डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (RPCAU), पूसा स्थित सेंटर फॉर एडवांस्ड स्टडीज ऑन क्लाइमेट चेंज में बुधवार को स्पेस एप्लिकेशन सेंटर (SAC), इसरो के सहयोग से अत्याधुनिक एडी-कोवेरियंस टॉवर का उद्घाटन किया गया. यह सुविधा जलवायु परिवर्तन और कृषि पर उसके प्रभावों के अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है.
एडी-कोवेरियंस टॉवर एक उन्नत वैज्ञानिक प्रणाली है, जिसके माध्यम से वायुमंडल और भूमि सतह के बीच गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, जलवाष्प तथा ऊष्मा के आदान-प्रदान का सटीक मापन किया जाता है. यह तकनीक जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया को समझने और उसके दुष्प्रभावों को कम करने हेतु रणनीति विकसित करने में सहायक होगी.
इस टॉवर में अत्याधुनिक सेंसर और उपकरण लगाए गए हैं.
जो मिट्टी, जल और वायु से संबंधित कुल 32 मापदंडों की सतत निगरानी करते हैं. इनमें प्रमुख रूप से मिट्टी की नमी और तापमान, वायु तापमान एवं आर्द्रता, हवा की गति और दिशा, कार्बन डाइऑक्साइड एवं जलवाष्प फ्लक्स, संवेदनशील एवं अव्यक्त ऊष्मा फ्लक्स, नेट रेडिएशन, फोटोसिंथेटिकली एक्टिव रेडिएशन (PAR), मिट्टी ऊष्मा फ्लक्स तथा मिट्टी श्वसन शामिल हैं.
उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए RPCAU के कुलपति डॉ. पी. एस. पांडेय ने कहा कि एडी-कोवेरियंस टॉवर जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने की दिशा में विश्वविद्यालय के प्रयासों का एक अहम पड़ाव है. उन्होंने कहा कि यह सुविधा वायुमंडल, मिट्टी और वनस्पति के बीच जटिल अंतःक्रियाओं को समझने में मदद करेगी तथा जलवायु-प्रतिरोधी कृषि प्रणालियों के विकास को गति देगी.
वहीं डायरेक्टर रिसर्च डॉ. ए. के. सिंह ने कहा कि यह टॉवर विभिन्न कृषि प्रणालियों की कार्बन सेक्वेस्ट्रेशन क्षमता के आकलन में सहायक होगा. इससे कार्बन सिंक बढ़ाने की रणनीतियां विकसित की जा सकेंगी, जो जलवायु परिवर्तन के शमन और कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक हैं.
इस टॉवर से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग जलवायु-स्मार्ट कृषि के लिए मॉडल और निर्णय समर्थन उपकरण विकसित करने में किया जाएगा, जिससे किसान बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप खेती अपनाने में सक्षम हो सकेंगे.
उद्घाटन समारोह में RPCAU, SAC (इसरो) सहित विभिन्न संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक और शोधकर्ता उपस्थित रहे. यह पहल न केवल जलवायु परिवर्तन अनुसंधान को सशक्त करेगी, बल्कि बिहार सहित पूरे पूर्वी भारत में सतत और जलवायु-संवेदनशील कृषि को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.
लेखक: रामजी कुमार समस्तीपुर, एफटीजे, कृषि जागरण