Success Story: रासायनिक खेती का खर्च घटाकर जैविक खेती की ओर बढ़े वीरेंद्र सिंह, जायडेक्स की जायटॉनिक टेक्नोलॉजी से गेहूं की खेती में मिला फायदा बिहार में बदलेगी बागवानी की तस्वीर! वैज्ञानिकों ने उगाया एवोकाडो, ₹1500 किलो तक बिकता है फल Success Story: बैंगनी धान और गेहूं की खेती से किसानों की बदली तक़दीर, प्रति हेक्टेयर हो रही 1,60,000 रुपये तक की आमदनी! Pusa Corn Varieties: कम समय में तैयार हो जाती हैं मक्का की ये पांच किस्में, मिलती है प्रति हेक्टेयर 126.6 क्विंटल तक पैदावार! Watermelon: तरबूज खरीदते समय अपनाएं ये देसी ट्रिक, तुरंत जान जाएंगे फल अंदर से मीठा और लाल है या नहीं
Updated on: 9 September, 2026 3:42 PM IST

भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन का महत्वपूर्ण स्थान है. विशेष रूप से गाय, भैंस आदि दुधारू पशु पशुपालकों की आय का मुख्य साधन हैं. अधिकतम एवं निरंतर दूध उत्पादन प्राप्त करने के लिए पशु का संपूर्ण स्वास्थ्य अत्यंत आवश्यक है, जिसमें स्वस्थ एवं नियमित प्रजनन चक्र की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. एक स्वस्थ पशु ही समय पर हीट में आकर सफल गर्भाधान कर सकता है तथा स्वस्थ संतान और बेहतर उत्पादन प्रदान कर सकता है.

एक पशु के जीवन में प्रसव एक अत्यंत महत्वपूर्ण शारीरिक अवस्था है. प्रसव के बाद पशु कई महत्वपूर्ण शारीरिक परिवर्तनों से गुजरता है. प्रसवोत्तर काल पशु के आगामी स्वास्थ्य, प्रजनन क्षमता और उत्पादन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होता है. प्रसव के बाद समय पर जेर का गिरना, गर्भाशय की सफाई, लोचिया का निष्कासन, (प्रसव के बाद योनि से होने वाला स्राव है, जिसमें रक्त, बलगम और गर्भाशय के ऊतक शामिल होते हैं.) गर्भाशय का पुनः सामान्य आकार में आना तथा समय पर अगली हीट में आना अच्छे उत्पादन के साथ-साथ अगली सफल गर्भावस्था के लिए आवश्यक है.

यदि प्रसवोत्तर काल में उचित प्रबंधन नहीं किया जाए तो जेर का न गिरना (Retention of Placenta/ROP), गर्भाशय का संक्रमण (Metritis), गर्भाशय के अंदर मवाद (Pyometra), दुग्ध ज्वर/हाइपोकैल्सीमिया (Milk Fever/Hypocalcemia), कीटोसिस (Ketosis) तथा समय पर पशु का हीट में न आना जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं. इन समस्याओं के कारण दूध उत्पादन कम हो सकता है और दो प्रसवों के बीच का अंतराल बढ़ सकता है. इससे पशुपालक को आर्थिक नुकसान के साथ-साथ अतिरिक्त खर्च भी उठाना पड़ता है.

अतः प्रसवोत्तर काल में उचित प्रबंधन, संभावित समस्याओं तथा उनसे बचाव की जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण है.

जेर का समय पर गिरना क्यों आवश्यक है?

भ्रूणीय झिल्लियाँ (प्लेसेंटा) गर्भावस्था के दौरान माता और भ्रूण के बीच एक सेतु का कार्य करती हैं. भ्रूण को आवश्यक पोषक तत्व, ऊर्जा और ऑक्सीजन प्लेसेंटा के माध्यम से ही प्राप्त होते हैं. प्रसव के बाद भ्रूणीय झिल्लियों का समय पर बाहर निकलना पशु के सामान्य प्रसवोत्तर स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. जेर के समय पर बाहर निकलने से गर्भाशय की सफाई तथा उसके सामान्य अवस्था में लौटने की प्रक्रिया शुरू होने में सहायता मिलती है. समय पर जेर का निष्कासन केवल प्रसव की पूर्णता का संकेत नहीं है, बल्कि स्वस्थ गर्भाशय, बेहतर रिकवरी और भविष्य में सफल गर्भाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. सामान्यतः दुधारू पशुओं में भ्रूणीय झिल्लियाँ प्रसव के कुछ घंटों के भीतर बाहर आ जाती हैं. यदि 12 से 24 घंटे तक भ्रूणीय झिल्लियाँ बाहर नहीं निकलती हैं, तो इस स्थिति को रिटेंशन ऑफ प्लेसेंटा (ROP) कहा जाता है.

