किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) सामूहिक उद्यम के माध्यम से छोटे और सीमांत किसानों को सशक्त बनाने के भारत के प्रयासों में एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में उभरे हैं. उनकी क्षमता को पहचानते हुए, भारत सरकार ने राष्ट्रव्यापी किसान समूहों को संस्थागत और सशक्त बनाने के लिए 2020 में केंद्रीय क्षेत्र की योजना '10,000 किसान उत्पादक संगठनों का गठन और संवर्धन' शुरू की. साल 2025 की शुरुआत में इस योजना ने 10,000 एफपीओ बनाने का लक्ष्य पूरा कर लिया, जो संगठित कृषि उद्यमों को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है.
फरवरी 2026 में जैविक उत्पादों के लिए विश्व की प्रमुख प्रदर्शनी बायोफैच (BIOFACH) 2026 जर्मनी में आयोजित हुई, जहां भारतीय पवेलियन के 67 सह-प्रदर्शकों में एफपीओ भी शामिल हुए. यह उनकी बढ़ती भागीदारी और पहचान को दर्शाता है.
वर्तमान में भारत में पंजीकृत एफपीओ की कुल संख्या लगभग 18,000 है. इनमें से 1,100 से अधिक एफपीओ ऐसे हैं जिनका वार्षिक कारोबार 1 करोड़ रुपये से अधिक है. यह दिखाता है कि ये संगठन व्यावसायिक रूप से मजबूत हो रहे हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बदलने की क्षमता रखते हैं. परंतु, बहुत सारे एफपीओ निष्क्रिय हैं या आर्थिक दबाव का सामना कर रहे हैं. इसका मुख्य कारण है नियमित और स्थायी आय के स्रोत की कमी, जिसके चलते वे अपने संचालन खर्च पूरे नहीं कर पाते और बाजार की बदलती परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने में भी सक्षम नहीं होते. परिणामस्वरूप कई एफपीओ ठहराव की स्थिति में चले जाते हैं या बंद हो जाते हैं.
आय स्रोतों का विविधीकरण एफपीओ को आर्थिक स्थिरता देने और टिकाऊ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
इस संदर्भ में, एग्रीवोल्टिक्स यानी खेती के साथ सोलर फोटोवोल्टिक्स (पीवी) लगाने की पद्धति, एफपीओ को मजबूत करने के लिए एक अच्छा अवसर प्रदान करती है. इसमें एक ही जमीन पर फसल उत्पादन और सौर ऊर्जा उत्पादन साथ-साथ किए जाते हैं. इस तरह जमीन का दोहरा उपयोग होता है, जिससे भोजन व स्वच्छ ऊर्जा दोनों का एक साथ उत्पादन करना संभव हो जाता है.
महत्वपूर्ण बात यह है कि एफपीओ- प्रधान एग्रीवोल्टाइक मॉडल में किसान संगठन खुद सोलर प्लांट में निवेश कर सकते हैं और उसके मालिक बन सकते हैं, बजाय इसके कि वे अपनी जमीन किसी बाहरी रिन्यूएबल एनर्जी कंपनी (RESCO) को पट्टे पर दें. स्वामित्व होने से बिजली उत्पादन से होने वाली आय समुदाय के भीतर ही रहती है. साथ ही, इससे एफपीओ की संस्थागत क्षमता और परिसंपत्ति आधार भी मजबूत होते हैं.
इस शैली का एक प्रमुख उदाहरण सह्याद्री फार्म्स है, जो भारत का सबसे बड़ा एफपीओ माना जाता है. इसने नासिक में अंगूर और साइट्रस (नींबू वर्गीय) की खेती पर केन्द्रित एक 250 किलोवाट का एग्रीवोल्टाइक प्लांट स्थापित किया है. यह परियोजना ‘डेवेलप फॉर एग्रीवोल्टिक्स’ (DeveloPPP for Agrivoltaics) पहल का हिस्सा थी. इस पायलट परियोजना ने दिखाया कि बागवानी के साथ सोलर पीवी को जोड़ना संभव है और इससे पूरी मूल्य श्रंखला (वैल्यू चेन) को बेहतर बनाया जा सकता है. सह्याद्री फार्म्स का अनुभव उन एफपीओ के लिए एक अच्छा खाका प्रदान करता है जो एग्रीवोल्टिक्स को अपनाना चाहते हैं.
एफपीओ - प्रधान एग्रीवोल्टाइक मॉडल के कई फायदे हैं. बिजली बेचकर नियमित आय प्राप्त करने के अलावा, एफपीओ इस बिजली का उपयोग फसल प्रसंस्करण और भंडारण सुविधाओं (जैसे कोल्ड स्टोरेज, सुखाने की इकाइयां, चारा काटने की मशीन, मिलिंग और पैकेजिंग प्लांट) को चलाने में कर सकते हैं. आमतौर पर इन इकाइयों को 8 से 10 रुपये प्रति किलोवाट घंटे (kWh) की दर से वाणिज्यिक बिजली शुल्क देना पड़ता है. ऐसे में एग्रीवोल्टिक्स से उत्पन्न बिजली का उपयोग करना एक बहुत ही किफायती विकल्प हो सकता है.
