नई दिल्ली, 29 सितंबर 2026, अल-नीनो की आशंका, मानसून में 12 फीसदी की असमान कमी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उर्वरकों की आसमान छूती कीमतों के बीच केंद्र की मोदी सरकार ने देश के किसानों के हितों की रक्षा का निर्णायक संकल्प लिया है। राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन- रबी अभियान 2026 के दौरान आज दिल्ली में मीडिया से मुखातिब होते हुए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट कहा कि चाहे मौसम की मार हो या प्राकृतिक आपदा, सरकार किसान भाइयों के साथ हर कदम पर खड़ी है। शिवराज सिंह ने देश में रबी बुवाई के लिए पर्याप्त खाद, प्रमाणित बीजों और आवश्यक वित्तीय संसाधनों की पूर्ण उपलब्धता का भरोसा दिलाया। इसके साथ ही उन्होंने दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के नाम पर किसानों पर एकतरफा दोषी ठहराने की परिपाटी पर कड़ा एतराज जताते हुए दो टूक कहा कि प्रदूषण के लिए केवल किसानों को खलनायक ठहराना और उन्हें प्रताड़ित करना कतई उचित नहीं है।
जमीनी स्तर पर व्यापक तैयारी: 15 दिनों का मंथन और राज्यों से सतत संवाद
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि रबी सीजन की यह तैयारी अचानक नहीं हुई है, बल्कि इसके पीछे एक मजबूत और त्रिस्तरीय प्रशासनिक प्रक्रिया रही है। जिला और राज्य स्तर पर संवाद किया जाता है। चूंकि कृषि मूल रूप से संविधान के तहत राज्यों का विषय है और खेती-किसानी की वास्तविक जमीन राज्यों में ही है, इसलिए पिछले 15 दिनों से राज्य सरकारें निरंतर जिला और राज्य स्तर पर रबी अभियान की तैयारी में जुटी हुई थीं।
अधिकारियों का 10 घंटे का मैराथन मंथन
उन्होंने बताया कि सम्मेलन के पहले दिन सभी राज्यों के कृषि प्रधान सचिवों, कृषि उत्पादन आयुक्तों (APC) और उनके तकनीकी विशेषज्ञों की पूरी टीम दिल्ली पहुंची। सुबह 10 बजे से लेकर रात 8 बजे तक लगातार 10 घंटे तक केंद्र और राज्यों के बीच खेती के हर पहलू और विभिन्न कृषि योजनाओं की राज्यवार सघन समीक्षा की गई।
कृषि मंत्रियों की मौजूदगी में ठोस फैसले
शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि आज विभिन्न राज्यों के कृषि मंत्री इस बैठक में स्वयं उपस्थित रहे और उन्होंने अपने-अपने राज्यों की प्राथमिकताओं व आवश्यकताओं को साझा किया, जिसके आधार पर रबी की राष्ट्रीय कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया जा रहा है।
भारतीय कृषि की विकास यात्रा
शिवराज सिंह ने कहा कि 2015 के बाद खेती की रफ्तार में ऐतिहासिक उछाल आया है। देश में कृषि विकास के तुलनात्मक आंकड़ों को प्रस्तुत करते हुए शिवराज सिंह ने बताया कि यदि स्वतंत्र भारत में कृषि विकास की यात्रा को तीन ऐतिहासिक चरणों में देखा जाए, तो आंकड़े साफ बताते हैं कि हाल के वर्षों में खेती में कितना बड़ा बदलाव आया है: प्रथम चरण (1967 से 1995): इस दौरान खाद्यान्न उत्पादन में औसत वार्षिक वृद्धि दर 4.1 मिलियन टन दर्ज की गई थी। द्वितीय चरण (1996 से 2014): इस दौर में खाद्यान्न उत्पादन की औसत वार्षिक वृद्धि दर घटकर 3.9 मिलियन टन पर आ गई। तृतीय चरण (2015 के बाद का