बक्सर के किसान आशुतोष पांडेय इन दिनों अपने खेत की तैयारी में जुटे हैं. बैंगन की रोपाई का समय है. खेत तैयार है, पौधे तैयार हैं, लेकिन ड्रिप सिंचाई प्रणाली लगाने की उनकी योजना सरकारी पोर्टल पर अटक गई है. बिहार सरकार का माइक्रो इरिगेशन (ड्रिप) सब्सिडी पोर्टल अब तक शुरू नहीं हुआ है. ऐसे में उन्हें या तो पूरी लागत अपनी जेब से उठानी होगी या फिर इस सीजन ड्रिप लगाने का विचार छोड़ना पड़ेगा.
बिहार देश के प्रमुख सब्जी उत्पादक राज्यों में गिना जाता है. राज्य में लगभग हर जिले में व्यावसायिक स्तर पर सब्जियों की खेती होती है. मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर, नालंदा, पटना, भोजपुर, बक्सर, सारण और पूर्वी चंपारण जैसे जिले सब्जी उत्पादन के महत्वपूर्ण केंद्र हैं. यहां लाखों छोटे और सीमांत किसान बैंगन, टमाटर, मिर्च, भिंडी, लौकी, करेला, गोभी और अन्य सब्जियों की खेती से अपनी आजीविका चलाते हैं.
पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा और भूजल पर बढ़ती निर्भरता ने किसानों को पानी की बचत करने वाली तकनीकों की ओर बढ़ने के लिए मजबूर किया है. इसी उद्देश्य से केंद्र और राज्य सरकारें माइक्रो इरिगेशन यानी ड्रिप एवं स्प्रिंकलर प्रणाली को बढ़ावा देती हैं. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार ड्रिप सिंचाई से 30 से 50 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है, उर्वरकों का अधिक दक्ष उपयोग संभव होता है और कई फसलों में उत्पादन तथा गुणवत्ता दोनों बेहतर होती हैं.
गंगा के मैदानी क्षेत्र में स्थित बिहार के सबसे उपजाऊ कृषि जिलों में से एक है. जिले का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 1.62 लाख हेक्टेयर है. गंगा और सोन नदी की जलोढ़ (Alluvial) मिट्टी इसे अत्यधिक उपजाऊ बनाती है. गेहूं, धान, मक्का, दलहन और तिलहन के साथ-साथ कई क्षेत्रों में व्यावसायिक स्तर पर सब्जियों की खेती भी होती है.
बक्सर में सिंचाई का मुख्य आधार सोन नहर प्रणाली, गंगा, नलकूप और पारंपरिक आहर-पाइन प्रणाली रही है. इसके बावजूद नहर के अंतिम छोर (Tail-end) वाले इलाकों में आज भी सिंचाई की समस्या बनी रहती है. इसी कारण राज्य सरकार को हाल के वर्षों में मलई बराज और उद्दह सिंचाई परियोजना जैसी योजनाओं को मंजूरी देनी पड़ी, ताकि पानी की उपलब्धता बढ़ाई जा सके.
लेकिन इस वर्ष खरीफ सब्जियों की रोपाई के दौरान बिहार में माइक्रो इरिगेशन सब्सिडी पोर्टल शुरू नहीं होने से किसान असमंजस में हैं. आशुतोष पांडेय ने इस मुद्दे को मुख्यमंत्री व कृषि विभाग और उद्यान निदेशालय के समक्ष उठाया है. उन्होंने सरकार से मांग की है कि पोर्टल तत्काल शुरू किया जाए और माइक्रो इरिगेशन पर दी जाने वाली 80 प्रतिशत सब्सिडी को बढ़ाकर कम से कम 90 प्रतिशत किया जाए. उनका कहना है कि खाद, डीजल, पाइप, कीटनाशक और मजदूरी की लागत पहले ही काफी बढ़ चुकी है. ऐसे में यदि अनुदान समय पर नहीं मिलेगा, तो छोटे किसानों के लिए ड्रिप प्रणाली लगाना लगभग असंभव हो जाएगा. यह मांग उन्होंने सहयोग (RTMS) पोर्टल पर दर्ज शिकायत में भी की है.
माइक्रो इरिगेशन जैसी योजनाओं की उपयोगिता तभी है जब वे खेती के कैलेंडर के अनुरूप संचालित हों. सब्जी फसलों में ड्रिप प्रणाली आमतौर पर रोपाई से पहले या उसी समय लगाई जाती है. यदि पोर्टल बाद में खुलता है, तो अधिकांश किसान या तो पूरी लागत स्वयं वहन करते हैं या फिर पूरे सीजन पारंपरिक सिंचाई पर निर्भर रह जाते हैं.
इसी बीच मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से भी शिकायतकर्ता को सहयोग (RTMS) पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी गई. इसके बाद शिकायत दर्ज हुई और उसे कृषि विभाग को अग्रसारित कर दिया गया.
यह सवाल केवल एक पोर्टल के खुलने का नहीं है. यह उस नीति की समयबद्धता का प्रश्न है, जिसका उद्देश्य पानी बचाना, खेती की लागत कम करना और किसानों को आधुनिक सिंचाई तकनीकों से जोड़ना है. यदि योजना का लाभ खेती का समय निकल जाने के बाद मिलेगा, तो क्या उसका वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सकेगा? यही सवाल आज बिहार के हजारों उत्पादक किसान के बीच हैं.
हालांकि, माइक्रो इरिगेशन योजना के लिए आवेदन बिहार कृषि ऐप के माध्यम से लिए जा रहे हैं, लेकिन ऐप पर न तो वर्तमान वित्तीय वर्ष के लिए योजना की स्पष्ट स्थिति उपलब्ध है और न ही आवेदन लक्ष्य, बजट, स्वीकृति प्रदर्शित की गई है आवेदन की स्थिति को लेकर असमंजस की स्थिति में हैं.
इस पर पक्ष जानने के लिए उद्यान निदेशालय के उप निदेशक (कृषि अभियांत्रिकी एवं माइक्रो इरिगेशन) से संपर्क किया, उन्होंने बताया कि यह मामला उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है. उन्होंने इस विषय पर कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. खबर लिखे जाने तक निदेशालय की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हो सकी.