पशुपालन से जुड़े एफपीओ, (खासकर- वे जो डेयरी क्षेत्र में काम करते हैं), एग्रीवोल्टाइक सिस्टम लगाकर काफी लाभ उठा सकते हैं. वे सोलर पैनलों के नीचे हरा चारा जैसे घास और दलहनी फसलें उगा सकते हैं, जिससे पूरे साल पशुओं के लिए अच्छा और पौष्टिक चारा उपलब्ध रहेगा.
साथ ही, सोलर पैनलों से उत्पन्न होने वाली बिजली का उपयोग जरूरी डेयरी ढांचे, जैसे बल्क मिल्क चिलर, दूध पैकेजिंग यूनिट, और अन्य मूल्य संवर्धन सुविधाओं को चलाने में किया जा सकता है. इससे बिजली के खर्च में काफी कमी आएगी और पूरी डेयरी मूल्य श्रृंखला मजबूत होगी. अंततः इससे किसानों की कुल आय में बढ़ोतरी होगी.
परियोजना के लिए वित्त की व्यवस्था करते समय एफपीओ को कुल लागत का लगभग 30% हिस्सा अपनी पूंजी (इक्विटी) के रूप में जुटाना होता है. यदि एफपीओ एग्रीवोल्टाइक मॉडल अपनाते हैं, तो बाकी राशि रियायती ऋण के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है. इसके लिए प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम-कुसुम) और, कृषि अवसंरचना निधि (एआईएफ) जैसी सरकारी योजनाओं का सहारा लिया जा सकता है.
इसके अलावा, मिश्रित वित्त प्रणाली और अनुदान का उपयोग किया जा सकता है, और कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) परियोजनाओं और इम्पैक्ट निवेशकों के साथ साझेदारी भी की जा सकती है. वित्तीय सहायता के इन विविध स्रोतों की मदद से एफपीओ आवश्यक पूंजी जुटा सकते हैं और जोखिम को भी बेहतर तरीके से संभाल सकते हैं.
अंत में, परिसंपत्तियों पर समुदाय का नियंत्रण मजबूत कर यह मॉडल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के व्यापक उद्देश्य को आगे बढ़ाता है.
स्पष्ट है कि इस मॉडल को बड़े स्तर पर लागू करना फलदायी हो सकता है. इसके लिए उन फसल-आधारित एफपीओ पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए, जो ऐसी मूल्य शृंखलाओं से जुड़े हैं जिनमें फसल कटाई के बाद प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन की अच्छी संभावनाएं हैं (जैसे हल्दी, आलू, चाय और अंगूर).
साथ ही, क्षेत्र-आधारित एफपीओ (जैसे वे जो शुष्क, अर्ध-शुष्क, और वर्षा सिंचित क्षेत्रों में हैं, जहां भूमि का दोहरा उपयोग किसानों के लिए अत्यधिक लाभकारी है) को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि मॉडल की पहुंच का विस्तार किया जा सके. समावेशिता को बढ़ावा देने और ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए महिला-संचालित एफपीओ (2025 तक भारत में लगभग 800) पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए.
उपरोक्त उपायों के अलावा, सभी एफपीओ सदस्यों को एग्रीवोल्टिक्स के तकनीकी, वित्तीय, और संचालन से जुड़े पहलुओं के बारे में लगातार जानकारी देना, उन्हें शिक्षित करना, और उनका कौशल बढ़ाना जरूरी है. इसके लिए जागरूकता अभियान, प्रशिक्षण कार्यशालाएं, और अध्ययन दौरे आयोजित किए जाने चाहिए. साथ ही, परियोजना संकल्पना से लेकर उसे लागू करने तक संस्थागत मार्गदर्शन (हैंडहोल्डिंग) भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए, ताकि तकनीकी और नियामक चुनौतियों को आसानी से दूर किया जा सके.
भारत ने स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन के अपने प्रयासों में एग्रीवोल्टिक्स को महत्वपूर्ण स्थान दिया है. सितंबर 2025 में पीएम - कुसुम 2.0 के भविष्य पर चर्चा के लिए आयोजित एक उच्च - स्तरीय बैठक में नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) ने राष्ट्रीय एग्रीफोटोवोल्टाइक मिशन का प्रस्ताव रखा, जिसे संभवतः इसी वर्ष शुरू किया जा सकता है.
यह एफपीओ के लिए एक सुनहरा अवसर है कि वे एग्रीवोल्टिक्स के सामर्थ्य का लाभ उठाकर समुदाय प्रधान, हरित, और मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था का निर्माण करें.
लेखक: सुहास सत्यकिरण
सुहास सत्याकिरण, शोध-आधारित थिंक टैंक सेंटर फॉर स्टडी ऑफ साइंस, टेक्नोलॉजी एंड पॉलिसी (सीस्टेप) के रिन्यूएबल्स समूह में विश्लेषक हैं.