दौर): वर्ष 2015 के बाद देश के खाद्यान्न उत्पादन में ऐतिहासिक उछाल आया और औसत वार्षिक वृद्धि दर बढ़कर 8.4 मिलियन टन प्रति वर्ष पहुंच गई। औसत विकास दर में 50% की बढ़त: पूर्ववर्ती दोनों चरणों (1967 से 2014 तक) में जहां कृषि की औसत विकास दर लगभग 3 प्रतिशत के आसपास बनी हुई थी, वहीं 2015 के बाद यह बढ़कर 4.5 प्रतिशत हो गई है। यानी औसत विकास दर में 50 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
मानसून, अल-नीनो और खरीफ की बुवाई: कंटीजेंसी प्लान से टला बड़ा संकट
इस वर्ष अल-नीनो की आशंकाओं और मानसूनी बारिश की असमानता को लेकर केंद्रीय मंत्री चौहान ने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की और वर्षा की मौजूदा स्थिति की जानकारी देते हुए कहा कि अप्रैल महीने से ही केंद्र सरकार ने अल-नीनो से निपटने के व्यापक प्रबंध शुरू कर दिए थे। शुरुआती दौर में (24-25 तारीख तक) देश में मानसूनी वर्षा में 14 प्रतिशत की कमी थी, लेकिन पिछले तीन-चार दिनों की अच्छी बारिश के बाद यह कमी घटकर अब मात्र 12 प्रतिशत रह गई है। कृषि विज्ञान के मानकों के अनुसार, जब तक बारिश में 19 प्रतिशत से अधिक की कमी न हो, उसे गंभीर सूखा संकट नहीं माना जाता।
कंटीजेंसी प्लान की सफलता
शिवराज सिंह ने बताया कि कम बारिश के कारण खरीफ फसलों के बुवाई क्षेत्र (रकबे) में भारी गिरावट की जो आशंका जताई जा रही थी, वह केंद्र, राज्यों, आईसीएआर और किसानों के संयुक्त प्रयासों से टल गई। बुवाई के क्षेत्रफल में मात्र 1 प्रतिशत की मामूली कमी आई है, जो लगभग सामान्य के बराबर है। रकबे का फसलवार
विश्लेषण करते हुए शिवराज सिंह ने बताया कि बुवाई क्षेत्र में सबसे ज्यादा कमी धान की फसल में आई है, जहां लगभग 16.32 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल घटा है। इसके अलावा मक्का, सोयाबीन और कपास के क्षेत्र में भी थोड़ी गिरावट दर्ज हुई है।
दलहन और मोटे अनाजों में सकारात्मक उछाल
शिवराज सिंह ने बताया कि एक बहुत ही उत्साहजनक पहलू यह रहा कि उड़द, बाजरा, ज्वार, तिल, सूरजमुखी और तुअर (अरहर) जैसी दलहनी, तिलहनी और मोटे अनाजों के रकबे में अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
प्राकृतिक मार से प्रभावित क्षेत्र के बारे में शिवराज सिंह ने बताया कि कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में भारी वर्षा, बाढ़ या सूखे के चलते लगभग 6,11,000 हेक्टेयर क्षेत्र में फसल प्रभावित होने की प्रारंभिक सूचना मिली है, जिसके नुकसान का विस्तृत वैज्ञानिक आकलन कराया जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय महंगाई के बीच खाद का सुरक्षा कवच
163 लाख मीट्रिक टन का भंडार: वैश्विक बाजार में उर्वरकों की कीमतें दोगुनी तक बढ़ने और आपूर्ति की चिंताओं पर कृषि मंत्री चौहान ने किसानों को स्पष्ट भरोसा दिलाया और राज्यों की मांग बताते हुए कहा कि वर्ष 2026-27 के रबी सीजन के लिए सभी राज्यों की ओर से कुल मिलाकर 380 लाख मीट्रिक टन उर्वरक (डीएपी, यूरिया, एनपीके आदि) की मांग प्रस्तुत की गई है, जिसकी भरपूर उपलब्धता है। देश में इस समय 163 लाख मीट्रिक टन से अधिक उर्वरक का विशाल भंडार पहले से मौजूद है। पिछले साल इसी समय रबी की शुरुआत में यह स्टॉक मात्र 122 लाख मीट्रिक टन था।
