भारत की पहचान सदियों से उसकी विविधता में रही है. अनेक धर्म, भाषाएं, जातियां, संस्कृतियां, वेशभूषाएं और जीवन पद्धतियां होने के बावजूद एक राष्ट्र के रूप में उसका अस्तित्व दुनिया के लिए आश्चर्य और आकर्षण का विषय रहा है. लेकिन आज एक असहज सवाल सामने खड़ा है. क्या हम सचमुच एक राष्ट्र के रूप में पहले से अधिक एकजुट हो रहे हैं, या राजनीतिक स्वार्थों की खेती में अलगाववाद की फसल को खाद-पानी दे रहे हैं? अखंड भारत का सपना केवल भौगोलिक सीमाओं की अखंडता से पूरा नहीं होगा, उसके लिए नागरिकों के दिलों में भी एकता अखंडता की भावना जरूरी है.
1857 से विभाजन तक, इतिहास के सबक:
1857 की क्रांति इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. हिंदू, मुसलमान और विभिन्न जातियों के लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध साझा संघर्ष किया. बहादुरशाह जफर के नाम से जारी घोषणाओं में हिंदुओं और मुसलमानों को एक साथ संघर्ष का आह्वान किया गया था. अंग्रेजों ने इस साझा प्रतिरोध की शक्ति को पहचाना. बाद में 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था करके सांप्रदायिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व को संस्थागत रूप दिया. मुस्लिम लीग की स्थापना 30 दिसंबर 1906 को ढाका में और अखिल भारतीय हिंदू महासभा का गठन 1915 में हुआ. इन संगठनों को अंग्रेजों ने संरक्षण तथा प्रोत्साहन दिया. इनकी विभाजनकारी नीतियों ने सामुदायिक राजनीतिक ध्रुवीकरण को पर्याप्त बढ़ावा दिया.
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ, लेकिन विभाजन की कीमत लाखों लोगों ने जान देकर और करोड़ों ने विस्थापन झेलकर चुकाई. 3 जून 1947 की माउंटबेटन योजना और 18 जुलाई 1947 के भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ने विभाजन का रास्ता प्रशस्त किया. इसके लिए किसी एक नेता या समुदाय को दोषी ठहराकर इतिहास का सरलीकरण करना उचित नहीं होगा. ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति, सांप्रदायिक राजनीति और तत्कालीन नेतृत्व के राजनीतिक निर्णय, सभी की निष्पक्ष समीक्षा जरूरी है. अंग्रेज चले गए, लेकिन विभाजन की मानसिकता आज भी हमारे बीच कहीं न कहीं जीवित है.
भाषा और क्षेत्र की दीवारें, एक देश के भीतर अनेक देश :-
आज भाषा के नाम पर जो कटुता दिखाई देती है, वह राष्ट्रीय एकता के लिए गंभीर चुनौती है. अंग्रेजों की नीति को ही आगे बढ़ते हुए 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम के माध्यम से राज्यों का व्यापक पुनर्गठन भाषाई आधार पर हुआ. भाषा को प्रशासनिक सुविधा और सांस्कृतिक पहचान का आधार बनाना गलत नहीं था, लेकिन उसे दूसरे भारतीयों से घृणा का आधार बना देना निश्चित रूप से गलत है.
संविधान कै अनुच्छेद 343 के अंतर्गत हिंदी देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा है और अंग्रेजी का प्रयोग भी कानून के अनुसार जारी है. संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएं शामिल हैं. फिर भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि त्रिभाषा सूत्र के अंतर्गत हिंदी भाषी राज्यों में दक्षिण भारतीय भाषाओं को सीखने के लिए वैसी ही गंभीरता क्यों नहीं दिखाई जाती, जैसी दक्षिण में हिंदी के लिए अपेक्षित की जाती है? क्या हम एक-दूसरे की भाषा और संस्कृति जाने बिना राष्ट्रीय एकता का सपना पूरा कर सकते हैं? दक्षिण भारत की भाषाओं और संस्कृत परंपरा का अपना गौरव है. हिंदी का सम्मान भी किसी दूसरी भाषा के अपमान की कीमत पर नहीं होना चाहिए.