यदि जेर समय पर नहीं गिरती है, तो यह गर्भाशय में संक्रमण का कारण बन सकती है और कई प्रसवोत्तर समस्याओं को जन्म दे सकती है. रुकी हुई प्लेसेंटा बैक्टीरिया के लिए उपयुक्त माध्यम प्रदान करती है, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है. यह संक्रमण पशु के प्रजनन स्वास्थ्य के साथ-साथ उसके सामान्य स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकता है.

प्रसव के बाद खनिज और ऊर्जा की अतिरिक्त आवश्यकता-

प्रसव के बाद पशु को दूध उत्पादन, शरीर की रिकवरी, गर्भाशय के सामान्य अवस्था में लौटने तथा अगली गर्भावस्था के लिए पर्याप्त ऊर्जा एवं खनिजों की आवश्यकता होती है.

प्रसव के बाद जब दूध बनना शुरू होता है, तो शरीर से अधिक मात्रा में कैल्शियम दूध में जाने लगता है. यदि शरीर को पर्याप्त कैल्शियम की आपूर्ति नहीं हो पाती है, तो पशु के रक्त में कैल्शियम का स्तर कम हो जाता है. इस स्थिति को दुग्ध ज्वर ((मिल्क फीवर)) या हाइपोकैल्सीमिया (Hypocalcemia) कहा जाता है. मिल्क फीवर में पशु कमजोर हो जाता है, खाना-पीना कम कर देता है तथा शरीर का तापमान कम हो सकता है. स्थिति गंभीर होने पर पशु गर्दन को शरीर की तरफ मोड़कर बैठ सकता है और उठ नहीं पाता. अत्यधिक गंभीर अवस्था में बेहोशी जैसी स्थिति तथा मृत्यु भी हो सकती है.

जब पशु भोजन के माध्यम से जितनी ऊर्जा प्राप्त करता है, उससे अधिक ऊर्जा दूध उत्पादन और शरीर की आवश्यकताओं में खर्च हो जाती है, तो इस स्थिति को नेगेटिव एनर्जी बैलेंस (Negative Energy Balance) कहा जाता है. नेगेटिव एनर्जी बैलेंस के कारण कीटोसिस (Ketosis) जैसी समस्या उत्पन्न हो सकती है.

गर्भाशय का संक्रमण –

गर्भाशय में होने वाले संक्रमण एवं सूजन को मेट्राइटिस (Metritis) कहा जाता है. इसके मुख्य कारणों में प्रसव के दौरान संक्रमण, जेर का गर्भाशय के अंदर रह जाना, गर्भ में बच्चे की मृत्यु, कठिन प्रसव आदि शामिल हैं. मेट्राइटिस में पशु का सामान्य स्वास्थ्य प्रभावित होता है. पशु में तेज बुखार, गर्भाशय से बदबूदार स्राव, खाना-पीना कम कर देना तथा दूध उत्पादन में कमी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. ऐसी स्थिति में पशु न तो समय पर हीट में आता है और न ही आसानी से गर्भधारण कर पाता है.

गर्भाशय के अंदर मवाद (पायोमेट्रा)-

गर्भाशय के अंदर मवाद (Pus) जमा होने की स्थिति को पायोमेट्रा (Pyometra) कहा जाता है. इस स्थिति में गर्भाशय के अंदर मवाद बनता है, लेकिन सर्विक्स (Cervix) बंद रहने के कारण मवाद बाहर नहीं निकल पाता तथा धीरे-धीरे गर्भाशय के अंदर जमा होता रहता है. पायोमेट्रा से प्रभावित पशु सामान्य दिखाई दे सकता है, लेकिन उसमें हीट के लक्षण दिखाई नहीं देते. पशु को बार-बार ब्रीडिंग कराने के बावजूद गर्भधारण नहीं हो पाता.