राज्यों को आपूर्ति की गारंटी
पंजाब जैसे कुछ राज्यों द्वारा व्यक्त की गई स्थानीय चिंताओं पर उन्होंने स्पष्ट किया कि देश में उर्वरक की कोई कमी नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव का कोई भी वित्तीय बोझ भारतीय किसान पर नहीं पड़ने दिया जाएगा। राज्यों से निरंतर संपर्क बनाए रखकर समय पर पर्याप्त खाद पहुंचाई जा रही है।
22 अक्टूबर से 'खेत बचाओ अभियान': संतुलित खाद और 1400 करोड़ रु. की सीधी बचत
शिवराज सिंह ने बताया कि धरती की उर्वरा शक्ति को सुरक्षित रखने और किसानों की लागत घटाने के लिए सरकार ने बड़े पैमाने पर जमीनी अभियान का खाका तैयार किया है। पायलट प्रोजेक्ट की मिसाल देते हुए उन्होंने बताया कि खरीफ सीजन के दौरान प्रमुख राज्यों के दो-दो जिलों में मिट्टी परीक्षण के आधार पर रासायनिक खादों के संतुलित उपयोग का पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया। इसके तहत किसानों को बताया गया कि उनकी जमीन और फसल के लिए कितनी खाद पर्याप्त है। इसका शानदार परिणाम यह रहा कि उन जिलों में उर्वरक की कुल खपत में 27 प्रतिशत की कमी आई और देश को 1400 करोड़ रु. से अधिक की सीधी बचत हुई हैं।
रबी के लिए देशव्यापी अभियान
केंद्रीय मंत्री चौहान खरीफ की सफलता के बाद अब पूरे देश में 22 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक 'खेत बचाओ अभियान' चलाया जाएगा। उन्होंने बताया कि खेतों तक पूरी मशीनरी पहुंचेगी। इस अभियान के दौरान आईसीएआर के वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के विशेषज्ञ, आत्मा (ATMA) की टीमें, राज्य कृषि विभाग के अधिकारी और केंद्रीय व राज्य मंत्री सीधे गांवों और खेतों में किसानों के बीच जाएंगे। उन्होंने बताया कि अभियान के अंतर्गत मिट्टी की जरूरत के हिसाब से यूरिया और डीएपी का संतुलित उपयोग, उपलब्ध नमी और पानी के आधार पर सही फसल व उन्नत किस्म का चयन, खेती में पूंजी की कमी न आए, इसके लिए सभी पात्र किसानों के किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) बनवाना और उनका सही उपयोग सुनिश्चित करना ये सभी कार्य किए जाएंगे।
रबी उत्पादन का राष्ट्रीय लक्ष्य: 177.72 मिलियन टन का विशाल संकल्प
कृषि मंत्री शिवराज सिंह ने उत्पादन के लक्ष्यों का ब्योरा देते हुए बताया कि नीतियां केवल कागजों पर नहीं, बल्कि जलाशयों में पानी की स्थिति, भूजल स्तर और मिट्टी की नमी को देखकर तय की गई हैं:
पिछले वर्ष का रिकॉर्ड: वर्ष 2025-26 के लिए 362.60 मिलियन टन का लक्ष्य रखा गया था, जिसके मुकाबले किसानों ने 376.56 मिलियन टन खाद्यान्न का बंपर उत्पादन करके दिखाया। आगामी वर्ष 2026-27 का लक्ष्य: उन्होंने बताया कि अल-नीनो की परिस्थितियों का वैज्ञानिक आकलन करते हुए देश के लिए कुल 373.93 मिलियन टन का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें अकेले रबी सीजन का लक्ष्य 177.72 मिलियन टन तय किया गया है।
फसल चक्र में बदलाव