संरक्षण के नाम पर अलगाव, और वोट के नाम पर विभाजन :-
राष्ट्रीय एकता को नुकसान केवल धर्म और भाषा की राजनीति से नहीं पहुंच रहा, बल्कि क्षेत्रीय और सामाजिक पहचान के नाम पर भी खाइयां लगातार गहरी की जा रही हैं. दक्षिण में धार्मिक समुदायों के बीच पहचान की राजनीति हो या बस्तर में आदिवासी और ईसाई समुदायों के बीच बढ़ते तनाव, अथवा आदिवासी और गैर-आदिवासी के बीच अविश्वास, इन सबका समाधान टकराव नहीं, संवाद और समान न्याय है. जो बस्तर कभी शांति और सहअस्तित्व की मिसाल रहा, वहां सामाजिक तनाव की घटनाएं चिंता का विषय हैं.
आदिवासी जमीन की रक्षा के लिए बनाए गए प्रतिबंधों का उद्देश्य ऐतिहासिक शोषण से समुदाय को बचाना था, लेकिन उनके क्रियान्वयन में ऐसी गंभीर खामियां हैं कि जरूरत पड़ने पर आदिवासी अपनी ही जमीन का उचित व प्रतिस्पर्धी मूल्य प्राप्त न कर सकता. आदिवासी जमीनों की तमाम रजिस्ट्रयों के दस्तावेज को उठाकर देखें तो पाएंगे कि आदिवासियों की जमीन कौड़ियों की मूल्य बिक रही है, और शोषण करने वाले वाले चुनिंदा लोग भी उन्हीं की समुदाय के हैं. जमीन की सुरक्षा का अर्थ यह नहीं कि आदिवासी को बेहतर आर्थिक विकल्पों से भी वंचित कर दिया जाए. समाधान पारदर्शी मूल्यांकन, उचित मुआवजे, कानूनी संरक्षण और समुदाय की वास्तविक सहमति में है. बेहतर तो यह होता कि यह सुनिश्चित किया जाता कि, ऐसी नौबत ही ना आने आए कि किसी आदिवासी को अपनी जमीन बेचनी पड़े.
इसी तरह पेसा कानून, 1996 का उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा को अधिकार देना और आदिवासी स्वशासन को मजबूत करना है. इसे पूरे देश के हर गांव में बाहरी नागरिकों के प्रवेश पर रोक लगाने वाला कानून बताना, भोली भाले लोगों की भीड़ इकट्ठा करके कोई भी कार्य व्यवसाय न करने देना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा. लेकिन इसके नियमों और स्थानीय क्रियान्वयन में अनावश्यक प्रतिबंध और भ्रम पैदा हो तो उनकी समीक्षा आवश्यक है.
अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 भी ऐतिहासिक सामाजिक अन्याय और अत्याचार से पीड़ित समुदायों की रक्षा के नाम पर गढा गया था. इसके मूल उद्देश्य को कमजोर करना उचित नहीं, लेकिन किसी भी कानून का दुरुपयोग हो तो निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया से उसका समुचित समाधान होना चाहिए. संरक्षण और समान न्याय के बीच संतुलन ही संविधान की आत्मा है.
छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़िया और बाहरी का प्रश्न उठाकर लोगों के बीच दूरी पैदा करना भी खतरनाक है. संविधान का अनुच्छेद 19(1)(d) और (e) प्रत्येक नागरिक को देश में स्वतंत्र रूप से घूमने, रहने और बसने का अधिकार देता है, युक्तिसंगत संवैधानिक प्रतिबंधों के अधीन. छत्तीसगढ़ का बाजार, उद्योग और जीवन देश के दूसरे राज्यों से आने वाले उत्पादों, सेवाओं और श्रमिकों से जुड़ा है. चावल के अतिरिक्त दाल, तेल, नमक, मसाले, मशीनरी, दवाइयां, वाहन और दैनिक उपयोग की असंख्य वस्तुएं दूसरे राज्यों से आती हैं. यहां के लोग भी दूसरे राज्यों में काम करते हैं. यदि हर प्रदेश अपने दरवाजे बंद कर ले तो हमारे अपने नागरिकों का भविष्य क्या होगा?
