डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा और इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ एक्सटेंशन एजुकेशन (INSEE) के संयुक्त तत्वावधान में 27 जून से विद्यापति सभागार में तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन देश भर से आये कृषि वैज्ञानिकों ने एक सौ से अधिक अनुसंधान पत्र प्रस्तुत किया. सम्मेलन का विषय कृषि-खाद्य प्रणालियों में महिलाओं की भूमिका को पुनर्परिभाषित करना: सतत कृषि विकास के लिए विस्तार रणनीतियाँ है जिसमें देश भर के कृषि वैज्ञानिक, नीति निर्माता और प्रगतिशील किसान इसमें भाग ले रहे हैं.
28 जून को तकनीकी सत्र 2 का विषय लिंग संवेदी कृषि प्रसार एवं सलाहकार सेवाए रही जिसकी अध्यक्षता डॉ. सतीश कुमार सिंह और सह-अध्यक्ष डॉ. राजीव बलीराम काले ने की. इस सत्र में चालीस से अधिक पेपर प्रस्तुत किया गया. डॉ. अधिकराव धनाजी जाधव ने रेशम की खेती से ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण का सहभागी मॉडल पर अपना पत्र प्रस्तुत किया. श्रम घटाने पर सुश्री विनीता कश्यप ने जबकि वर्षा कुमारी ने मक्का प्लांटर और टमाटर में निराई पद्धतियों का एर्गोनॉमिक मूल्यांकन पर अपने विचार प्रस्तुत किये. कपिल कुमार ने समावेशी प्रसार के लिए सहभागी वीडियो टूल पर डिजिटल ग्रीन मॉडल के अनुभव के बारे में विस्तार से जानकारी दी.
तकनीकी सत्र-3 का विषय - महिलाएं, नवाचार और तकनीक पर केंद्रित रहा जिसके अध्यक्ष डॉ. वी.वी. सदामते और सह-अध्यक्ष कैप्टन डॉ. एल.बी. कलंत्री थे. राधा ठाकुर ने “हाशिये से मुख्यधारा तक महिलाओं की एजेंसी”और डॉ. एस.एस. डोली ने “स्टार्टअप्स से महिला सशक्तिकरण” पर केस स्टडी पर अपने विचार रखे. डॉ. आर.बी. भरसावड़कर ने सिंचाई में एआई और डॉ. अमित कुमार ने आइ ओ टी आधारित मिट्टी नमी निगरानी पर शोध साझा किया.
इससे पहले 27 जून को उद्घाटन सत्र के बाद तकनीकी सत्र-1 का विषय “सतत कृषि-खाद्य प्रणालियों में परिवर्तन वाहक के रूप में महिलाएं”थी जिसकी अध्यक्षता डॉ. एम.एम. अधिकारी और सह-अध्यक्षता डॉ. संगीता देव ने की. बैंगलोर कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. के. नारायण गौड़ा ने “कृषि में महिलाओं का योगदान” और नेपाल के पूर्व कृषि सचिव डॉ. योगेंद्र कुमार कार्की ने “सतत कृषि के लिए महिलाओं की भूमिका” पर पत्र प्रस्तुत किया. डॉ. एम.एल. मीना ने मुजफ्फरपुर में जलवायु अनुकूलन की बाधाओं और डॉ. निधि ने बिहार में पशुधन-डेयरी में महिलाओं की निर्णय क्षमता पर शोध साझा किया. महिला एग्री-स्टार्टअप, मिलेट जैव विविधता और ग्लेडियोलस खेती से आजीविका पर भी 15 से अधिक पत्र प्रस्तुत हुए.
कांफ्रेंस के आयोजन सचिव डॉ. राम दत्त, निदेशक, स्कूल ऑफ एग्री-बिजनेस एंड रूरल मैनेजमेंट ने कहा, कि यह सम्मेलन सिर्फ शोध पत्रों का संकलन नहीं है, बल्कि जमीनी समाधान का मंच है. हमें हर केवीके में महिला किसान सहायता डेस्क बनानी होगी और प्रसार कार्यकर्ताओं को जेंडर संवेदी प्रशिक्षण देना होगा. विश्वविद्यालय कुलपति डॉ पी एस पांडेय के नेतृत्व में महिला उद्यमिता को स्टार्टअप इन्क्यूबेशन और बाजार लिंकेज से जोड़ रहा है. सहभागी वीडियो, श्रम घटाने वाले यंत्र और डिजिटल टूल को महिला समूहों के माध्यम से बड़े पैमाने पर ले जाना ही लक्ष्य है.
सम्मेलन में 48 पोस्टर प्रदर्शित हुए और शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुआ. रविवार को नीति गोलमेज के साथ सम्मेलन का समापन होगा. आयोजकों के अनुसार यहां से निकली सिफारिशें कृषि मंत्रालय को भेजी जाएंगी ताकि महिला केंद्रित प्रसार नीति को मजबूती मिले.