शिवराज सिंह ने बताया कि जिन क्षेत्रों में पानी की कमी या मिट्टी में नमी कम है, वहां किसानों को अधिक पानी मांगने वाली फसलों से हटाकर दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों की बुवाई के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
सूखा और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को मदद: 3 तारीख को केंद्रीय टीम होगी रवाना
प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहे किसानों की आर्थिक और तकनीकी मदद के लिए सरकार ने तुरंत कदम उठाए हैं। इसके तहत केंद्रीय टीमों का दौरा होगा। कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से आए आग्रह पर स्थिति के भौतिक निरीक्षण के लिए 3 अक्तूबर को विशेष केंद्रीय टीमें मौके पर भेजी जा रही हैं। कृषि मंत्री चौहान ने स्वयं भी इन राज्यों का दौरा कर स्थिति का जायजा लेने की घोषणा की।
वित्तीय सहायता का द्विस्तरीय तंत्र
शिवराज सिंह के अनुसार, SDRF (राज्य आपदा मोचन निधि) के अंतर्गत तात्कालिक संकट से निपटने के लिए राज्यों के पास मौजूद फंड में 75 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार देती है और 25 प्रतिशत राज्यों का होता है। इसके जरिए किसानों को तुरंत राहत दी जा रही है। आपदा में टूटे मकानों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अतिरिक्त मकान दिए जा रहे हैं। वहीं, NDRF (राष्ट्रीय आपदा मोचन निधि) के तहत केंद्रीय टीम के अंतिम सर्वे के बाद गृह मंत्री की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति द्वारा नुकसान के आधार पर राज्यों को अतिरिक्त वित्तीय राहत पैकेज स्वीकृत किया जाएगा।
कम अवधि वाले बीजों की व्यवस्था
उन्होंने बताया कि सूखे से प्रभावित खेतों को खाली रहने से बचाने के लिए कम पानी और कम समय में तैयार होने वाली फसलों के बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा रही है। साथ ही फसल बीमा योजना का दायरा बढ़ाने के लिए निरंतर काम जारी है।
किसानों को सुरक्षा कवच: MSP से नीचे नहीं जाने देंगे दाल और तिलहन के भाव
शिवराज सिंह ने कहा कि उपज के लाभकारी मूल्य और बाजार के उतार-चढ़ाव से किसानों को बचाने के लिए केंद्र सरकार ने कड़ा नीतिगत फैसला लिया है। PM-AASHA के तहत सीधी खरीद: दलहन और तिलहन की खरीद में राज्यों की ओर से होने वाली प्रशासनिक देरी को समाप्त करने का निर्णय लिया गया है। यदि बाजार में कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे गिरती हैं, तो केंद्र सरकार की नोडल एजेंसियां- NAFED (नेफेड) और NCCF (एनसीसीएफ) राज्यों का इंतजार किए बिना सीधे मंडियों में उतरकर किसानों से खरीद शुरू करेंगी। इसके बाद राज्य एजेंसियां भी इस प्रक्रिया से जुड़ सकेंगी, ताकि किसान औने-पौने दामों पर अपनी फसल बेचने को मजबूर न हों।
राज्यों को समय पर बजट आवंटन
केंद्रीय मंत्री चौहान ने बताया कि राज्यों को आरकेवीवाई (RKVY) और कृषोन्नति योजना के तहत साल के अंत के बजाय समय पर राशि दी जा रही है। पहले जारी 4,000 करोड़ के बाद हाल ही में 3,000 करोड़ से अधिक की राशि जारी की गई है। कुल मिलाकर 7,000 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि राज्यों को हस्तांतरित की जा चुकी है, जिससे योजनाओं का क्रियान्वयन निर्बाध रूप से चल रहा है।
