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किसान संगठनों के दबाव के बाद व्हाइट हाउस फैक्ट शीट की भाषा नरम, दाल का उल्लेख हटाया गया
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कृषि को ‘एफटीए से बाहर’ बताने के बावजूद शुल्क असंतुलन के गंभीर संकेत कायम
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अमेरिकी कृषि आयात में 34 प्रतिशत वृद्धि, भारतीय निर्यात वृद्धि मात्र 5 प्रतिशत
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डेयरी, दाल, सेब, नारंगी पर संभावित रियायतों से छोटे किसानों में व्यापक चिंता
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अमेरिकी कृषि मंत्री ने डील को अपने किसानों के लिए लाभकारी बताया
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देशव्यापी विरोध, पारदर्शिता, नीति निर्धारण में सहभागिता और ठोस सुरक्षा उपायों की मांग
“झुक सकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए.”
भारत के किसान संगठनों ने जब इस डील पर अपना स्पष्ट और कठोर रुख दिखाया, तो संभवतः उसकी गूंज वाशिंगटन तक पहुंची. फिलहाल तो यही निर्णायक कारण प्रतीत होता है कि व्हाइट हाउस द्वारा जारी फैक्ट शीट की भाषा में संशोधन करना पड़ा. पहले जहां “certain pulses” अर्थात '"कुछ दालों" पर टैरिफ घटाने का उल्लेख था, संशोधित दस्तावेज में दाल का जिक्र हटा दिया गया. “Committed” "प्रतिबद्ध" की जगह “Intends” "इरादा" शब्द का प्रयोग किया गया और उत्पादों की सूची से “agricultural” शब्द भी quietly हटा दिया गया.
यह बदलाव संकेत देता है कि किसान संगठनों की आपत्ति ने असर डाला है. परंतु यह भी सच है कि जो दिखाई दे रहा है, वह इस समझौते का केवल दृश्य भाग है. अभी भी बहुत कुछ धुंध में है.
भारत-अमेरिका डील के दस्तख़त अभी सूखे भी नहीं हैं और खेतों में चिंता की फसल लहलहाने लगी है. यह कोई सामान्य व्यापार समझौता नहीं, बल्कि वह दस्तावेज़ प्रतीत होता है जिसमें किसान का हल, खेत की मेड़ और गांव की आत्मा को “अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा” के नाम पर गिरवी रखने की तैयारी है.
भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर जो धुंध फैली है, वह केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी है. जिस देश की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती पर निर्भर है, वहां यदि व्यापार नीति का केंद्र किसान हित न होकर कॉरपोरेट संतुलन हो जाए, तो विरोध का उगना स्वाभाविक है.
किसान संगठनों का विरोध केवल नारेबाज़ी नहीं है. यह उस आशंका की अभिव्यक्ति है कि कहीं भारत की कृषि वही राह न पकड़ ले जो कई विकासशील देशों ने पकड़ी और अंततः खाद्य संप्रभुता खो बैठे. 12 फरवरी का प्रस्तावित देशव्यापी विरोध इसी भय की सार्वजनिक घोषणा है.
सरकार का दावा है कि कृषि को एफटीए से बाहर रखा गया है. लेकिन वास्तविकता यह है कि अमेरिका द्वारा भारतीय वस्तुओं पर शुल्क 2023-24 में शून्य से बढ़कर पहले 3 प्रतिशत और फिर 18 प्रतिशत तक पहुंच गया, जबकि भारतीय बाजार में अमेरिकी कृषि उत्पादों पर लगने वाले 30 से 150 प्रतिशत तक के शुल्कों में ढील दी जा रही है. इसे मुक्त व्यापार कहा जाए या एकतरफा उदारता? यदि यह मुक्त व्यापार है, तो पलड़ा केवल एक तरफ ही क्यों झुका दिखाई देता है?
यह समझौता उस असमान दौड़ जैसा है जिसमें एक पक्ष के पास ट्रैक्टर, तकनीक और ट्रिलियन डॉलर की सब्सिडी है और दूसरे पक्ष के पास केवल पसीना, परंपरा और उम्मीद. इसे प्रतिस्पर्धा कहना शब्दों के साथ अन्याय है.
गैर-शुल्क बाधाओं को हटाने की सहमति का अर्थ यह भी है कि अमेरिका से दूध और डेयरी उत्पादों का आयात आसान हो सकता है. जिस देश में दुग्ध उत्पादन करोड़ों छोटे किसानों की आजीविका का आधार है, वहां यह आश्वासन नहीं, चेतावनी है. गांवों में किसान सीधे प्रश्न कर रहे हैं कि इस समझौते से उन्हें क्या लाभ होगा और क्या हानि. हालांकि, भारत सरकार देश के किसानों संगठनों को विश्वास में लेकर समुचित रणनीति के साथ आपदा बनी इस डील को अवसर में भी बदल सकती है.
बाजार की अस्थिरता, कर्ज़ का बोझ और लागत वृद्धि पहले ही किसान की कमर तोड़ चुकी है. यदि सस्ते आयात की बाढ़ आई, तो “सोने की चिड़िया” का पंख किसान के खेत से ही नोचा जाएगा.
सेब उत्पादकों की चिंता इसका ठोस उदाहरण है. अमेरिका से आने वाले सेब पर आयात शुल्क 50 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत किया गया. न्यूनतम आयात मूल्य 80 रुपये प्रति किलो तय किया गया है, जिससे अमेरिकी सेब लगभग 100 रुपये प्रति किलो भारत पहुंचेगा. लेकिन हिमाचल प्रदेश के उत्पादकों को आशंका है कि यह भी घरेलू सेब बाजार को अस्थिर कर सकता है. यदि कोल्ड एटमॉस्फियर स्टोरेज में प्रीमियम सेब रखना घाटे का सौदा बन गया, तो पहाड़ की अर्थव्यवस्था पर गंभीर आघात होगा.
आंकड़े स्थिति स्पष्ट करते हैं. जनवरी से नवंबर 2025 के बीच अमेरिका से भारत का कृषि आयात 34 प्रतिशत बढ़कर लगभग 2.85 से 2.9 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि भारत से अमेरिका को कृषि निर्यात मात्र 5 प्रतिशत बढ़ा. बादाम और पिस्ता जैसे ड्राई फ्रूट्स का आयात 1.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया. यह असंतुलन केवल व्यापार घाटा नहीं, नीति का दर्पण है.
दालों का मुद्दा विशेष रूप से संवेदनशील है. प्रारंभिक फैक्ट शीट में “certain pulses” का उल्लेख था, जिससे देश के दलहन किसानों में व्यापक चिंता हुई. भारत विश्व का सबसे बड़ा दाल उत्पादक और उपभोक्ता है. दाल केवल प्रोटीन का स्रोत नहीं, खाद्य सुरक्षा का स्तंभ है. संशोधित फैक्ट शीट में दाल का उल्लेख हटाया गया है. यह किसान संगठनों के दबाव का परिणाम माना जा रहा है. परंतु यह भी स्पष्ट है कि बातचीत अभी जारी है और समझौते को अंतिम रूप नहीं मिला है.
अमेरिकी कृषि मंत्री ब्रुक रोलिन्स का यह कहना कि यह डील अमेरिकी किसानों के लिए लाभकारी होगी, बहुत कुछ कह देता है. प्रश्न यह नहीं कि अमेरिका अपने किसानों का हित देख रहा है. प्रश्न यह है कि भारत अपनी कृषि नीति को किस दृष्टि से देख रहा है.
इतिहास बताता है कि असमान व्यापार समझौते कमजोर पक्ष को अधिक क्षति पहुंचाते हैं. एडम स्मिथ ने भी मुक्त व्यापार को समान शक्ति संतुलन की शर्त पर न्यायोचित माना था. भारत और अमेरिका की कृषि संरचनाएं समान नहीं हैं. वहां विशाल फार्म, भारी सब्सिडी और तकनीकी बढ़त है. यहां छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनके लिए खेती उद्योग नहीं, जीवनरेखा है.
कौटिल्य ने कहा था कि राज्य की समृद्धि प्रजा की समृद्धि पर निर्भर है. “अन्नं बहु कुर्वीत” अर्थात अन्न की प्रचुरता ही स्थायित्व का आधार है. यदि नीतियां अन्न उत्पादक को असुरक्षित कर दें, तो विकास का दावा खोखला हो जाता है.
देश की खाद्य सुरक्षा आयात से भरे गोदामों से नहीं, जीवित मिट्टी से आती है. यदि किसानों और मिट्टी पर भरोसा कम हुआ, तो मंडियों में चाहे विदेशी माल सजा रहे, देश भीतर से निर्भर और कमजोर होता जाएगा.
समझौते कागज़ पर स्याही से लिखे जाते हैं, पर उनका असर खेतों में पसीने से मापा जाता है. यदि नीति और ज़मीन के बीच संवाद टूटा, तो असंतोष स्याही सूखने से पहले अंकुरित हो जाता है.
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता अभी भी आंशिक रूप से अस्पष्ट है. यदि सरकार समय रहते किसानों को विश्वास में लेकर सभी शर्तें सार्वजनिक करती है, ठोस सुरक्षा उपाय घोषित करती है और नीति निर्माण में सहभागिता सुनिश्चित करती है, तो यह समझौता अवसर भी बन सकता है. अन्यथा इतिहास फिर दोहराया जाएगा, जहां विकास आगे बढ़ जाता है और किसान पीछे छूट जाता है. और इस बार दांव पर केवल खेती नहीं, बल्कि भारत की आत्मनिर्भरता और उसका सामूहिक भविष्य है.
लेखक: डॉ. राजाराम त्रिपाठी, आर्थिक मामलों के जानकार तथा राष्ट्रीय संयोजक, अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा)