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क्या एथेनॉल वास्तव में किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम है, या नई आर्थिक निर्भरता की शुरुआत?
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क्या सोशल मीडिया पर एथेनॉल और इंजनों को लेकर फैलाए जा रहे दावे सच हैं?
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क्या सरकार ने किसानों को विश्वास में लिए बिना बहुत तेज़ी से नीति लागू कर दी?
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क्या भारत को पेट्रोलियम से मुक्ति मिलेगी या जल संकट और फसल असंतुलन बढ़ेगा?
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कोंडागांव की हालिया एक घटना बताती है कि केवल कारखाने नहीं, नीतियाँ भी जनता के विश्वास पर चलती हैं.
बस्तर के कोंडागांव की वह हालिया रात आज भी मेरे मन में ताज़ा है. लगभग दो दशक तक चर्चाओं में रहने के बाद, सात वर्षों की प्रशासनिक और तकनीकी मशक्कत के पश्चात जिस औद्योगिक परियोजना को इस क्षेत्र के किसानों की समृद्धि का नया सूर्योदय बताया गया था, उसके उद्घाटन से पहले तक उम्मीदों की फसल लहलहा रही थी. कहा गया था कि यहाँ मक्के से ग्लूकोज़ बनेगा, मक्के का तेल बनेगा, जैव-अपघटित प्लास्टिक बनेगा, पशु आहार बनेगा और लगभग 140 प्रकार के मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार होंगे. किसानों को लगा कि अब उनकी उपज केवल अनाज नहीं, उद्योग का कच्चा माल बनेगी.
लेकिन रातों-रात कहानी बदल गई. समाचार आया कि अब उसी कारखाने का प्रमुख उद्देश्य एथेनॉल उत्पादन होगा.
कारखाना पूरी क्षमता से चल भी नहीं पाया था कि आसपास के गाँवों से शिकायतें आने लगीं. लोगों ने दुर्गंध की बात कही. अपशिष्ट जल को लेकर आशंकाएँ व्यक्त कीं. प्रशासन ने प्रारंभिक शिकायतों को सामान्य औद्योगिक विरोध मानकर अधिक गंभीरता नहीं दिखाई. फिर एक रात पास के गाँव में आई बारात ने फैक्ट्री से आती दुर्गंध के कारण भोजन करने से इनकार कर दिया. देखते ही देखते विवाद बढ़ा, आक्रोश फूटा और अंततः भीड़ ने संयंत्र पर हमला कर दिया. भारी पुलिस बल बुलाना पड़ा.
यह केवल एक फैक्ट्री की कहानी नहीं थी. यह उस दूरी की कहानी थी जो भारत में अक्सर नीति और जनता के बीच पैदा हो जाती है.
विकास केवल मशीनों से नहीं होता, विश्वास से होता है. यदि किसान, ग्रामीण और स्थानीय समाज किसी नीति के सहभागी न हों तो करोड़ों रुपये की परियोजना भी संदेह के बोझ तले दब जाती है. यही प्रश्न आज देश की एथेनॉल नीति के सामने भी खड़ा है.
एथेनॉल के बारे में देश में इस समय दो चरम धारणाएँ चल रही हैं. एक पक्ष इसे किसानों की आर्थिक स्वतंत्रता का महामंत्र बता रहा है. दूसरा पक्ष इसे खेती, पानी, वाहनों और अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी सिद्ध करने पर तुला है. दुर्भाग्य यह है कि दोनों पक्षों में शोर और शंकाएं अधिक है, अध्ययन तथा सच्चाई कम.
भारत जैसे देश में किसी भी नीति का मूल्यांकन न तो नारों से हो सकता है और न ही सोशल मीडिया की वायरल पोस्टों से. यहाँ तथ्य, विज्ञान, किसान का अनुभव और राष्ट्रीय हित, चारों को साथ लेकर चलना होगा.
भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है. हम अपनी पेट्रोलियम आवश्यकता का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं. हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये का विदेशी मुद्रा व्यय केवल कच्चे तेल के आयात पर होता है. ऐसे में यदि पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक एथेनॉल मिलाकर आयात निर्भरता घटाने का प्रयास किया जा रहा है तो उसके पीछे आर्थिक तर्क भी है और रणनीतिक सोच भी.
