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Updated on: 10 March, 2026 5:58 PM IST
“बिहार में दलहन उत्पादन बढ़ाने की रणनीतियाँ” विषय पर तीन दिवसीय (10–12 मार्च, 2026) प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना में दिनांक 10 मार्च, 2026 को “बिहार में दलहन उत्पादन बढ़ाने की रणनीतियाँ” विषय पर तीन दिवसीय (10–12 मार्च, 2026) प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम को बामेती, पटना द्वारा प्रायोजित किया गया है। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों तथा प्रसार कर्मियों के ज्ञान एवं कौशल का विकास करना है, ताकि बिहार में दलहन उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने के लिए उन्नत तकनीकों को अपनाया जा सके। साथ ही कार्यक्रम में वैज्ञानिक फसल प्रबंधन पद्धतियों तथा दलहन की टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने पर विशेष बल दिया जा रहा है।

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में बिहार के पाँच जिलों—पटना, औरंगाबाद, नालंदा, भोजपुर तथा गया जी से प्रसार कर्मी एवं किसान भाग ले रहे हैं। कुल 20 प्रतिभागियों में 04 सहायक प्रौद्योगिकी प्रबंधक, 01 प्रखंड प्रौद्योगिकी प्रबंधक, 06 किसान सलाहकार तथा 09 प्रगतिशील किसान शामिल हैं।

कार्यक्रम की शुरुआत प्रशिक्षण के पाठ्यक्रम निदेशक डॉ. अरविंद कुमार चौधरी के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने मुख्य अतिथि डॉ. अनिल कुमार सिंह, निदेशक (अनुसंधान), बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, भागलपुर एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए राज्य में दलहन उत्पादकता बढ़ाने के लिए क्षमता निर्माण के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रसार कर्मियों एवं किसानों के ज्ञान और कौशल को सुदृढ़ करना उन्नत दलहन उत्पादन तकनीकों के प्रसार के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसके बाद प्रतिभागियों का संक्षिप्त परिचय हुआ, जिससे आपसी संवाद और अनुभवों का आदान-प्रदान हुआ।

डॉ. अनिल कुमार सिंह, निदेशक (अनुसंधान), बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, भागलपुर ने कहा कि बिहार में वर्तमान में लगभग 04 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में दलहन की खेती की जा रही है तथा गन्ना सहित अन्य फसलों के साथ अंतरफसली खेती के माध्यम से इसके उत्पादन में वृद्धि की पर्याप्त संभावनाएँ हैं। उन्होंने दलहन फसलों में मूल्य संवर्धन के महत्व पर भी बल दिया तथा किसानों को अपनी आय बढ़ाने के लिए कृषि उद्यमिता को अपनाने की सलाह दी।

इस अवसर पर डॉ. आशुतोष उपाध्याय, कार्यकारी निदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना ने कहा कि दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक कृषि तकनीकों को अपनाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि उन्नत कृषि पद्धतियों को अपनाने से न केवल उत्पादकता बढ़ेगी बल्कि किसानों की आत्मनिर्भरता भी मजबूत होगी। उन्होंने दलहन उत्पादकता को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों जैसे कीट प्रबंधन, जल प्रबंधन, गुणवत्तायुक्त बीजों का उपयोग, उर्वरकों का संतुलित प्रयोग तथा उचित फसल प्रबंधन पद्धतियों के महत्व पर प्रकाश डाला। साथ ही उन्होंने पोषण प्रबंधन, विपणन व्यवस्था तथा वैज्ञानिक जानकारी की उपलब्धता के महत्व को भी रेखांकित किया।

डॉ. उज्ज्वल कुमार, प्रभागाध्यक्ष, सामाजिक-आर्थिक एवं प्रसार ने अपने संबोधन में कहा कि दलहन का सेवन छिलके सहित करना चाहिए, क्योंकि यह पोषण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने धान–गेहूँ आधारित प्रमुख फसल प्रणाली में दलहन को शामिल करने तथा फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने किसान सहभागिता आधारित बीज उत्पादन, कीट प्रबंधन, पोषक तत्व प्रबंधन तथा मल्चिंग जैसी तकनीकों के महत्व पर भी प्रकाश डाला।

डॉ. कमल शर्मा, प्रभागाध्यक्ष, पशुधन एवं मात्स्यिकी प्रबंधन ने मृदा उर्वरता में दलहन फसलों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दलहन फसलें जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य को सुधारने में सहायक होती हैं। उन्होंने किसानों के बीच दलहन की खेती के लाभों के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. कुमारी शुभा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अभिषेक कुमार दुबे द्वारा प्रस्तुत किया गया।

English Summary: Bihar launched Three-day training programme on strategies to increase pulses production
Published on: 10 March 2026, 06:03 PM IST

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