उत्तर प्रदेश में गन्ना खेती को आधुनिक तकनीकों से जोड़कर किसान बेहतर उत्पादन हासिल कर रहे हैं. राज्य गन्ना प्रतियोगिता वर्ष 2025-26 में बुलंदशहर जिले के रतनपाल सिंह ने अपनी उन्नत कृषि पद्धतियों के दम पर प्रदेश स्तर पर पहचान बनाई है. ड्रिप विधि से सिंचाई पौधा संवर्ग में रतनपाल सिंह पुत्र झगडू सिंह, ग्राम एलमपुर, जोन अगौता, जिला बुलंदशहर ने 1821.00 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर तृतीय स्थान हासिल किया है.
गन्ना विकास विभाग, उत्तर प्रदेश द्वारा राज्य गन्ना प्रतियोगिता वर्ष 2025–26 के परिणाम घोषित किए गए हैं. इस प्रतियोगिता के सात संवर्गों- शीघ्र पौधा, पेड़ी, सामान्य पौधा, ड्रिप विधि से सिंचाई पौधा व पेड़ी तथा युवा गन्ना किसान पौधा व पेड़ी के अंतर्गत पूरे प्रदेश से कुल 1078 आवेदन प्राप्त हुए. विभाग द्वारा नामित कटाई अधिकारियों से प्राप्त परिणामों के आधार पर किसानों को प्रदेश स्तर पर विजेता घोषित किया गया. विभाग के अनुसार, विजेता किसानों ने वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों, उन्नत बीजों और ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीकों का बेहतर उपयोग करते हुए उल्लेखनीय उपज हासिल की.
लगभग 11 हेक्टेयर में करते हैं गन्ने की खेती
रतनपाल सिंह लगभग 11 हेक्टेयर भूमि में गन्ने की खेती करते हैं. उनके खेतों में विशेष रूप से शरदकालीन गन्ने की खेती पर जोर दिया जाता है. उनके अनुसार सही समय पर बुवाई के साथ बेहतर किस्मों और आधुनिक तकनीकों का प्रयोग उनकी खेती की प्रमुख विशेषताओं में शामिल है.
रतनपाल सिंह का मानना है कि गन्ने की एक ही किस्म को लंबे समय तक लगातार बोते रहने के बजाय समय-समय पर नई किस्मों का प्रयोग किया जाना चाहिए. उनका मानना है कि किसी गन्ने की किस्म को लगभग 5 से 7 वर्ष तक ही बोना चाहिए और इसके बाद नई किस्मों को अपनाना चाहिए, जिससे उपज और गुणवत्ता में निरंतरता बनाए रखने में मदद मिल सके.
रासायनिक और प्राकृतिक दोनों विधियों का प्रयोग
रतनपाल सिंह खेती में अलग-अलग कृषि पद्धतियों का प्रयोग करते हैं. उनके खेतों के लगभग 8 हेक्टेयर हिस्से में रासायनिक विधि से खेती की जाती है, जबकि करीब 3 हेक्टेयर में प्राकृतिक विधि का प्रयोग किया जाता है. इस तरह वे अपने खेतों में दोनों पद्धतियों के साथ खेती का अनुभव भी विकसित कर रहे हैं.
सिंचाई प्रबंधन में भी वे विशेष सावधानी बरतते हैं. गन्ने की फसल में वे जरूरत के अनुसार ही सिंचाई करते हैं. उनके अनुसार जब मिट्टी का रंग सफेद दिखाई देने लगता है, तब सिंचाई की जाती है. इस तरीके से अनावश्यक सिंचाई से बचने और पानी की बचत करने का प्रयास किया जाता है. साथ ही, फसल को अतिरिक्त नमी से बचाने में भी यह तरीका उपयोगी माना जाता है.
ट्रेंच विधि से बेहतर जमाव और अधिक उत्पादन
गन्ने की खेती में रतनपाल सिंह ट्रेंच विधि का भी प्रयोग करते हैं. उनके अनुभव के अनुसार इस विधि से गन्ने की पैदावार सामान्य विधि की तुलना में 35 से 40 प्रतिशत तक अधिक हो सकती है. ट्रेंच विधि से बुवाई करने पर गन्ने का जमाव लगभग 80 से 90 प्रतिशत तक बताया गया है, जबकि सामान्य विधि में यह करीब 40 से 45 प्रतिशत तक रहता है.
गन्ने के साथ सहफसली खेती पर जोर
रतनपाल सिंह अपने खेतों में गन्ने के साथ सहफसली खेती भी करते हैं. गन्ने के साथ वे सरसों, फूलगोभी, बैंगन, गेंदे का फूल, पत्तागोभी और करेला जैसी फसलों की खेती करते हैं. इससे गन्ने की मुख्य फसल के साथ छोटी अवधि वाली फसलों को भी खेत में शामिल करने का अवसर मिलता है. सहफसली खेती के जरिए वे खेत के उपलब्ध स्थान का बेहतर उपयोग करने का प्रयास करते हैं.
गन्ना बीज उत्पादन में भी सक्रिय
रतनपाल सिंह केवल गन्ने की व्यावसायिक खेती तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे गन्ना बीज उत्पादक के रूप में भी कार्य करते हैं. वे सरकार द्वारा लाई जा रही गन्ने की नई किस्मों को अपनाने और उनके बीज उत्पादन से जुड़े कार्यों में भी सक्रिय हैं. इससे उन्हें नई किस्मों और उनके प्रदर्शन को खेत स्तर पर समझने का अवसर मिलता है.
प्रदेश स्तर पर बनाई पहचान
रतनपाल सिंह की खेती में आधुनिक सिंचाई, ट्रेंच विधि, उन्नत किस्मों का प्रयोग, सहफसली खेती और प्राकृतिक कृषि पद्धति जैसे विभिन्न प्रयोग शामिल हैं. राज्य गन्ना प्रतियोगिता 2025-26 में 1821 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज के साथ तीसरा स्थान हासिल करना उनके कृषि प्रयासों को प्रदेश स्तर पर पहचान देता है. इसके अलावा, इन्हें पूर्व में भी सहफसली खेती में उत्कृष्टता के लिए प्रदेश स्तर पर अवार्ड मिल चुका है.
लगभग 11 हेक्टेयर में गन्ने की खेती करते हुए उन्होंने तकनीक, समय पर बुवाई, सिंचाई प्रबंधन, किस्मों के चयन और सहफसली खेती को अपने कृषि मॉडल का हिस्सा बनाया है. उनका अनुभव यह दर्शाता है कि गन्ने की खेती में उत्पादन बढ़ाने के लिए खेत की परिस्थितियों के अनुसार सही तकनीक और प्रबंधन पद्धतियों का प्रयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.