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Updated on: 29 June, 2026 5:41 PM IST

डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा में तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन _“कृषि-खाद्य प्रणालियों में महिलाओं की भूमिका को पुनर्परिभाषित करना: सतत कृषि विकास के लिए विस्तार रणनीतियाँ”_ का सोमवार को विद्यापति सभागार में समापन सत्र के साथ समापन हो गया. समारोह में सम्मेलन की प्रमुख सिफारिशें जारी की गईं और लिंग संवेदी प्रसार सेवाओं का रोडमैप प्रस्तुत किया गया.

सम्मेलन का आयोजन डॉ राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय और इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ एक्सटेंशन एजुकेशन के संयुक्त तत्वावधान में 27 से 29 जून तक हुआ.‌इसमें बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और पूर्वोत्तर राज्यों से 300 से अधिक वैज्ञानिक, नीति निर्माता, प्रसार विशेषज्ञ और प्रगतिशील किसानों ने भाग लिया. इस दौरान तीन दिनों में 12 तकनीकी सत्र,86 अनुसंधान पत्र, 48 पोस्टर प्रस्तुतियां और कई पैनल चर्चाएं हुईं.

समापन सत्र को संबोधित करते हुए कुलपति डॉ. पी.एस. पांडेय ने कहा कि “यह सम्मेलन केवल अकादमिक चर्चा नहीं, बल्कि बदलाव का संकल्प है. भारत में 70 प्रतिशत से अधिक महिलाएं कृषि से जुड़ी हैं, पर नीति और तकनीक में उनकी हिस्सेदारी सीमित है. हमें महिलाओं को परिवर्तन वाहक मानकर प्रसार तंत्र, शोध और बजट में जगह देनी होगी.

उन्होंने आगे कहा, “सशक्तिकरण का मतलब केवल आय बढ़ाना नहीं है. इसका अर्थ है निर्णय लेने की क्षमता, समय की बचत और गरिमा के साथ जीवन. तकनीक को महिला के खेत और रसोई तक पहुंचाना होगा, तभी नवाचार पूरा होगा. उन्होंने कहा कि आने वाले समय में कृषि का स्वरूप तेजी से बदलेगा इसके लिए डिजिटल एग्रीकल्चर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं अन्य इंटरनेट बेस्ड थिंग्स को भी बढ़ावा देना होगा.

इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ एक्सटेंशन एजुकेशन के अध्यक्ष एवं कृषि विश्वविद्यालय बैंगलोर के पूर्व कुलपति प्रो. के. नारायण गौड़ा ने कहा कि डॉ राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के साथ इस ऐतिहासिक सम्मेलन में भागीदार बनकर उन्हें गर्व का अनुभव हो रहा है. विश्वविद्यालय ने पिछले तीन वर्षों में देश भर में अपना परचम लहराया है जिसकी चर्चा हर ओर है. उन्होंने कहा कि भारतीय कृषि की असली ताकत महिला किसान हैं, लेकिन हमारा प्रसार तंत्र उनकी विशेष जरूरतों को अक्सर नजरअंदाज करता रहा है. यहां प्रस्तुत शोध और केस स्टडी साबित करते हैं कि जब महिलाओं को सही उपकरण, प्रशिक्षण और मंच मिलता है तो उत्पादकता और परिवार का पोषण तेजी से सुधरता है. उन्होंने कहा कि INSEE इन सिफारिशों को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाएगा और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान व राज्य सरकारों के साथ मिलकर लिंग संवेदी रणनीतियों को मुख्यधारा के प्रसार ढांचे में शामिल करने पर काम करेगा. यह सम्मेलन विकसित भारत 2047 के लक्ष्य में महिला किसानों की भूमिका तय करने वाला मील का पत्थर बनेगा.”

सम्मेलन के दौरान विशेषज्ञों ने माना कि जलवायु परिवर्तन, पोषण सुरक्षा और ग्रामीण उद्यमिता की चुनौतियों का समाधान महिला किसानों को केंद्र में रखे बिना संभव नहीं है. सत्रों में बार-बार यह बात उभरी कि बीज प्रबंधन, पशुपालन, फसल कटाई उपरांत कार्य और खाद्य प्रसंस्करण में महिलाओं का बड़ा योगदान है, लेकिन ऋण, भूमि स्वामित्व, मशीनीकरण और सलाह सेवाओं तक उनकी पहुंच कम है.

यह भी रेखांकित हुआ कि जब कृषि स्वयं लिंग आधारित है तो प्रसार सेवाएं तटस्थ नहीं रह सकतीं. समय की कमी, श्रम की थकान और सीमित गतिशीलता बड़ी बाधाएं हैं. आंध्र प्रदेश, ओडिशा, बिहार और महाराष्ट्र के केस स्टडी से पता चला कि जब महिला किसान उत्पादक संगठन चलाती हैं, कस्टम हायरिंग केंद्र संभालती हैं या सहभागी वीडियो बनाती हैं तो तकनीक अपनाने की दर 40 से 70 प्रतिशत तक बढ़ जाती है.

आयोजन सचिव डॉ. राम दत्त के नेतृत्व में तैयार सिफारिशें कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, नीति आयोग और CACP को भेजी जाएंगी. 

डॉ. उषा सिंह ने कहा, _“कोई एक विभाग इसे अकेले हल नहीं कर सकता. केवीके, राज्य कृषि विभाग, नाबार्ड, एग्री-स्टार्टअप और महिला समूहों को मिलकर काम करना होगा. सम्मेलन ने हमें जमीन पर परखे मॉडल दिए हैं. अब इन्हें संस्थागत करना है.”

कार्यक्रम का समापन सांस्कृतिक संध्या और अधिष्ठाता डॉ. रामदत्त के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ. उन्होंने विश्वविद्यालय की ओर से सिफारिशों को कागज से खेत तक ले जाने की प्रतिबद्धता दोहराई.

English Summary: Dr RPCAU Pusa hosts national conference on women in agri food systems
Published on: 29 June 2026, 05:43 PM IST

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