छत्तीसगढ़िया और बाहरी के नाम पर खाई:
'छत्तीसगढ़ सबले बढ़िया' का नारा हर छत्तीसगढ़िया की भांति मुझे भी बहुत प्रिय है. लेकिन जरा सोचिए कि क्या इसका निहितार्थ यह है कि छत्तीसगढ़िया अगर सबसे बढ़िया है,, तो देश के तो बाकी सभी प्रदेशों के लोग क्या उनसे कमतर है या घटिया हैं? छत्तीसगढ़ में धान, कुछ दलहन-तिलहन और मक्का आदि काफी कुछ पैदा होता है, लेकिन कई तरह के अनाज मसाले फल ड्राई फ्रूट, खाद, बीज, दवाइयों से लेकर साइकिल, मोटरगाड़ी, मोबाइल और रोजमर्रा की अनगिनत जरूरतों के लिए हम दूसरे राज्यों पर भी निर्भर हैं. सच यह है कि हर प्रदेश एक-दूसरे का पूरक है, इसी परस्पर निर्भरता से भारत बना है. आज हम दूसरों के लिए दरवाजे बंद करेंगे, कल दूसरे प्रदेश हमारे लिए बंद कर देंगे. फिर न छत्तीसगढ़ की अस्मिता बचेगी, न राष्ट्रीय एकता. अपनी मिट्टी से प्रेम कीजिए, मगर उसके नाम पर देश की जमीन में नफरत के बीज मत बोइए. क्षेत्रीय वैमनस्य फैलाकर राजनीतिक फसल काटने वाले ऐसे तत्वों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए.
किसी भी प्रदेश के नागरिक का केवल उसकी क्षेत्रीयता, बोली, भाषा, संस्कृति अथवा धर्म के आधार पर अपमान करने का अधिकार किसी व्यक्ति, संस्था या राजनीतिक संगठन को कदापि नहीं है. अपनी नेतागिरी चमकाने और वोटों का ध्रुवीकरण करने के लिए ऐसे हथकंडों का इस्तेमाल आज तेजी से बढ़ रहा है. *जब हम सत्ता के लालच में विभिन्न वर्गों के बीच इसी तरह पक्षपात और भेदभाव करते रहेगे, नफरत के बीज होते रहेंगे तो राष्ट्रीय एकता की बात छोड़िए, गांव और मोहल्ले में भी एकता संभव नहीं होगी.
एकता की असली ताकत, संस्थाएं और साझा नागरिकता :-
राष्ट्रीय एकता के निर्माण में आकाशवाणी, दूरदर्शन, भारतीय सिनेमा, रेलवे, डाक विभाग, दूरसंचार और अखिल भारतीय सेवाओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है. भारतीय सेना तो इसकी सबसे जीवंत मिसाल है. देश के हर क्षेत्र, भाषा, धर्म और समुदाय के युवा एक ही वर्दी पहनकर राष्ट्र की रक्षा करते हैं. जब सीमा पर संकट आता है, तब कोई सैनिक यह नहीं पूछता कि उसके साथ खड़ा जवान किस भाषा में बोलता है या किस प्रदेश से आया है. यही भारत की असली शक्ति है. विदेशी आक्रमणों के समय भी भारत ने बार-बार अपने आंतरिक मतभेद भुलाकर एक राष्ट्र के रूप में खड़े होने की क्षमता दिखाई है.
