गणतंत्र दिवस 2026 की पूर्व संध्या पर घोषित पद्म पुरस्कारों ने इस बार उन 'अनसंग हीरोज' को सलाम किया है, जिन्होंने प्रयोगशालाओं की चहारदीवारी और खेतों की मेड़ों पर अपना जीवन राष्ट्र सेवा में खपा दिया. 131 पुरस्कारों की इस प्रतिष्ठित फेहरिस्त में कृषि क्षेत्र का दबदबा भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सशक्तिकरण का प्रमाण है. इस वर्ष 5 प्रख्यात कृषि वैज्ञानिकों और 4 प्रगतिशील किसानों को पद्म सम्मान के लिए चुना गया है. जहां डॉ. अशोक कुमार सिंह और डॉ. पी.एल. गौतम जैसे वैज्ञानिकों ने अपने शोध से देश की खाद्य सुरक्षा को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया, वहीं महाराष्ट्र के श्रीरंग देवाबा लाड और असम के जोगेश देउरी जैसे किसानों ने नवाचारों के जरिए पारंपरिक खेती को मुनाफे के व्यवसाय में बदल दिया.
इन विभूतियों ने हाशिये पर पड़े समुदायों और दूरदराज के इलाकों में विकास की नई इबारत लिखी है, जिससे करोड़ों किसानों के जीवन में समृद्धि और सम्मान का संचार हुआ है.
1. कृषि विज्ञान के स्तंभ: अनुसंधान से समृद्धि तक
इन वैज्ञानिकों ने न केवल डिग्री हासिल की, बल्कि अपनी मेधा को किसानों के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया:
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डॉ. अशोक कुमार सिंह (उत्तर प्रदेश): भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) पूसा के पूर्व निदेशक के रूप में डॉ. सिंह का योगदान ऐतिहासिक है. उन्होंने 25 से अधिक उच्च उपज वाली चावल की किस्में विकसित कीं. उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि भारत की पहली जीनोम-संपादित (Genome-edited) चावल किस्म को सह-विकसित करना है, जो जलवायु परिवर्तन के दौर में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती है. उन्होंने मीथेन उत्सर्जन को कम कर कृषि को पर्यावरण के अनुकूल बनाया.
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डॉ. पी. एल. गौतम (हिमाचल प्रदेश): देश की जैविक संपदा को सुरक्षित करने में डॉ. गौतम का नाम सर्वोपरि है. उन्होंने नेशनल जीन बैंक को न केवल क्रियाशील बनाया बल्कि भारत के पहले 'प्लांट जर्मप्लाज्म रजिस्ट्रेशन सिस्टम' की नींव रखी. उनके प्रयासों से आज भारत के पास अपनी पारंपरिक फसलों का एक सुरक्षित डेटाबेस है.
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डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी (बिहार): आरपीसीएयू (RPCAU) के पूर्व कुलपति डॉ. त्रिवेदी ने बिहार की खेती को आधुनिक मोड़ दिया. उन्होंने लीची के पुराने बगीचों को 'कैनोपी मैनेजमेंट' के जरिए पुनर्जीवित किया. उन्होंने किसानों को धान-गेहूं के चक्र से निकालकर मखाना, सिंघाड़ा और शीतकालीन मक्का जैसी नकदी फसलों की ओर प्रेरित किया.
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डॉ. एन. पुन्नियमूर्ति (तमिलनाडु): पशु चिकित्सा के क्षेत्र में डॉ. मुर्थी ने 'एंटीबायोटिक प्रतिरोध' की गंभीर चुनौती का समाधान दिया. उन्होंने थनैला (Mastitis) और खुरपका-मुंहपका (FMD) जैसे रोगों के लिए पारंपरिक हर्बल उपचार विकसित किए. अब तक 8 लाख से अधिक गायों का इलाज उनके द्वारा विकसित फॉर्मूलों से हुआ है, जिससे दूध में एंटीबायोटिक अवशेषों की समस्या कम हुई है.
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डॉ. के. रामासामी पलानीस्वामी (तमिलनाडु): विशिष्ट श्रेणी में पद्म भूषण से सम्मानित डॉ. पलानीस्वामी ने चिकित्सा क्षेत्र, विशेषकर गैस्ट्रोएंटरोलॉजी में 50 वर्षों की सेवा दी है. उन्होंने गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल एंडोस्कोपी के सुरक्षा मानकों को वैश्विक स्तर पर पहुँचाया और देश में चिकित्सा शिक्षा को नई दिशा दी.
2. धरती पुत्र: जिन्होंने खेतों में लिखा नया इतिहास
इन किसानों ने अपनी मेहनत और नवाचार से यह साबित कर दिया कि खेती घाटे का सौदा नहीं है:
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श्रीरंग देवाबा लाड (महाराष्ट्र): 78 वर्ष की आयु में भी युवाओं के लिए प्रेरणा बने श्रीरंग जी ने 'दादा लाड कॉटन टेक्नोलॉजी' विकसित की. इस तकनीक की विशेषता यह है कि इसने कपास की उत्पादकता को सीधे तीन गुना बढ़ा दिया. उनकी इस पद्धति को ICAR ने भी सराहा है, जिससे आज महाराष्ट्र के हजारों कपास किसान ऋण मुक्त हो रहे हैं.
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जोगेश देउरी (असम): उत्तर-पूर्व में रेशम उत्पादन (Sericulture) को एक उद्योग बनाने का श्रेय जोगेश जी को जाता है. उन्होंने 'इंटीग्रेटेड बोडोलैंड सिल्क पार्क' बनाकर 1,600 से अधिक गांवों को एक सूत्र में पिरोया. उनके प्रयासों से एरी सिल्क के क्षेत्र में 70% कार्यबल महिलाओं का है, जो महिला सशक्तिकरण की एक अद्भुत मिसाल है.
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रघुपत सिंह (उत्तर प्रदेश - मरणोपरांत): एक दलित किसान के रूप में रघुपत जी का जीवन संघर्ष और शोध का संगम था. उन्होंने पांच दशकों तक बिना किसी सरकारी मदद के 100 से अधिक फसलों की किस्में तैयार कीं. उन्होंने 30 से अधिक ऐसी प्रजातियों को बचाया जो विलुप्त होने की कगार पर थीं, जिससे 3 लाख से ज्यादा किसानों को प्रत्यक्ष लाभ हुआ.
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रामा रेड्डी मामिदी (तेलंगाना - मरणोपरांत): सहकारी आंदोलन के जनक माने जाने वाले रामा रेड्डी जी ने 'महिला डेयरी सहकारी समितियों' के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता दी. उन्होंने सहकारी कानूनों में सुधार करवाकर किसानों के हक की लड़ाई को कानूनी मजबूती प्रदान की.