नैडेप कम्पोस्ट जैविक खाद बनाने की एक प्रभावी और कम लागत वाली विधि है, जिसमें कृषि अवशेष, मिट्टी, पानी और कम मात्रा में गोबर का उपयोग किया जाता है. महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के किसान नारायण राव पांडरी पांडे, जिन्हें ‘नैडेप काका’ के नाम से जाना जाता है, ने इस विधि को विकसित किया. ईंटों से बने विशेष जालीदार ढांचे में जैविक कचरे की परतें बिछाकर खाद तैयार की जाती है. उचित नमी और वायु संचार बनाए रखने पर लगभग 90 से 110 दिनों में कम्पोस्ट तैयार हो जाती है. इससे किसानों को खेतों में जैविक पोषक तत्व उपलब्ध कराने का सस्ता और उपयोगी विकल्प मिलता है.
नैडेप कम्पोस्ट की विशेषताएं-
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इस विधि में समतल जमीन पर ईंटों का एक विशेष प्रकार का जालीदार ढांचा घेरा बनाया जाता है.
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इस घेरे में ईंटों को सीमेंट से इस प्रकार जोड़ा जाता है कि ढांचों में वायु संचार हेतु प्राप्त छेद हो.
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ढांचे की दीवारें 9 से 10 इंची मोटी बनाई जाती है.
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ढांचे को ऊपरी तथा निचले दो पंक्तियों में किसी प्रकार का कोई छेद नहीं होता है.
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ढांचे की लंबाई किसान भाई अपनी जरूरत के अनुसार थोड़ा बहुत घटा बढ़ा सकते हैं.
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इस विधि में गाय के गोबर का ही उपयोग करना सर्वोत्तम होता है. इसमें खेतों एवं उद्यानों का कचरा जो की सड़- गल सके तथा मिट्टी और पानी की जरूरत होती है.
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इस विधि द्वारा कंपोस्ट 90 से 110 दिनों में बनकर तैयार हो जाती है.
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8-- इस प्रकार तैयार कंपोस्ट में 75-1.75 प्रतिशत नाइट्रोजन, 0.7-09 प्रतिशत फास्फोरस तथा 1.2-1.4 प्रतिशत पोटाश के साथ अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में होते हैं.
ढांचा भरने की विधि
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ऊपर बताए गए आकर के ढांचे में कंपोस्ट तैयार करने के लिए खेतों एवं उद्यानों का कचरा जैसे फसलों के डढंल, पत्ती, तना, जडें , आदि का 1400-1500 किलोग्राम गोबर 60-100 किलोग्राम, सूखी मिट्टी 1800 किलोग्राम एवं पानी 1500-2000 लीटर मौसम के अनुसार की जरूरत पड़ती है.
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ढांचा को भरने से पहले 4 से 5 किलोग्राम गोबर को 10 से 15 लीटर पानी में घोलकर ढांचे के सतह या फर्स एवं अंदर के दीवारों पर अच्छी तरह छिड़क देना चाहिए.
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इसके बाद 200 से 210 किलोग्राम कचरे की 8 से 10 इंच मोटी एक तह बिछा देना चाहिए.
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पुनः इस प्रथम तह पर 0 किलोग्राम गोबर या बायोगैस सारी को 125 से 150 लीटर पानी में घोलकर अच्छी तरह छिड़क देना चाहिए
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इसके ऊपरी दूसरी तह सुखी मिटटी जिसमें कांच, पत्थर के टुकड़े या प्लास्टिक आदि न हो, की 200-225 किलोग्राम मात्रा का तह बिछा दें.
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अब मिट्टी की सतह पर समुचित पानी की मात्रा का छिड़काव कर दें जिससे गीलापन बना रहे.
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इस प्रक्रिया को तब तक दोहराते रहे जब तक की पूरा ढांचा भर ना जाए. वैसे लगभग 6 से 7 बार में यह प्रक्रिया दोहराने पर ढांचा भर जाता है.
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ढांचे की भराई 2 फीट ऊपर तक करनी चाहिए.
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इस प्रकार से ढांचे को भरने के बाद इसके ऊपर से 3 इंची से लेकर 4 इंची मोटी मिट्टी एवं गाय के गोबर से लिपाई कर ढांचे की छत को बीच में ऊंचा एवं दोनों तरफ ढलान रखा जाता है जिस वर्षा का पानी ऊपर से अंदर न जा सके.
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क्योंकि ढांचा को भरने हेतु आवश्यक सभी सामान एकत्र करना एक दिन में संभव नहीं होता है, अतः अच्छा यह होगा कि सभी सामान 8 से 10 दिनों तक किसी छायेदार स्थान पर एकत्र कर लें, फिर भराई का काम एक ही दिन में पूरा कर लें.
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लगभग 40 से 45 दिनों के बाद ढांचा करीब 10 से 12 इंच तक धंस जाएगा ऊपर की सतह पर दरारें दिखने लगेगी.
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ऐसी अवस्था में ढांचा को पुनः उपरोक्त बताई गई विधि से भरकर ऊपर से मिट्टी गोबर के मिश्रण से लिपाई कर दें.
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कंपोस्ट अच्छा बने इसके लिए यह जरूरी है कि ढांचे में समुचित नमी उपलब्ध रहे.
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अतः दोबारा भरते समय गोबर के घोल से ढांचे के कचरे को भली-भांति तर कर दें.
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इस प्रकार 90 से 110 दिनों में अच्छी कंपोस्ट बनकर तैयार हो जाती है.
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अनुमानतः उपरोक्त आकार के एक ढांचे से करीब 35 क्विंटल कंपोस्ट प्राप्त होता है. इसमें कुछ करीब पांच कुंतल अधसडीं हो सकती है जिसे प्रयोग में लाने से पहले अलग कर देना चाहिए.
कंपोस्ट की गुणवत्ता बढ़ाना
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कचरा एवं मिट्टी की तह बीच एक हल्की तह 3से 4 मुट्ठी भर रां - फास्फेट या सिंगल सुपर फास्फेट बढ़ा देने से कंपोस्ट की गुणवत्ता काफी बढ़ जाती है.
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एक ढांचे के लिए सिंगल सुपर फास्फेट की तीन से चार किलोग्राम मात्रा प्राप्त होती है.
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इसके अतिरिक्त ढांचे के भरने के 75 से 80 दिनों के बाद ढांचे की छत पर बांस की सहायता से नीचे की सतह तक जगह-जगह पर छिद्र कर दें.
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इन छिद्रों में 500 ग्राम पी,सी,बी, 500 ग्राम एजेटोबेक्टर, 500 ग्राम राइजीबियम को 23 लीटर पानी में घोल बनाकर डाल दें एवं पुनः इन छिद्रों को लिप कर बंद कर छोड़ दें. इससे कंपोस्ट की गुणवत्ता बढ़ाने के साथ-साथ कंपोस्ट बनाने की प्रक्रिया में भी तेजी आती है.
लेखक- रबीन्द्रनाथ चौबे, ब्यूरो चीफ, कृषि जागरण, बलिया, उत्तरप्रदेश