दुनिया आज ग्रामीण महिलाओं के योगदान को याद कर रही है. हर साल की तरह चाय समोसे के साथ गोष्ठियाँ होंगी, पानी पी पीकर प्रखर भाषण दिए जाएंगे. मुट्ठियां भींच कर महिला सशक्तीकरण के संकल्प एक बार फिर से दोहराए जाएंगे और स्त्री-पुरुष समानता के पक्ष में कुछ और नए प्रस्ताव पारित होंगे. लेकिन इन तमाम आयोजनों के बीच एक सवाल है, जिस पर शायद ही पर्याप्त चर्चा होगी.
क्या हमने कभी उस ग्रामीण महिला का पूरा जीवन समझने की कोशिश की है, जो सूरज निकलने से पहले काम पर लग जाती है और रात को सबके सो जाने के बाद ही अपने दिन का हिसाब पूरा कर पाती है? बस्तर की जनजातीय महिलाओं को देखिए. उनके जीवन को समझने के बाद एहसास होता है कि स्त्री-शक्ति पर बड़े-बड़े भाषण देने वाले समाज को उनसे अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है.
बस्तर की महिला केवल खेत में काम करने वाली मजदूर नहीं है. वह बीज बोती है, निराई-गुड़ाई करती है, फसल काटती है, अनाज घर लाती है, उसे साफ करती है और परिवार के भोजन की व्यवस्था करती है. भोजन पकाने के लिए जंगल से लकड़ी लाना, पत्तों से दोना-पत्तल बनाना, दातून के लिए साल या करंज की खास आकार की टहनियाँ तोड़ कर दातून तैयार करना, पशुओं की देखभाल करना, गोबर उठाना, पशुशाला साफ करना और दूर से पानी ढोकर लाना भी उसी के हिस्से आता है. बच्चों को पालना और घर की व्यवस्था संभालना तो उसके दायित्वों की स्थायी सूची में शामिल है ही.
लेकिन उसकी दुनिया घर और खेत की सीमाओं में समाप्त नहीं होती. जंगल उसके लिए केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि जीवन का विस्तृत भंडार है. महुआ, उमरी, अमचूर, तेंदूपत्ता, सालबीज, हर्रा, बहेड़ा, कंद-मूल, फल, मशरूम, गोंद और अनेक वनौषधियों के संग्रह में उसकी बड़ी भूमिका होती है.
वह इन उत्पादों को जुटाती है, छांटती है, सुखाती है, प्रसंस्कृत करती है और स्थानीय साप्ताहिक बाजारों तक पहुंचाकर बेचती है. इस तरह वह परिवार की खाद्य सुरक्षा से लेकर उसकी नकदी आय तक में योगदान देती है. इन परिवारों में पारंपरिक पेय लांदा और मंद ( महुआ की शराब) तैयार करने की प्रक्रिया में भी महिलाओं की शत-प्रतिशत भूमिका होती है.
जरा सोचिए, कृषि उत्पादन से लेकर घरेलू प्रबंधन तक, जंगल से बाजार तक और परंपरा से आजीविका तक फैले इस विराट कार्य-संसार का आर्थिक मूल्यांकन यदि किया जाए, तो कितनी बड़ी अर्थव्यवस्था का अदृश्य आधार हमारे सामने आएगा! फिर भी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की गणना और विकास की योजनाओं में इस श्रम का बड़ा हिस्सा अदृश्य क्यों बना रहता है?
ये महिलाएं श्रम की मशीनें नहीं, जीवन की जादूगरनियां हैं. दिनभर अथक परिश्रम करने के बाद जब शाम को गांव की चौपाल या देवगुड़ी में सामुदायिक नृत्य का अवसर आता है, तो वही महिला अपने पति और समुदाय के दूसरे सदस्यों के साथ कदम से कदम मिलाकर नृत्य करती दिखाई देती है. उसके चेहरे पर थकान से अधिक जीवन का उल्लास होता है. यही बस्तर की स्त्री का अद्भुत व्यक्तित्व है. वह प्रकृति से संघर्ष भी करती है, उसके साथ सहजीवन भी निभाती है और जीवन की कठिनतम परिस्थितियों में भी उत्सव का अवसर खोज लेती है.
यहां एक बात समझना आवश्यक है. जनजातीय समाज कोई एकरूप समाज नहीं है. अलग-अलग समुदायों और क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति, परंपराएं और अधिकार अलग-अलग हो सकते हैं. फिर भी बस्तर के अनेक समुदायों में महिलाओं की कृषि, घरेलू अर्थव्यवस्था और सामुदायिक जीवन में भागीदारी इतनी व्यापक है कि उसे समझे बिना उस समाज की वास्तविक तस्वीर बन ही नहीं सकती. कुछ क्षेत्रों में महिलाओं को पारिवारिक और सामुदायिक निर्णयों में ऐसी व्यावहारिक भागीदारी प्राप्त है, जिसकी कल्पना कई तथाकथित आधुनिक समाजों में आज भी अधूरी है.