पटेल की प्रतिमा नहीं, उनके विचारों की जरूरत :-
सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को हुआ था. स्वतंत्रता के बाद 562 से अधिक रियासतों के भारत में एकीकरण में उनकी निर्णायक भूमिका रही. राष्ट्रीय एकता दिवस 2014 से उनकी जयंती 31 अक्टूबर के अवसर पर मनाया जा रहा है. लेकिन उनकी विशाल प्रतिमा स्थापित कर देना ही उनके विचारों को आत्मसात कर लेना नहीं है. प्रतिमा पर्यटन स्थल बन सकती है, राष्ट्रीय-एकता नहीं. उसके लिए राजनीतिक दृढ़ इच्छाशक्ति, समुचित सामाजिक न्याय और नागरिकों के प्रति समान व्यवहार चाहिए.
सरदार पटेल के बाद राष्ट्रीय एकता के इस मूल तत्व को हमारी राजनीति ने कितनी गंभीरता से समझा और आगे बढ़ाया, यह आत्ममंथन का विषय है. राजनीतिक दलों की चुनावी रणनीतियां जब जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और समुदाय के आधार पर मतों के ध्रुवीकरण तक सीमित हो जाती हैं, तब राष्ट्रहित पीछे छूट जाता है. लोकतंत्र का उद्देश्य केवल सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों, स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करना भी है. *चुनाव से पहले जनता के दरवाजे पर हाथ जोड़ने वाले हमारे गरीब देश नेता चुनाव के बाद दर्जनों गाड़ियों के काफिले के साथ उसी जनता को रास्ते से हटवाते हैं. क्या यही जनसेवा है? क्या सत्ता त्याग और उत्तरदायित्व का माध्यम है या विशेषाधिकारों का स्थायी लाइसेंस? राजनेताओं के ऊपर प्रति घंटे किए जा रहे सैकड़ो करोड़ रुपयों के खर्चे के एक-एक पैसे का हिसाब मांगने का जनता को हक है और उनके कथित जनसेवा के अनमोल समय के प्रत्येक मिनट और सेकंड का सदुपयोग जनता के हित में वास्तविक रूप से कितना हो रहा है, इसका हिसाब मांगना भी नागरिकों का लोकतांत्रिक अधिकार है.
अब समाज को यह देखना होगा कि उसके द्वारा सत्ता में बैठाए गए व्यक्ति की राष्ट्र के प्रति निष्ठा सचमुच कितनी है. क्या सर्वोच्च पदों पर बैठे लोग वास्तव में राष्ट्र के प्रति त्याग और बलिदान के आदर्शों पर खरे उतरते हैं? यह जनता की ही जिम्मेदारी है कि वह चुनाव के समय नेताओं को क्षुद्र स्वार्थों के लिए आंख मूंदकर अपना सर्वस्व न सौंपे, बल्कि उनके कार्यों और चरित्र का मूल्यांकन करे.
राष्ट्रीय-एकता किसी एक दिन की शपथ, निबंध प्रतियोगिता या भाषण का विषय नहीं है. यह हमारे रोजमर्रा के आचरण, कानूनों की निष्पक्षता, शिक्षा की दृष्टि और राजनीतिक चरित्र की परीक्षा है. हमें हर निर्णय से पहले स्वयं से पूछना होगा कि इससे मेरा देश मजबूत होगा या कमजोर?
आखिर कब तक हम बबूल के बीज बोकर आम की फसल की उम्मीद करते रहेंगे? क्या भारत को अपनी एकता सिद्ध करने के लिए हर बार किसी विदेशी आक्रमण की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी? राष्ट्र केवल नारों से नहीं, कर्म, न्याय, त्याग और उत्तरदायित्व से चलता है.
राष्ट्र सर्वोपरि है, लेकिन राष्ट्र केवल जमीन का टुकड़ा, या भूगोल का एक नक्शा नहीं, बल्कि उसके नागरिकों का परस्पर विश्वास भी है. जब तक यह विश्वास अक्षुण्ण नहीं होगा, अखंड भारत का सपना अधूरा रहेगा.