यही कारण है कि केंद्र सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को तेज गति से आगे बढ़ाया. गन्ने के शीरे, गन्ने के रस, क्षतिग्रस्त खाद्यान्न, मक्का और अब कृषि अवशेषों से भी एथेनॉल उत्पादन को प्रोत्साहित किया जा रहा है. उद्देश्य स्पष्ट है - किसानों को नया बाजार मिले, तेल आयात घटे और कार्बन उत्सर्जन कम हो.
लेकिन यहीं से असली बहस शुरू होती है.
क्या हर अच्छी मंशा अच्छी नीति भी बन जाती है?
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसका किसान है और सबसे बड़ी कमजोरी भी यही है कि अधिकांश नीतियाँ किसान तक पहुँचने से पहले ही फाइलों में परिपूर्ण मान ली जाती हैं. किसान को बताया नहीं जाता, केवल आदेश सुनाया जाता है. उसे सहभागी नहीं बनाया जाता, केवल लाभार्थी मान लिया जाता है.
एथेनॉल नीति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. किसानों के बीच व्यापक संवाद नहीं हुआ. किस क्षेत्र में कौन-सी फसल उपयुक्त होगी, जल उपलब्धता क्या है, स्थानीय पर्यावरणीय प्रभाव क्या होंगे, छोटे किसानों को लाभ कैसे मिलेगा, इन प्रश्नों पर सार्वजनिक विमर्श अपेक्षित स्तर पर नहीं हुआ.
किसी भी नई तकनीक का विरोध करना बुद्धिमानी नहीं है. लेकिन बिना सामाजिक संवाद के तकनीक को लागू करना भी दूरदर्शिता नहीं कहलाता.
आज सोशल मीडिया पर एथेनॉल को लेकर अनेक दावे किए जा रहे हैं. कहीं कहा जा रहा है कि इससे हर इंजन कुछ वर्षों में कबाड़ बन जाएगा. कहीं यह प्रचार किया जा रहा है कि पूरी नीति केवल कुछ उद्योगपतियों या राजनीतिक परिवारों को लाभ पहुँचाने के लिए बनाई गई है. दूसरी ओर कुछ लोग इसे ऐसा अमृत बता रहे हैं मानो इससे किसानों की सभी समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी.
सच्चाई इन दोनों अतियों के बीच कहीं खड़ी है.
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने सड़क अवसंरचना के क्षेत्र में जिस कार्यगति का परिचय दिया है, उसे नकारना कठिन है. राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार, एक्सप्रेसवे और भारतमाला जैसी परियोजनाएँ उनकी प्रशासनिक क्षमता का प्रमाण हैं. इसी प्रकार वैकल्पिक ईंधनों को बढ़ावा देने का उनका आग्रह भी ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है.
किन्तु किसी मंत्री की नीयत और किसी नीति की गुणवत्ता, दोनों अलग-अलग प्रश्न हैं. लोकतंत्र में नीति का मूल्यांकन व्यक्ति-भक्ति या व्यक्ति-विरोध से नहीं, उसके परिणामों से होना चाहिए. एथेनॉल नीति भी इसी कसौटी पर परखी जानी चाहिए.
लोकतंत्र में किसी नीति का मूल्यांकन व्यक्ति-भक्ति या व्यक्ति-विरोध से नहीं, उसके परिणामों से होना चाहिए. एथेनॉल नीति भी इसी कसौटी पर परखी जानी चाहिए.
दरअसल, भारत ने एथेनॉल मिश्रण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है. *वर्ष 2013-14 में पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण 1.5 प्रतिशत से भी कम था, जो 2025-26 में बढ़कर 20 प्रतिशत तक पहुँच गया.* सरकार के अनुसार यह लक्ष्य निर्धारित समय से पाँच वर्ष पहले प्राप्त कर लिया गया. इसी अवधि में एथेनॉल की खरीद लगभग 38 करोड़ लीटर से बढ़कर 1200 करोड़ लीटर से अधिक हो गई तथा देश की उत्पादन क्षमता लगभग 421 करोड़ लीटर से बढ़कर लगभग 2000 करोड़ लीटर प्रतिवर्ष तक पहुँच गई.
निस्संदेह, यह उपलब्धि छोटी नहीं है. इससे पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाने, विदेशी मुद्रा की बचत करने और कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में भारत ने एक साहसिक कदम उठाया है. यही कारण है कि अमेरिका, ब्राज़ील और यूरोप के अनेक देश भी दशकों से जैव-ईंधनों का उपयोग कर रहे हैं. अंतर केवल इतना है कि वहाँ नीति के साथ अनुसंधान, जनसंवाद और स्थानीय परिस्थितियों का भी समान महत्व रखा गया.
भारत में समस्या मात्र एथेनॉल नहीं है, समस्या है हमारी पुरानी प्रशासनिक बीमारी, "पहले नीति, पहले, योजना, पहले निर्णय, आखिर में जब बात बिगड़ने लगे तब संवाद."
यदि किसी किसान से पूछा ही नहीं जाएगा कि उसके क्षेत्र में गन्ना उपयुक्त है या मक्का? भूजल कितना उपलब्ध है? स्थानीय उद्योग की पर्यावरणीय क्षमता क्या है,? उक्त खेती से उसे वास्तव में हर साल कितना फायदा हो पा रहा है? तो नीति, योजना , निर्णय का कागज़ पर सफल और ज़मीन पर विवादग्रस्त बनना स्वाभाविक है.
यहीं मुझे कोंडागांव की वही घटना याद आती है. यदि आरंभ से ही ग्रामीणों को विश्वास में लिया गया होता, प्रदूषण नियंत्रण की पारदर्शी व्यवस्था दिखाई गई होती और स्थानीय किसानों को साझेदार बनाया गया होता, उनकी समस्याओं का समय रहते निदान किया गया होता तो शायद पुलिस की गाड़ियों से पहले किसानों की ट्रैक्टर-ट्रॉलियाँ उस उद्योग की रक्षा करतीं.
दुर्भाग्य से भारत में विकास का अर्थ अक्सर संवाद नहीं, उद्घाटन समारोह,फ्लेक्स,पोस्टर, भव्य उद्घाटन और उसका फुलपेजिया विज्ञापन बनकर रह जाता है.
इधर सोशल मीडिया पर एक और विचित्र प्रवृत्ति दिखाई दे रही है. कुछ लोग एथेनॉल को ऐसा राक्षस सिद्ध करने में लगे हैं मानो पेट्रोल में उसकी एक बूंद पड़ते ही इंजन का अंतिम संस्कार निश्चित हो जाए. दूसरी ओर कुछ लोग उसे ऐसा पारस पत्थर बता रहे हैं कि मानो उसके मिलते ही किसान रातों-रात करोड़पति बन जाएगा. दोनों अतिवाद विज्ञान के नहीं, प्रचार के उदाहरण हैं.
हाल के दिनों में वाहन इंजनों को लेकर अनेक दावे सामने आए. सरकार और अधिकांश वाहन निर्माताओं का कहना है कि आधुनिक E20-अनुकूल वाहनों में व्यापक इंजन क्षति के प्रमाण नहीं मिले हैं. हाँ, कुछ पुराने मॉडलों में ईंधन दक्षता में लगभग 3 से 5 प्रतिशत तक कमी तथा कुछ रबर ईंधन-पुर्ज़ों और विशेष परिस्थितियों में तकनीकी सावधानियों की आवश्यकता बताई गई है. ARAI की रिपोर्ट ने भी पुराने E10 आधारित वाहनों के कुछ घटकों पर संभावित प्रभाव की ओर संकेत किया है. इसलिए इस विषय पर भावनाओं नहीं, स्वतंत्र वैज्ञानिक परीक्षणों की आवश्यकता है.
लोकतंत्र में जनता को आश्वासन नहीं, प्रमाण चाहिए. यदि करोड़ों वाहन मालिकों के मन में शंका है तो सरकार का दायित्व है कि वह स्वतंत्र संस्थाओं से दीर्घकालिक परीक्षण कराए और परिणाम सार्वजनिक करे. विज्ञान में प्रश्न पूछना अपराध नहीं होता, उत्तर छिपाना अवश्य चिंता का विषय बन जाता है.
इसी प्रकार नितिन गडकरी को लेकर सोशल मीडिया पर जो आरोप लगाए जा रहे हैं कि एथेनॉल नीति केवल उनके परिवार या किसी एक कंपनी को लाभ पहुँचाने के लिए बनाई गई है, वे भी उपलब्ध आँकड़ों से पुष्ट नहीं होते. भारत का वार्षिक एथेनॉल बाजार कई अरब लीटर का है और उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार तथा अन्य राज्यों की अनेक चीनी मिलें, डिस्टिलरी और जैव-ईंधन इकाइयाँ इसमें भागीदारी कर रही हैं. किसी भी लोकतंत्र में आलोचना तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए, कल्पनाओं पर नहीं.
हाँ, यह भी उतना ही सत्य है कि किसी मंत्री की नीयत अच्छी होने मात्र से नीति त्रुटिहीन नहीं हो जाती. श्री नितिन गडकरी ने राष्ट्रीय राजमार्गों और अवसंरचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं, यह स्वीकार करने में किसी को संकोच नहीं होना चाहिए. परन्तु भारतमाला जैसी परियोजनाओं में समय-समय पर अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप भी सामने आए हैं. इसलिए यदि सरकार "शून्य सहनशीलता" की बात करती है तो उसे हर स्तर पर पारदर्शिता भी सुनिश्चित करनी होगी. उपलब्धि और उत्तरदायित्व, दोनों साथ-साथ चलते हैं.
अब एक बात उन लोगों से भी, जो रसायन विज्ञान से अधिक व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय पर भरोसा करने लगे हैं.
आजकल एथेनॉल पर जितनी बहस हो रही है, उसे देखकर कभी-कभी लगता है कि भारत सचमुच कृषि प्रधान से अधिक "अफवाह प्रधान" देश बनने की ओर बढ़ चला है. आठवीं कक्षा में जिन बच्चों ने एथाइल अल्कोहल का सूत्र रटा था, वही बड़े होकर यह पूछ रहे हैं कि "एथेनॉल में चींटियाँ क्यों नहीं लगतीं?" मानो रसायन विज्ञान भी अब सोशल मीडिया की अनुमति लेकर काम करेगा.
यदि केवल "अल्कोहल" शब्द सुनकर ही चींटियाँ दौड़ पड़तीं, तो देश की हर शराब की दुकान पर सबसे लंबी कतार चींटियों की होती. एथेनॉल बनने की पूरी औद्योगिक प्रक्रिया होती है. गन्ने का रस सीधे पेट्रोल टैंक में नहीं पहुँच जाता. किण्वन, आसवन, निर्जलीकरण और शोधन जैसी अनेक वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के बाद ईंधन-ग्रेड एथेनॉल तैयार होता है. विज्ञान को समझने का श्रम किए बिना विज्ञान का उपहास करना हमारी बौद्धिक आलस्य का प्रमाण है, वैज्ञानिकता का नहीं.
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि हर सरकारी दावे को अंतिम सत्य मान लिया जाए. नीति का धर्म प्रश्नों से भागना नहीं, प्रश्नों का उत्तर देना है.
भारत को एथेनॉल चाहिए, पर उससे भी अधिक चाहिए विवेक. हमें वैकल्पिक ईंधन चाहिए, पर उससे भी अधिक चाहिए वैकल्पिक सोच. हमें तकनीक चाहिए, पर तकनीक के साथ पारदर्शिता भी चाहिए. किसान केवल कच्चा माल देने वाला नहीं, नीति का सह-निर्माता होना चाहिए. और एक बात जो हमें कभी नहीं भूलनी चाहिए वह यह है कि 'एथेनॉल' ईधन कोई अंतिम विकल्प नहीं है तथा और बेहतर ईंधन की संभावनाएं अभी भी खुली हुई हैं , और आगे भी खुली रहेगी.
यदि एथेनॉल नीति किसानों की आय बढ़ाती है, आयातित तेल पर निर्भरता घटाती है, पर्यावरण को लाभ पहुँचाती है और वैज्ञानिक कसौटियों पर खरी उतरती है, तो उसका स्वागत होना चाहिए. लेकिन यदि इससे कहीं जल संकट बढ़ता है, स्थानीय पर्यावरण प्रभावित होता है, छोटे किसान पीछे छूटते हैं या उपभोक्ता की वास्तविक चिंताओं को नज़रअंदाज़ किया जाता है, तो समय रहते समीक्षा भी उतनी ही आवश्यक है.
राष्ट्र का भविष्य किसी एक ईंधन से तय नहीं होगा. वह इस बात से तय होगा कि हम नीति बनाते समय जनता को सहभागी बनाते हैं या केवल दर्शक. ऊर्जा का भविष्य पेट्रोल और एथेनॉल के अनुपात से कम, सरकार और समाज के बीच विश्वास के अनुपात से अधिक तय होगा.
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण होता है जनविश्वास.
लेखक: डॉ राजाराम त्रिपाठी कृषि व ग्रामीण अर्थशास्त्र विशेषज्ञ तथा राष्ट्रीय-संयोजक अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा)