पूर्वी भारत के बागवानी क्षेत्र में एक बड़ी सफलता हासिल करते हुए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरपीसीएयू), पूसा के वैज्ञानिकों ने बिहार के जलोढ़ मैदानी इलाके में एवोकाडो (Persea Americana) की सफल खेती और इसके पैकेज आफ़ प्रैक्टिस को विकसित करने में सफलता हासिल की है .
आईसीएआर-अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (एआईसीआरपी) फल के तहत यह उपलब्धि हासिल किया गया है. इससे पहले यह माना जाता था कि ‘बटर फ्रूट’ के नाम से प्रसिद्ध यह विदेशी फल एवोकाडो केवल कर्नाटक के कुर्ग या तमिलनाडु के कोडाइकनाल जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में ही उग सकता है.
विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पी. एस. पाण्डेय ने बिहार की कृषि के लिए इस एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया और इससे जुड़े वैज्ञानिकों को बधाई दी. उन्होंने कहा कि एवोकाडो को एक महत्वपूर्ण और उच्च आय वाला पहाड़ी फसल माना जाता था. लेकिन बिहार के मैदानी इलाके में उगाकर और उसके लिये वैज्ञानिक पद्धति विकसित कर हमारे वैज्ञानिकों ने साबित कर दिया है कि उच्च मूल्य वाले व्यावसायिक फल भी गंगा के मैदानों में हो सकते हैं.
उन्होंने कहा कि एवोकाडो की खेती बिहार के किसानों के लिए अपार आर्थिक अवसर खोलेगी और यह उच्च मूल्य वाली विविधीकृत बागवानी की दिशा में राज्य के प्रयासों को मजबूती देगी. उन्होंने कहा कि अभी तक एवोकाडो को आयात किया जाता था. लेकिन इसे बिहार में उत्पादन कर आयात बिल को कम या समाप्त किया जा सकता है.
सितम्बर 2023 में शुरू हुआ प्रयोग
विश्वविद्यालय ने सितम्बर 2023 में यह परीक्षण शुरू किया था, जिसका उद्देश्य यह परखना था कि क्या एवोकाडो उत्तर बिहार के तापमान और आर्द्रता के उतार-चढ़ाव में प्रजनन परिपक्वता हासिल कर सकता है. एवोकाडो की जटिल फूल-जीवविज्ञान (डायकोगैमी) की बाधा को दूर करने के लिए, जिसमें नर और मादा फूल अलग-अलग समय पर खिलते हैं, अनुसंधान दल ने सफलतापूर्वक टाइप-A किस्म अर्का सुप्रीम को टाइप-B किस्म अर्का रावी के साथ अंतर-रोपित किया, ताकि पर-परागण समकालिक रूप से हो सके.
एवोकाडो की जड़ें जल-जमाव के प्रति अत्यंत संवेदनशील होती हैं. इसलिए विश्वविद्यालय ने मैदानी इलाकों के लिए विशेष प्रबंधन पैकेज तैयार किया. सपाट गड्ढों के बजाय ऊँची मेड़ों या क्यारियों पर रोपण अनिवार्य किया गया. साथ ही, समय से पहले फल गिरने से रोकने के लिए ड्रिप सूक्ष्म सिंचाई और बेसिन मल्चिंग का उपयोग किया गया.
बिहार के एवोकाडो में आयातित फलों से भी बेहतर गुणवत्ता
ढाई साल पुराने बाग से मिले परिणाम उम्मीद से बेहतर रहे हैं. अर्का सुप्रीम किस्म में 750 ग्राम से 950 ग्राम वजन तक के फल प्राप्त हुए हैं, जो आकार में बाजार में मिलने वाले सामान्य आयातित विदेशी फलों से भी बड़े हैं. जैव-रासायनिक और संवेदी परीक्षणों में पुष्टि हुई है कि बिहार में उगा एवोकाडो स्वाद और मक्खन जैसी गुणवत्ता में आयातित उत्पाद के बराबर या उच्च है.
बाजार की दृष्टि से यह फसल अत्यंत लाभकारी है. खेत पर इसका औसत भाव 400 रुपये प्रति किलोग्राम है, जबकि महानगरों में प्रीमियम खुदरा बाजार में इसकी कीमत 1500 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुँच जाती है.
आरपीसीएयू के फल वैज्ञानिक डॉ. आशीष पांडा ने कहा, कुलपति के विशेष निर्देश पर मैदानी इलाके में एवोकाडो की खेती का प्रयोग किया गया जिसमें आशा से भी अधिक यह सफलता प्राप्त हुई है.
विश्वविद्यालय के अधिकारियों के अनुसार, नियामक मूल्यांकन और औपचारिक किस्म विमोचन के बाद किसानों को व्यावसायिक रूप से पौधों का वितरण शुरू किया जाएगा. यह सफलता बिहार को पारंपरिक फसलों से हटकर उच्च मूल्य वाली बागवानी की ओर ले जाने में मील का पत्थर साबित होगी.