विडंबना देखिए कि एक ओर हम संसद से सड़क तक महिलाओं को बराबरी का अधिकार देने की मांग करते हैं, दूसरी ओर जब संपत्ति, संसाधनों, आय और निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति साझा करने की बारी आती है, तो हमारे कदम पीछे हटने लगते हैं. महिला के श्रम की प्रशंसा हमें स्वीकार है, लेकिन उसके श्रम पर उसका अधिकार स्थापित करने में संकोच होता है. उसके त्याग पर कविता लिखना आसान है, लेकिन उसकी उपज का उचित मूल्य दिलाना कठिन लगता है. उसे देवी कहना सहज है, लेकिन घर, खेत और बाजार के फैसलों में बराबरी का स्थान देना अब भी चुनौती बना हुआ है.
बस्तर की महिलाओं से हमें यह सीखना चाहिए कि समानता केवल कानून की किताबों में दर्ज कोई अवधारणा नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में निभाया जाने वाला व्यवहार है. आज ग्रामीण महिलाएं सरपंच बन रही हैं, विद्यालयों और सामुदायिक संस्थाओं का नेतृत्व कर रही हैं, खेती और उद्यम चला रही हैं. देश की राष्ट्रपति महामहिम द्रौपदी मुर्मू का संथाल जनजातीय समुदाय से आना और सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुंचना भी इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण है कि ग्रामीण और जनजातीय पृष्ठभूमि की महिलाएं अवसर मिलने पर नेतृत्व की ऊंचाइयों तक पहुंच सकती हैं. हालांकि किसी एक महिला की उपलब्धि से सभी महिलाओं की समस्याएं समाप्त नहीं हो जातीं.
आज आवश्यकता केवल महिला सशक्तीकरण के नारों की नहीं, बल्कि कुछ ठोस बदलावों की है. महिलाओं के कृषि और वन उपज संबंधी श्रम को आर्थिक पहचान मिले. उन्हें भूमि और संपत्ति पर अधिकार, बाजार तक सीधी पहुंच, उचित मूल्य, प्रसंस्करण की सुविधाएं, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और वित्तीय निर्णयों में स्वतंत्रता मिले. जल, जंगल और जमीन से संबंधित नीतियां बनाते समय उनकी आवाज सुनी जाए. विकास की योजनाओं में उन्हें केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुभव और निर्णय क्षमता से संपन्न भागीदार माना जाए.
अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस पर बस्तर की उन तमाम महिलाओं को मेरा सादर प्रणाम, जिनके हाथों में बीज हैं, सिर पर लकड़ियों का बोझ है, टोकरी में जंगल की समृद्धि है और आंखों में परिवार तथा समाज के बेहतर भविष्य का सपना है.
जो समाज स्त्री-पुरुष समानता का वास्तविक अर्थ समझना चाहता है, उसे बस्तर की इन महिलाओं के जीवन से सीखना चाहिए. उनसे यह भी सीखना चाहिए कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर, सीमित संसाधनों में और सामुदायिक सहयोग के सहारे जीवन कैसे जिया जाता है.
इन महिलाओं को केवल एक दिन सलाम करना पर्याप्त नहीं. उनके श्रम को सम्मान, उनके अधिकारों को सुरक्षा और उनके निर्णयों को महत्व देना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी. क्योंकि जिन महिलाओं के कंधों पर खेत, जंगल, बाजार, परिवार और संस्कृति का इतना बड़ा संसार टिका है, उन्हें सशक्त बनाने की बात करना ही अपने आप में अधूरा है. वे पहले से ही शक्ति का स्रोत हैं. जरूरत है तो केवल इस शक्ति को पहचानने, उसका सम्मान करने और उसे उसका उचित अधिकार देने की.
बस्तर की ग्रामीण महिलाओं को सलाम, जो समानता की मांग भर नहीं करतीं, बल्कि अपने श्रम, साहस और जीवन से विकसित कहलन वाले हमारे शहरी समाज को उसका असल अर्थ समझाती हैं.
लेखक: डॉ राजाराम त्रिपाठी कृषि तथा ग्रामीण अर्थ व्यवस्था के विशेषज्ञ तथा राष्ट्रीय संयोजक अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा)