ओल (जिमीकंद/सूरन वैज्ञानिक नाम (Amorphophallus Paeoniifolius) की फसल में पत्तियों का पीला पड़ना, मोजेक जैसे धब्बे दिखाई देना, पौधों का बौना रह जाना तथा कंदों का अपेक्षित विकास नहीं होना किसानों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या केवल पोषक तत्वों की कमी नहीं, बल्कि विषाणुजनित रोग, रस चूसने वाले कीटों के प्रकोप और असंतुलित पोषण का संयुक्त प्रभाव हो सकती है.
प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह, विभागाध्यक्ष, पौध रोग एवं सूत्रकृमि विभाग. प्रधान (अतिरिक्त प्रभार), केला अनुसंधान संस्थान, गोरौल, वैशाली. पूर्व सह निदेशक अनुसंधान एवं पूर्व प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर, बिहार ने केला अनुसंधान संस्थान, गोरौल (वैशाली) के प्रधान एवं पौध रोग विशेषज्ञ प्रो. (डॉ.) एस.के. सिंह ने ग्रामीण क्षेत्रों में फसलों के अवलोकन के दौरान ओल की एक फसल में ऐसे ही लक्षण देखे. प्रारंभिक तौर पर इसे कॉलर रॉट रोग की आशंका माना गया, लेकिन निकट निरीक्षण में पत्तियों पर मोजेक लक्षण, पीलापन, सिकुड़न और पौधों की अवरुद्ध वृद्धि स्पष्ट रूप से दिखाई दी. साथ ही कुछ पौधों में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के संकेत भी मिले.
मोजेक वायरस बन रहा बड़ी चुनौती
डॉ. सिंह के अनुसार ओल मोजेक वायरस (Elephant Foot Yam Mosaic Virus) वर्तमान में फसल के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है. इस रोग में पत्तियों पर गहरे और हल्के हरे रंग के धब्बे, नसों के आसपास पीलापन, पत्तियों का मुड़ना तथा पौधों का बौना रह जाना प्रमुख लक्षण हैं. संक्रमित पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्षमता घट जाती है, जिससे कंदों का विकास प्रभावित होता है और उपज में 30 से 70 प्रतिशत तक कमी आ सकती है.
उन्होंने बताया कि यह वायरस मुख्य रूप से एफिड, थ्रिप्स एवं अन्य रस चूसने वाले कीटों द्वारा फैलता है. जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के कारण इन कीटों की संख्या में वृद्धि देखी जा रही है, जिससे संक्रमण का खतरा भी बढ़ रहा है.
पोषक तत्वों की कमी भी जिम्मेदार
विशेषज्ञों के अनुसार जिंक, आयरन, मैग्नीशियम, पोटाश और बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी भी पत्तियों के पीलेपन और पौधों की कमजोर वृद्धि का प्रमुख कारण बन रही है. जिंक की कमी से नई पत्तियां छोटी रह जाती हैं, जबकि आयरन की कमी से नई पत्तियों में अंतर-शिरा पीलापन विकसित होता है. बोरॉन की कमी कंदों के विकास को सीधे प्रभावित करती है.
वायरस का इलाज नहीं, रोकथाम ही उपाय
डॉ. सिंह ने स्पष्ट किया कि पौधों में विषाणुजनित रोगों का प्रत्यक्ष उपचार उपलब्ध नहीं है. इसलिए वायरस फैलाने वाले कीटों का नियंत्रण सबसे प्रभावी उपाय है. इसके लिए थायमेथोक्साम, इमिडाक्लोप्रिड, फ्लोनिकामिड अथवा नई पीढ़ी के कीटनाशी अफिडोपायरोपेन का अनुशंसित मात्रा में प्रयोग किया जा सकता है.
जैविक विकल्प के रूप में 10,000 पीपीएम नीम तेल का छिड़काव, प्रति एकड़ 20 से 25 पीले स्टिकी ट्रैप लगाना तथा संक्रमित पौधों को उखाड़कर नष्ट करना लाभकारी बताया गया है.
संतुलित पोषण और सिंचाई जरूरी
विशेषज्ञ ने फसल में चिलेटेड जिंक, चिलेटेड आयरन और बोरॉन के फोलियर स्प्रे की सलाह दी है. वहीं पत्तियों के किनारों के झुलसने की स्थिति में मैग्नीशियम सल्फेट और सल्फेट ऑफ पोटाश के छिड़काव की अनुशंसा की गई है.
उन्होंने कहा कि ओल की फसल न तो अधिक सूखा और न ही जलभराव सहन कर पाती है. इसलिए खेत में संतुलित नमी बनाए रखना आवश्यक है. धान के पुआल या जैविक अवशेषों से मल्चिंग तथा समय पर मिट्टी चढ़ाने से कंदों का विकास बेहतर होता है और उत्पादन में वृद्धि होती है.
किसानों के लिए त्वरित सलाह
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि गंभीर रूप से संक्रमित पौधों को खेत से हटाएं, रस चूसने वाले कीटों का नियंत्रण करें, सूक्ष्म पोषक तत्वों का छिड़काव करें तथा खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखें. नियमित निगरानी और एकीकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम) अपनाकर फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है.
डॉ. सिंह का कहना है कि यदि किसान अगले 15 से 20 दिनों के भीतर आवश्यक प्रबंधन उपाय अपनाते हैं, तो फसल की वृद्धि में सुधार लाकर कंद उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी संभव है.