यूरो को लिखे गए हालिया पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि 8 HP की पावर टिलर मशीनें वास्तविक खेत परिस्थितियों में अब बिल्कुल प्रभावी नहीं हैं.
देश की मिट्टी अब पहले जैसी भुरभुरी नहीं रही. रासायनिक खेती ने उसे कठोर बना दिया है. काली कपास वाली मिट्टी, लेटराइट भूमि, पथरीले क्षेत्र और बागानी फसलें कमजोर मशीनों को असफल बना देती हैं.
जमीनी अनुभव बताते हैं कि 10 से 12 HP से कम मशीनें अधिकांश कार्य प्रभावी ढंग से नहीं कर पातीं. इसके बावजूद 8 HP की न्यूनतम सीमा थोपना किसानों के अधिकारों का हनन है. यह केवल 8 एचपी के पावर टिलर बनाने वाली कंपनी विशेष को फायदा पहुंचाने की साजिश भी हो सकती है.
एक वाक्य में कहूं तो वर्तमान परिस्थितियों में हर हाल में पावर टिलर के लिए न्यूनतम सीमा 12 एचपी होनी चाहिए और पावर लीडर के लिए कोई सीमा नहीं रखी जानी चाहिए.
और यही वह बिंदु है जहां नीति का विरोधाभास स्पष्ट दिखता है - बड़े, महंगे और कर्ज आधारित विकल्पों के लिए खुली छूट, और छोटे, किफायती विकल्पों पर कृत्रिम रोक.
निष्कर्ष - खेती को दिखावे से निकालकर व्यवहार में लाना होगा
अब समय आ गया है कि खेती को दिखावे से निकालकर व्यवहारिकता की जमीन पर लाया जाए.
किसान को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह अपनी जमीन, अपनी फसल और अपनी जरूरत के अनुसार मशीन का चयन करे.
सरकार का काम यह तय करना नहीं है कि किसान कितने HP की मशीन खरीदे, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि उसे हर विकल्प उपलब्ध हो और सही जानकारी भी.
कृषि यंत्रों का वास्तविक परीक्षण प्रयोगशालाओं में नहीं, किसानों के खेतों में होना चाहिए. कागजी प्रमाणपत्र से अधिक विश्वसनीय किसान का अनुभव होता है.
यदि अब भी दिशा नहीं बदली, तो आने वाला समय यह स्वीकार करने को मजबूर करेगा कि इस देश की खेती को सबसे अधिक नुकसान प्राकृतिक आपदाओं ने नहीं, बल्कि गलत नीतियों, सीमित विकल्पों और अनुपयुक्त तकनीक के अंधाधुंध प्रसार ने किया है.
और तब इतिहास केवल यह नहीं पूछेगा कि किसान क्यों हारा, वह यह भी पूछेगा कि उसे हराने की व्यवस्था किसके साथ दुरभि संधि करके किसने बनाई.