बिहार के अन्य जिलों में किसान सलाहकार समितियों का सक्रियता जोर-शोर से चल रही है, लेकिन मुजफ्फरपुर जिले में आत्मा (ATMA) की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं. मुख्यालय के निर्देशों की अनदेखी करते हुए यहां के अधिकारियों ने जमीनी गतिविधियों को पूरी तरह से रोक दिया है, जिससे प्रखंड, जिला और राज्य कमिटियों के उद्देश्य तक पहुंचने में बाधा आ रही है.
बिहार में विधानसभा चुनाव की गहमागहमी खत्म होते ही राज्य के कृषि विभाग ने जमीनी स्तर पर सक्रियता दिखाने और निवर्तमान प्रखंड आत्मा के मनोनीत नए किसान सलाहकार समितियों की बैठकें या कार्यशाला बुलाने के निर्देश दिए थे. सूबे के कई प्रखंडों में इन समितियों का बैठकें सफलतापूर्वक किया गया और पहले चरण की बैठकें में कई विषयों और योजनाओं पर चर्चाएं एवं रणनीति बनी, लेकिन इन सबके बीच मुजफ्फरपुर जिले की स्थिति कुछ अलग ही कहानी बयां कर रही है.
बामेती के आदेशों के बावजूद, मुजफ्फरपुर में किसान सलाहकार समितियों को लेकर फिलहाल सन्नाटा पसरा हुआ है. न कोई बैठक बुलाई जा रही है और न ही कोई जमीनी रणनीति बन रही है. सवाल यह उठ रहा है कि क्या मुजफ्फरपुर के आत्मा (Agricultural Technology Management Agency) कर्मचारी और अधिकारी इतने स्वायत्त हो गए हैं कि उन पर वरीय विभागों के निर्देशों का कोई असर नहीं हो रहा है? स्थानीय किसानों के अनुसार, जिले में कृषि विकास का पहिया सिर्फ इंटरनेट, व्हाट्सएप या फाइलों में ही घूम रहा है.
अन्य जिलों में सुगबुगाहट, मुजफ्फरपुर में सन्नाटा
संजय सिंह बताते हैं कि अन्य जिलों में जहां कमेटियों के गठन की सुगबुगाहट तेज है, वहीं मुजफ्फरपुर के संबंधित अधिकारी अपनी ही लय में नजर आ रहे हैं. जानकारों का कहना है कि विभाग के भीतर 'सब ठीक है' का बोर्ड लगाकर जमीनी काम को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है. जब राज्य स्तर से दबाव आता है, तो केवल इंटरनेट आधारित बैठकों और वर्चुअल रिपोर्टिंग का सहारा लेकर कोरम पूरा किया जाता है.
समिति नहीं, सक्रियता नहीं—तो फिर कृषि विकास कैसे
मुजफ्फरपुर में आत्मा की किसी भी प्रकार की गतिविधि का न होना जिले के कृषि तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है. किसानों के बीच यह चर्चा आम है कि जब तक जमीनी स्तर पर समितियां सक्रिय नहीं होंगी, तब तक योजनाओं का लाभ सही लाभार्थियों तक कैसे पहुंचेगा.
आत्मा मिशन पर आत्ममंथन जरूरी
कृषि अधिकारियों की कार्यशैली पर स्थानीय प्रगतिशील किसान रूपेश रॉय का कहना है कि 'आत्मा' का काम तकनीक को खेत तक पहुंचाना था, लेकिन अब ऐसा लगता है कि आत्मा सिर्फ विभागीय सोशल मीडिया तक ही सीमित रह गई है. अधिकारियों के ये तेवर दिखाते हैं कि उन्हें किसानों की समस्याओं से ज्यादा अपनी 'सुविधा' की चिंता है. यह सुस्ती उत्तर बिहार के कृषि तंत्र में बढ़ती अनुशासनहीनता को भी उजागर करती है.