डिजिटल क्रांति, रोग नियंत्रण और संतुलित आयात नीति
डिजिटल कृषि और एग्रीस्टैक के बारे में केंद्रीय कृषि मंत्री चौहान ने बताया कि किसानों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के लिए विशिष्ट फार्मर आईडी बनाने का काम तेजी से चल रहा है। एग्रीस्टैक के माध्यम से सरकारी योजनाओं और तकनीकी सलाह को सीधे किसान के मोबाइल तक पहुंचाया जा रहा है।
प्राकृतिक खेती और वैश्विक व्यापार (FTA)
उन्होंने बताया कि लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए संकल्प के अनुरूप प्राकृतिक खेती का विस्तार किया जा रहा है। साथ ही विभिन्न देशों के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) के तहत भारतीय कृषि उत्पादों को मिलने वाले वैश्विक बाजार के अवसरों की जानकारी राज्यों के जरिए किसानों तक पहुंचाई जा रही है।
फसल रोगों से बचाव
शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि गन्ने में 'रेड रॉट' (लाल सड़न) और कपास में 'पिंक बॉलवर्म' कीट की रोकथाम के लिए आईसीएआर के वैज्ञानिक युद्धस्तर पर रोग-प्रतिरोधी नई किस्में विकसित करने का काम कर रहे हैं। भारत गन्ने के उत्पादन में पूरे विश्व में शीर्ष स्थान पर बना हुआ है।
आयात शुल्क में संतुलन
खाद्य तेलों (जैसे सूरजमुखी तेल) के आयात शुल्क पर उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार को घरेलू उपभोक्ताओं के लिए जरूरी चीजों की उपलब्धता और अपने किसानों के हितों के बीच बहुत ही संतुलित निर्णय लेना पड़ता है, ताकि बाजार स्थिर रहे और किसान को भी नुकसान न हो।
पराली पर दो टूक: 'किसान को खलनायक बनाकर प्रताड़ित करना कतई बर्दाश्त नहीं'
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिल्ली-एनसीआर में ठंड के मौसम में होने वाले वायु प्रदूषण और पराली के मुद्दे पर उठे सवाल का केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह ने बेहद स्पष्ट शब्दों में जवाब दिया औरप्रदूषण में पराली की घटती हिस्सेदारी का जिक्र करते हुए उन्होंने आंकड़ों के साथ बताया कि निरंतर संवाद और किसानों की जागरूकता के कारण वर्ष 2019-20 में जहां प्रदूषण में पराली का योगदान करीब 7 प्रतिशत था, वह अब घटकर लगभग 2.5 प्रतिशत रह गया है। किसान स्वयं पराली जलाना पसंद नहीं करते।
दंडात्मक कार्रवाई का विरोध
पर्यावरण नियमों के तहत खेतों को रेड जोन में डालने और किसानों पर सख्त कार्रवाइयों पर चिंता जताते हुए कृषि मंत्री शिवराज सिंह ने कहा कि प्रदूषण के लिए केवल किसान जवाबदार नहीं है। समाज में यह गलत चित्र पेश किया जाता है कि जैसे सारा प्रदूषण पराली के कारण ही हो रहा है। जब पराली जलती है तो उसका एक बहुत सीमित योगदान हो सकता है, लेकिन इसके नाम पर केवल किसानों को दोषी ठहराना, उन्हें खलनायक बनाना या उन्हें प्रताड़ित करना कतई उचित नहीं है। कृषि मंत्रालय किसानों के मान-सम्मान और हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। समस्या का हल किसानों से संवाद, उन्हें सहयोग और आधुनिक मशीनरी उपलब्ध कराकर ही निकाला जाएगा, उन पर बंदिशें या प्रताड़ना थोपकर नहीं।