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Updated on: 13 August, 2026 2:02 PM IST
बिहार के कृषि और पारंपरिक उत्पादों को GI पहचान दिलाने की प्रक्रिया तेज

बिहार के कृषि, खाद्य और पारंपरिक उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (GI) पहचान दिलाने की कवायद अब पंजीकरण से आगे बढ़कर उन्हें बाजार और ब्रांडिंग से जोड़ने की दिशा में बढ़ रही है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर में आयोजित 20वीं GI समीक्षा बैठक एवं तीसरे PMRC सत्र में राज्य के 28 GI आवेदनों की प्रगति की समीक्षा की गई। इनमें 10 आवेदन अंतिम CGM चरण में पहुंच चुके हैं।

बैठक की अध्यक्षता बिहार कृषि विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक एवं GI फैसिलिटेशन सेंटर के प्रधान अन्वेषक डॉ. अनिल कुमार सिंह ने की। बैठक में विभिन्न कृषि एवं पारंपरिक उत्पादों के GI पंजीकरण से जुड़ी प्रक्रिया, दस्तावेजीकरण और आगे की रणनीति पर चर्चा हुई।

बिहार के भागलपुरी जरदालू, शाही लीची, कतरनी चावल, मगही पान और मिथिला मखाना को पहले ही GI पंजीकरण मिल चुका है। अब विश्वविद्यालय का GI फैसिलिटेशन सेंटर नए उत्पादों को इस सूची में शामिल कराने के लिए दस्तावेजीकरण और आवेदन प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहा है।

GI टैग से आगे बाजार की चुनौती

बिहार कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति ने कहा कि किसी उत्पाद को GI पहचान मिलना केवल उसकी विशिष्टता की आधिकारिक मान्यता नहीं है, बल्कि उसके लिए बड़े बाजार का रास्ता भी खोल सकता है। हालांकि, GI टैग का वास्तविक लाभ किसानों और उत्पादकों तक पहुंचाने के लिए पंजीकरण के बाद ब्रांडिंग, मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और बाजार से जुड़ाव पर काम करना जरूरी होगा।

यही वह चरण है जहां बिहार के GI उत्पादों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। पहचान मिलने के बाद उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की मजबूत रणनीति तैयार करनी होगी, ताकि GI टैग का लाभ केवल प्रमाणपत्र तक सीमित न रह जाए।

28 प्रस्तावों से सामने आई बिहार की उत्पाद विविधता

डॉ. अनिल कुमार सिंह ने बताया कि GI फैसिलिटेशन सेंटर बिहार के विशिष्ट उत्पादों की पहचान, वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण और पंजीकरण की प्रक्रिया को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ा रहा है। 28 GI प्रस्ताव राज्य की कृषि एवं पारंपरिक उत्पादों की विविधता और विशिष्टता को सामने रखते हैं।

उन्होंने कहा कि GI पंजीकरण के बाद उत्पादों की ब्रांडिंग, प्रचार-प्रसार और बाजार से जोड़ने पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। किसानों को व्यापक उपभोक्ता नेटवर्क से जोड़कर ही GI पहचान का वास्तविक आर्थिक लाभ सुनिश्चित किया जा सकता है।

नए उत्पादों की GI दावेदारी पर चर्चा

बैठक में शाहाबाद अनरसा, मनेर का लड्डू और कोसी जूट को GI पहचान दिलाने के प्रस्तावों पर भी चर्चा हुई। इन उत्पादों की विशिष्टता, दस्तावेजीकरण और GI आवेदन से जुड़े पहलुओं की समीक्षा की गई।

इसके साथ ही किसानों और उत्पादकों के बीच GI उत्पादों को लेकर जागरूकता बढ़ाने तथा उपलब्ध निधि के प्रभावी इस्तेमाल पर भी विचार-विमर्श हुआ।

NABARD की भी भागीदारी

GI आवेदनों से जुड़े बिहार कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के अलावा NABARD के अधिकारियों ने भी बैठक में भाग लिया। NABARD की महाप्रबंधक अनामिका और सहायक महाप्रबंधक जितेंद्र कुमार साहू ऑनलाइन माध्यम से जुड़े, जबकि भागलपुर की डीडीएम अर्चना प्रिया बैठक में मौजूद रहीं।

बिहार के लिए GI टैग अब केवल पारंपरिक पहचान का विषय नहीं रह गया है। शाही लीची से मिथिला मखाना और कतरनी चावल से भागलपुरी जरदालू तक, राज्य के विशिष्ट उत्पादों को GI पहचान मिलने के बाद अगला बड़ा सवाल यही है कि इनकी ब्रांड वैल्यू और बाजार का लाभ किसानों एवं स्थानीय उत्पादकों तक कितनी मजबूती से पहुंचाया जाता है। GI पंजीकरण के साथ बाजार, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन की कड़ी मजबूत होती है, तो बिहार के पारंपरिक उत्पाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा अवसर बन सकते हैं।

English Summary: Bihar Gi Recognition Drive Traditional Products Applications GI Tag Benefits
Published on: 13 August 2026, 02:07 PM IST

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