एक ओर ठहराव, दूसरी ओर रफ्तार
इधर, इस बात की जानकारी देते हुए समस्तीपुर जिले के डिप्टी पीडी (आत्मा) ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है कि जिले के सभी प्रखंडों में किसान सलाहकार समितियों की बैठकें सफलतापूर्वक संपन्न कर ली गई हैं. समस्तीपुर में अब जिला स्तरीय कमेटी के गठन की प्रक्रिया जोरों पर है बिहार बोर्ड की परीक्षा और अन्य कार्य के कारण मध्य फरवरी तक इसे पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है.
किसानों के हित में आगे बढ़ते प्रखंड
वहीं, बिहार के अन्य प्रखंडों में स्थिति इसके उलट है. सारण (तरैया) किसानों को लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं, खेती में नवाचार तथा विभागीय गतिविधियों पर विचार-विमर्श किया गया. सीवान (हसनपुरा) में हुई बैठक में उन्होंने रबी फसल की स्थिति, उन्नत बीज के उपयोग, समय पर खाद व कीटनाशक के प्रयोग तथा मृदा स्वास्थ्य कार्ड के महत्व पर प्रकाश डाला. साथ ही किसानों को वैज्ञानिक तरीके से खेती करने और कृषि विभाग से मिलने वाली तकनीकी सहायता का लाभ उठाने की अपील की. यहाँ तक कि कैमूर (कुदरा) में तो समिति के लिए चेंबर तक आवंटित कर दिया गया है जिसका अध्यक्ष ने विधिवत उद्घाटन किया.
कई जिलों में विरोध के स्वर
प्रक्रिया केवल सुस्ती तक सीमित नहीं है. उत्तर बिहार के जिला, जैसे वैशाली के कुछ हिस्सों में इस प्रक्रिया का वैचारिक विरोध भी देखा गया है. स्थानीय किसानों का आरोप है कि कमेटियां में आत्मा अध्यक्षों ने मनोनीत नए किसान सलाहकार समिति के मनोनयन का विरोध किया है. कमेटी के अध्यक्ष व सदस्यों के मनोनयन में नियमों की अनदेखी का आरोप लगाया है. दबाव में बनाई गई हैं. मुजफ्फरपुर में तो स्थिति और भी अजीब है, यहाँ न तो सक्रियता है और न ही विरोध, क्योंकि अधिकारियों ने पूरे आत्मा तंत्र को ही 'ठंडे बस्ते' में डाल दिया है.
किसानों की आवाज़ दबाने की साजिश: उमेश सिंह
अखिल भारतीय किसान महासभा के बिहार राज्य सचिव उमेश सिंह ने कहा है कि प्रस्तावित समितियों के गठन की प्रक्रिया अत्यंत आपत्तिजनक और अलोकतांत्रिक है. उन्होंने आरोप लगाया कि समितियों के चयन का अधिकार किसानों को देने के बजाय पूरी तरह से एनडीए के हाथों में सौंप दिया गया है, जिससे यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध हो गई है.
उन्होंने कहा कि यह किसानों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाली एक ऐसी समिति बनाने का प्रयास है, जिसमें वास्तविक किसानों की कोई भूमिका ही नहीं होगी. इससे साफ़ जाहिर होता है कि सरकार असली किसानों और उनकी जायज़ मांगों को जानबूझकर दरकिनार करना चाहती है—उन किसानों को, जो दिन-रात खून-पसीना एक कर खेती करते हैं.
अखिल भारतीय किसान महासभा ने इस तानाशाही और किसान-विरोधी चयन प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रद्द करने की मांग की है. संगठन का कहना है कि प्रखंड, जिला और राज्य स्तर पर समितियों का गठन लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया के माध्यम से ही किया जाना चाहिए.
उमेश सिंह ने चेतावनी दी कि यदि सरकार इन किसान-विरोधी समितियों को भंग कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं अपनाती है, तो अखिल भारतीय किसान महासभा पूरे बिहार में किसानों को संगठित कर एक बड़े आंदोलन की शुरुआत करेगी.