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Updated on: 28 September, 2026 3:53 PM IST

पिछले 25 वर्षों में भारत के मौसम में आए बदलाव ने देश की बागवानी फसलों के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं. डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (समस्तीपुर) के प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमाटोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. एस. के. सिंह के अनुसार, 2001–2025 की अवधि भारत के अधिकांश कृषि-जलवायु क्षेत्रों में 1951 के बाद की सबसे गर्म 25-वर्षीय अवधि रही है, जिसका सीधा असर आम, लीची, केला और सब्जियों समेत कई फसलों पर पड़ रहा है.

तेजी से बढ़ता क्षेत्र, बढ़ता जोखिम

भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में बागवानी अब किसानों की आय, पोषण सुरक्षा और रोजगार का महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है. वर्ष 2024–25 में देश का कुल बागवानी उत्पादन दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार 367.72 मिलियन टन रहा, जिसमें करीब 114.51 मिलियन टन फल और 219.67 मिलियन टन सब्जियाँ शामिल हैं. तीसरे अग्रिम अनुमान में यह आँकड़ा 369.055 मिलियन टन तक पहुँचने का अनुमान है.

लेकिन इसी बढ़ते क्षेत्र के सामने अब जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है. वर्ष 2024 भारत में 1901 के बाद का सबसे गर्म वर्ष दर्ज हुआ, जब औसत तापमान 1991–2020 के औसत से 0.65°C अधिक रहा. 2025 भी सामान्य से 0.28°C अधिक गर्म रहते हुए आठवाँ सबसे गर्म वर्ष बना. वर्ष 2020 भी सामान्य से 0.29°C अधिक गर्म था और उस वर्ष वार्षिक वर्षा दीर्घकालीन औसत की 109% रही थी.

बारिश ज्यादा, पर वितरण असंतुलित

डॉ. सिंह के मुताबिक 2025 में देश की वार्षिक वर्षा 1274 मिमी रही. यानी 1971–2020 के दीर्घकालिक औसत की 110%. लेकिन मौसमी वितरण चिंताजनक रहा: शीतकालीन वर्षा महज 52% रही, जबकि प्री-मानसून, दक्षिण-पश्चिम मानसून और उत्तर-मानसून वर्षा क्रमशः 142%, 108% और 111% रही. "केवल कुल वर्षा से कृषि जोखिम का आकलन नहीं किया जा सकता; वर्षा कब, कितनी तीव्रता से और कितने अंतराल पर हुई, यह अधिक मायने रखता है," डॉ. सिंह कहते हैं.

आम-लीची से लेकर सब्जियों तक असर

आम में पुष्पन, परागण और फल-स्थापन तापमान व नमी के प्रति बेहद संवेदनशील हैं. असामान्य गर्मी और नमी में उतार-चढ़ाव से पराग की जीवनक्षमता प्रभावित हो रही है, वहीं अधिक आर्द्रता एन्थ्रेक्नोज और पाउडरी मिल्ड्यू जैसे रोगों का खतरा बढ़ा रही है. उच्च तापमान फल झड़ने और सनबर्न को भी बढ़ाता है. लीची के लिए सर्दियों की पर्याप्त ठंड जरूरी है नवंबर-जनवरी की कम तापमान अवधि फरवरी-मार्च के पुष्पन से जुड़ी है, और इसमें बदलाव फल-स्थापन को प्रभावित कर रहा है.

केले में अत्यधिक वर्षा और जलजमाव से जड़-सड़न और फ्यूजेरियम विल्ट जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं, जबकि लंबे शुष्क अंतराल पौधे की वृद्धि पर असर डालते हैं. मार्च 2026 में हुई ICAR की केला विशेषज्ञ बैठक में इसे प्रमुख प्राथमिकता बताया गया. पपीता, अमरूद और ड्रैगन फ्रूट जैसी नई फसलों में भी सनबर्न और जड़-सड़न जैसी दिक्कतें सामने आ रही हैं. ICAR-IIHR के 2023-25 शोध में ड्रैगन फ्रूट में सनबर्न को अहम जलवायु-जनित समस्या बताया गया है.

सब्जियों में आलू में तापमान वृद्धि कंद निर्माण की अवधि घटा रही है, टमाटर में फूल व फल-स्थापन प्रभावित हो रहे हैं और ब्लाइट का खतरा बढ़ रहा है, जबकि प्याज में बल्ब विकास व भंडारण क्षमता पर असर पड़ रहा है. मटर, गोभी जैसी रबी सब्जियों में समय से पहले तापमान बढ़ना फसल-अवधि घटा सकता है.

कीट-रोग की बदलती प्रकृति

जलवायु परिवर्तन सिर्फ फसल वृद्धि को ही नहीं, रोगजनकों और कीटों की जैविकी को भी प्रभावित कर रहा है. गर्म-नम मौसम फफूंदजनित रोगों के लिए अनुकूल है, जबकि गर्म-शुष्क परिस्थितियाँ थ्रिप्स, एफिड और सफेद मक्खी जैसे कीटों का प्रकोप बढ़ा रही हैं. जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) ने भी एशिया में इसे खाद्य सुरक्षा के प्रमुख जोखिम के रूप में रेखांकित किया है.

विशेषज्ञों की सलाह: "मौसम देखकर प्रबंधन"

डॉ. सिंह के अनुसार भविष्य की रणनीति मौसम-आधारित प्रबंधन पर टिकी होनी चाहिए वैज्ञानिक जलनिकास, वर्षाजल संचयन, ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग, जलवायु-सहिष्णु किस्में और प्रमाणित रोगमुक्त रोपण सामग्री को प्राथमिकता देनी होगी. कैलेंडर-आधारित अंधाधुंध छिड़काव के बजाय मौसम-आधारित पूर्वानुमान और समेकित रोग-कीट प्रबंधन (IPM) अधिक कारगर होगा. अत्यधिक गर्मी वाले क्षेत्रों में शेडनेट, पॉलिहाउस और एंटी-हेल नेट जैसी संरक्षित खेती तकनीकों के विस्तार की भी सिफारिश की गई है.

"समस्या केवल तापमान बढ़ने की नहीं है; असली चुनौती मौसम की अनिश्चितता और चरम घटनाओं का बढ़ता कृषि-जोखिम है," डॉ. सिंह कहते हैं. उनके अनुसार मौसम पूर्वानुमान को खेत-स्तरीय सलाह से जोड़ना, वैज्ञानिक जल प्रबंधन और फसल बीमा को मजबूत करना अब समय की मांग है.

English Summary: climate change impact on Indian horticulture crops weather variability and farm management
Published on: 28 September 2026, 03:57 PM IST

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