-
डायबिटीज के बढ़ते खतरे के बीच कटहल पर बढ़ा ध्यान, वैज्ञानिक बोले- पोषण और किसानों की आय दोनों के लिए महत्वपूर्ण
-
डायबिटीज के बढ़ते खतरे के बीच ‘सुपरफूड’ बन रहा कटहल, किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए नई उम्मीद
समस्तीपुर। भारत में मधुमेह (डायबिटीज) के बढ़ते मामलों ने लोगों का ध्यान एक बार फिर पारंपरिक और स्थानीय खाद्य पदार्थों की ओर खींचा है। इसी संदर्भ में कटहल (जैकफ्रूट) को लेकर वैज्ञानिकों और पोषण विशेषज्ञों के बीच चर्चा तेज हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि पोषक तत्वों और आहार रेशे (डाइटरी फाइबर) से भरपूर कटहल संतुलित आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। साथ ही यह किसानों के लिए आय बढ़ाने वाली फल फसल के रूप में भी नई संभावनाएं पैदा कर रहा है।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरपीसीएयू), पूसा के पूर्व सह निदेशक अनुसंधान एवं केला अनुसंधान संस्थान, गोरौल के प्रधान (अतिरिक्त प्रभार) प्रो. (डॉ.) एस.के. सिंह ने कहा कि कटहल केवल एक मौसमी फल नहीं, बल्कि पोषण, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि उद्यमिता की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण वृक्ष है। उन्होंने बताया कि कटहल में आहार रेशा, विटामिन-सी, पोटैशियम, एंटीऑक्सिडेंट तथा कई उपयोगी फाइटोकेमिकल्स पाए जाते हैं, जो समग्र स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माने जाते हैं।
संतुलित आहार का हिस्सा बन सकता है कटहल
प्रो. सिंह के अनुसार कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में कटहल आधारित खाद्य उत्पादों, विशेषकर कटहल के आटे और कच्चे कटहल को संतुलित आहार में उपयोगी पाया गया है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि कटहल किसी भी प्रकार से मधुमेह की दवा नहीं है और न ही इसका सेवन चिकित्सकीय उपचार का विकल्प हो सकता है। उन्होंने कहा कि किसी भी स्वास्थ्य संबंधी स्थिति में चिकित्सकीय सलाह और संतुलित खानपान सबसे महत्वपूर्ण है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती जीवनशैली संबंधी बीमारियों के बीच स्थानीय और पोषणयुक्त खाद्य पदार्थों को बढ़ावा देना आवश्यक है। कटहल इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर उभर रहा है।
बिहार में व्यावसायिक खेती की बड़ी संभावना
बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में कटहल के पेड़ लंबे समय से मौजूद हैं, लेकिन अभी भी इसकी व्यावसायिक खेती और प्रसंस्करण की संभावनाओं का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाया है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि किसानों को गुणवत्तापूर्ण पौधे, वैज्ञानिक प्रबंधन और बाजार की सुविधा मिले तो कटहल एक लाभकारी फल फसल साबित हो सकता है।
कटहल गर्म एवं आर्द्र जलवायु में अच्छी वृद्धि करता है। अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी तथा 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान इसके लिए उपयुक्त माना जाता है। बिहार की कृषि-जलवायु परिस्थितियां इसकी खेती के लिए अनुकूल हैं।
उन्नत किस्मों से बढ़ सकती है आमदनी
विशेषज्ञों के अनुसार खजवा, स्वर्ण मनोहर और स्वर्ण पूर्ति जैसी उन्नत किस्में किसानों को बेहतर उत्पादन और गुणवत्ता प्रदान कर सकती हैं। व्यावसायिक बागवानी के लिए ग्राफ्टेड पौधों का उपयोग अधिक लाभकारी माना जाता है, क्योंकि इनमें अपेक्षाकृत जल्दी फलन शुरू होता है और पौधों की गुणवत्ता में समानता बनी रहती है।
वैज्ञानिकों ने किसानों को प्रमाणित नर्सरियों से पौधे लेने और वैज्ञानिक अनुशंसाओं के अनुसार रोपण करने की सलाह दी है।
मूल्यवर्धन में छिपी है असली कमाई
कटहल की बढ़ती लोकप्रियता का एक बड़ा कारण इसके प्रसंस्कृत उत्पाद हैं। कटहल से चिप्स, आटा, पल्प, अचार, जैम, चटनी और रेडी-टू-कुक उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इसके बीज भी खाद्य उत्पादों में उपयोग किए जा सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों की आय में वास्तविक वृद्धि तभी संभव है, जब वे केवल कच्चे फल बेचने तक सीमित न रहकर मूल्यवर्धन और प्रसंस्करण से जुड़ें। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में लघु कृषि उद्योगों और स्वरोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं।
पोषण सुरक्षा और कृषि विविधीकरण का साधन
प्रो. सिंह ने कहा कि कटहल ऐसा वृक्ष है जो एक बार स्थापित होने के बाद कई वर्षों तक उत्पादन देता है। इसके फल, बीज और अन्य भाग विभिन्न उपयोगों में काम आते हैं। यही कारण है कि इसे पोषण सुरक्षा, कृषि विविधीकरण और जलवायु-अनुकूल बागवानी के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
उन्होंने कहा कि बदलती जलवायु, बढ़ती स्वास्थ्य चुनौतियों और किसानों की आय बढ़ाने की आवश्यकता को देखते हुए कटहल जैसे स्थानीय फलदार वृक्षों को बढ़ावा देना समय की मांग है। यह न केवल उपभोक्ताओं को पौष्टिक खाद्य विकल्प उपलब्ध करा सकता है, बल्कि किसानों के लिए अतिरिक्त आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए नए अवसर भी पैदा कर सकता है।
रिपोर्टर- रामजी कुमार।