कला अधूरी, विज्ञान अधूरा, दुनियादारी तक अधूरी महिलाओं बिन,
कृषि कार्य, ग्रामीण सोच, झोंपड़-पट्टी, सब अधूरे ग्रामीण महिलाओं बिन।
मार्मिक स्पर्श से लदीं, आंसू-पसीना प्रति-दिन बहातीं, ग्रामीण महिलाएं,
घर, परिसर, गांव में, बिल्ली, गिलहरी, चिड़िया विचरते, देन महिलाओं की।
पहचान महिलाओं को, दुधारू पशु दूध देने, बैल खेत जाने, आतुर हो जाते।
बन अंदर से संन्यासिन, हो बाहर से सांसारिक, अपना दायित्व निभातीं,
खेत, आदान, जिंस, बुवाई, कटाई, खलिहान के कार्यों में, पूर्ण भागीदारी निभातीं।
गांव स्तर पर, वित्त जुटातीं, बीज, ईंधन उपलब्ध करातीं, धर्म अपना निभातीं,
पशु रखरखाव, दुग्ध उत्पादन, कृषि उत्पाद लेन-देन में भारी भागीदारी करतीं।
स्कूल जाते मासूमों, खेत जाते सदस्यों व घर की व्यवस्थाएं सम्भालतीं,
स्कूल यूनिफॉर्म, पुस्तकें, नाश्ता, अंधेरे में पशुओं को चारा, दूध निकालना,
सब कुछ समय पर, बेहद फुर्ती से, पूरा कर देतीं, भारतीय ग्रामीण महिलाएं।
स्वस्थ, हरित वातावरण में पनपतीं, कृषि यज्ञशाला में, ये रोज़, तपा करतीं,
शुद्ध दूध-दही से पोषित, महिलाएं ऊर्जावान रहतीं, चुनौतियों से टकरातीं।
ग्रामीण महिलाएं शान बनीं अब, अनुसंधान संस्थाओं, विश्वविद्यालयों की,
राजनीति, प्रशासन, प्रबंधन, पुलिस, फ़ौज, कोई क्षेत्र अब अछूता नहीं,
टैक्सी, ट्रैक्टर, ट्रक, ट्रेन दौड़ाना, ट्रांसपोर्ट सम्भालना अब आम बात इनकी।
झिझक-शर्म त्याग, ले आईं गांवों को शहर तुल्य, बनाया खेतों को इन्होंने,
कृषि पर्यटन स्थल, दिया मोड़ कृषि को, शहरी खिंचे आते, लौटना भूल जाते।
21वीं सदी की महिलाएं, त्याग-तपन की कोशिकाओं से गठित, कर्मठ महिलाएं,
सरलता, सादगी से लदी, फौलाद बनीं, अभेद किला हैं महिलाएं कृषि की, भारत की।
- डॉ. डी. कुमार, जोधपुर