प्रसव के बाद पशु का हीट में आना-

प्रसव के बाद पशु का दोबारा हीट में आना उसके सामान्य प्रजनन स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण संकेत है.

यदि पशु में प्रसव के बाद समय पर जेर गिरती है, गर्भाशय की उचित रिकवरी होती है, कोई संक्रमण नहीं होता तथा आवश्यक पोषक तत्वों की पर्याप्त पूर्ति होती है, तो पशु सामान्य रूप से समय पर हीट में आ सकता है. पशु को पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम, फॉस्फोरस, विटामिन D, विटामिन A, विटामिन E आदि पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है.

सुझाव

जैसा कि हम जानते हैं, प्रसवोत्तर अवधि में होने वाली विभिन्न समस्याओं के प्रबंधन में आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का भी उपयोग किया जाता है.

कुछ विशेष जड़ी-बूटियाँ जैसे भारद्वाजी, मंजीठ, नागरमोथा, मेथी, मंडूकपर्णी, कलौंजी, जटामांसी, पीपलामूल, अशोका, काला-जीरी, इन्द्रजौ, दशमूल आदि प्लुट्यून बोलस एवं सस्पेंशन में उपलब्ध हैं.

इसके साथ-साथ इसमें उपयुक्त मात्रा में कैल्शियम, फॉस्फोरस तथा विटामिन D3, विटामिन A और विटामिन E जैसे आवश्यक पोषक तत्व भी पाए जाते हैं.

प्लुट्यून गर्भाशय को शक्ति प्रदान करने, गर्भाशय के संकुचन में सहायता करने, गर्भाशय की सफाई तथा सामान्य प्रजनन प्रक्रिया को सहयोग करने में उपयोगी है. यह गर्भाशय को सामान्य अवस्था में वापस लाने तथा समय पर अगली हीट में आने में सहायता करता है.

प्लुट्यून में मौजूद कैल्शियम और फॉस्फोरस प्रसव के बाद पशु की खनिज आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता करते हैं. इसके अतिरिक्त इसमें कार्बोहाइड्रेट भी पाया जाता है, जो पशु की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायक होता है.

इस प्रकार प्लुट्यून एक शक्तिशाली गर्भाशय स्वास्थ्यवर्धक (टॉनिक) और गर्भाशय की संपूर्ण सफाई करने वाला संयोजन है, जो निम्न प्रकार से कार्य करता है-

➢ गर्भाशय को शक्ति प्रदान करता है तथा उसके संकुचन में सहायता करता है.
➢ गर्भाशय की सफाई करता है.
➢ जेर को गर्भाशय से अलग करता है.
➢ जेर एवं अपशिष्ट पदार्थों के निष्कासन में सहायता करता है.
➢ गर्भाशय को पुनः अपने सामान्य आकार में आने में सहायता करता है.
➢ पशु को समय पर हीट में आने में सहायता करता है.
➢ पशु को बेहतर दूध उत्पादन क्षमता बनाए रखने में सहायता करता है.
➢ प्रसव के बाद होने वाले नेगेटिव एनर्जी बैलेंस के प्रबंधन में सहायता करता है.
➢ हाइपोकैल्सीमिया/दुग्ध ज्वर (Milk Fever) के जोखिम को कम करने में सहायता करता है.

लेखक- डॉ. उत्तम बाजपेई (M.V.Sc., B.V.Sc.), डॉ. सत्यनारायण (B.V.Sc. & A.H.)
सुशीमा फार्मास्युटिकल्स प्रा. लि.

English Summary: post calving dairy cow health reproductive management retained placenta
Published on: 09 September 2026, 03:55 PM IST

कृषि पत्रकारिता के लिए अपना समर्थन दिखाएं..!!

प्रिय पाठक, हमसे जुड़ने के लिए आपका धन्यवाद। कृषि पत्रकारिता को आगे बढ़ाने के लिए आप जैसे पाठक हमारे लिए एक प्रेरणा हैं। हमें कृषि पत्रकारिता को और सशक्त बनाने और ग्रामीण भारत के हर कोने में किसानों और लोगों तक पहुंचने के लिए आपके समर्थन या सहयोग की आवश्यकता है। हमारे भविष्य के लिए आपका हर सहयोग मूल्यवान है।

Donate now