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Updated on: 19 June, 2026 6:52 PM IST

पूर्वी भारत के पहाड़ी एवं पठारी क्षेत्रों में, विशेषकर वर्षा आधारित परिस्थितियों के अंतर्गत, मृदा में जैविक कार्बन की कम मात्रा, जल धारण क्षमता का निम्न स्तर, मृदा अम्लता तथा फॉस्फोरस, बोरॉन एवं जिंक जैसे पोषक तत्वों की कमी विभिन्न फल फसलों की कम वृद्धि एवं कम उत्पादकता के प्रमुख कारण हैं. अतः, चूना तथा उर्वरकों का उपयोग कृषि उत्पादन लागत का एक बड़ा भाग बनता है. इस क्षेत्र में फल फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए किए जाने वाले किसी भी प्रयास का मुख्य उद्देश्य मृदा जैविक कार्बन की मात्रा में वृद्धि करना होना चाहिए. कम जुताई तथा पौध अवशेषों के उच्च आदान को सम्मिलित करने वाली कृषि प्रणालियों को मृदा कार्बनिक पदार्थ की हानि को कम करने तथा समग्र मृदा गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए प्रभावी विकल्पों के रूप में इंगित किया गया है. हाल के वर्षों में जैविक खादों की बढ़ती लागत के कारण कृषि क्षेत्रों में इनके प्रयोग की दर में क्रमिक कमी आई है.

भारत के इस क्षेत्र के किसानों में उपलब्ध जैविक खाद को अपनी खेत फसलों में प्रयोग करने की प्रवृत्ति सदैव रही है तथा वे अपने फल बागानों में बहुत कम मात्रा में जैविक खाद का उपयोग करते हैं. यद्यपि सेसबानिया (ढैंचा) जैसी हरित खाद फसलों के विकल्प उपलब्ध हैं, किन्तु उनका वार्षिक उत्पादन चक्र वर्षा आधारित परिस्थितियों में उगाए जाने वाले फल बागानों में उनके अंगीकरण में एक प्रमुख बाधा है. इसी प्रकार, अजैविक उर्वरकों की बढ़ती लागत अधिकांश लघुधारक किसानों द्वारा इनके पर्याप्त मात्रा में उपयोग को सीमित करती है, जिसके परिणामस्वरूप समेकित मृदा उर्वरता प्रबंधन प्रणालियों के विकास के प्रति रुचि बढ़ी है.

फसल प्रणालियों में जैवभार उत्पन्न करने वाले पौधे

फसल उत्पादन प्रणाली में जैवभार उत्पादक पौधों का समावेशन, मुख्य फसल में पत्तीय जैवभार के संवर्धन के माध्यम से मृदा उर्वरता में सुधार हेतु प्रभावी पाया गया है. एली क्रॉपिंग (Alley Cropping) आधारित उत्पादन प्रणाली में जैवभार उत्पादक प्रजातियों की उपस्थिति पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण, मृदा से पोषक तत्वों के निक्षालन में कमी, मृदा जीव-जन्तुओं की गतिविधियों की वृद्धि, मृदा अपरदन नियंत्रण, मृदा उर्वरता में सुधार तथा फसल उत्पादन के सतत स्तर को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान देती है. एली क्रॉपिंग आधारित पोषक तत्व पुनर्चक्रण प्रणाली की सफलता मुख्यतः वृक्षों से प्राप्त छंटाई अवशेषों की मात्रा एवं गुणवत्ता, अपघटन प्रक्रिया के दौरान अवशेषों से मुक्त होने वाले पोषक तत्वों की मात्रा तथा पोषक तत्वों की उपलब्धता और फसल की आवश्यकता के बीच सामंजस्य पर निर्भर करती है.

गहरी जड़ प्रणाली वाली दलहनी प्रजातियों की खेती, जो मृदा की गहरी परतों से पोषक तत्वों के अवशोषण को बढ़ावा देती है, तथा जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण से प्राप्त नाइट्रोजन के साथ मिलकर खेत स्तर पर पोषक तत्व चक्रण में सुधार के सबसे प्रभावी उपायों में से एक मानी जाती है. अनेक कृषिवानिकी प्रणालियाँ अपने जैवभार में फॉस्फोरस का संचयन करती हैं तथा अन्य अवशेषों के अपघटन के पश्चात उसे पुनः मृदा में वापस लौटा देती हैं. इस पुनर्चक्रण प्रक्रिया के माध्यम से मृदा में उपस्थित फॉस्फोरस के कुछ अपेक्षाकृत कम उपलब्ध अकार्बनिक रूप संभावित रूप से उपलब्ध रूपों में परिवर्तित हो जाते हैं.

भूमि सुधा : जैवभार उत्पादन हेतु एक संभावनाशील पौधा

मृदा पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में प्रभावशीलता के कारण अनेक बहुवर्षीय जैवभार उत्पादक पौधों का उल्लेख किया गया है. Leucaena leucocephala (सामान्य नाम– सुबबूल) उप-आर्द्र उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में एली क्रॉपिंग प्रणाली के अंतर्गत व्यापक रूप से उपयोग किया जाने वाला पौधा है. तथापि, इस प्रजाति की आक्रामक प्रकृति से उत्पन्न होने वाली समस्याओं के कारण एली क्रॉपिंग प्रणाली में इसके समावेशन हेतु सुबबूल के प्रभावी विकल्प की पहचान आवश्यक हो गई है. सुबबूल के विकल्प की पहचान के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, अनुसंधान केंद्र, राँची द्वारा किसानों की सहभागिता पर आधारित अनेक अध्ययन संचालित किए गए. इन अध्ययनों के आधार पर भूमि सुधा (Tephrosia candida) को एक प्रभावी विकल्प के रूप में पहचाना गया है. Tephrosia candida (Roxb.) भारत में हिमालय की उष्णकटिबंधीय तराई क्षेत्रों की मूल प्रजाति है, जो वर्तमान में प्राकृतिक रूप से स्थापित हो चुकी है तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के विभिन्न देशों में विविध उपयोगों के लिए इसकी खेती की जाती है. यह प्रजाति अपने उच्च जैवभार उत्पादन, सघन वनस्पति आवरण, गहरी जड़ प्रणाली, गैर-आक्रामक प्रकृति तथा वायुमंडलीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्षमता के कारण उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कृषिवानिकी (Agroforestry) के लिए अत्यंत संभावनाशील मानी जाती है.

Tephrosia vogelii तथा Tephrosia candida ऐसी झाड़ीदार प्रजातियाँ हैं जिनका उपयोग अफ्रीकी महाद्वीप में पहले से ही उर्वरक वृक्ष के रूप में किया जा रहा है. ये झाड़ियाँ अवनत भूमि के पुनर्स्थापन, मृदा में जैविक पदार्थ की मात्रा में वृद्धि के साथ-साथ नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P) तथा पोटाश (K) के स्तर को बढ़ाने के लिए उपयुक्त पाई गई हैं. इसके अतिरिक्त, ये फल बागानों में जैवभार के पुनर्चक्रण के माध्यम से पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण हेतु सुबबूल के प्रभावी विकल्प के रूप में भी कार्य कर सकती हैं.

फल फसलों में पोषक तत्व पुनर्चक्रण का मॉडल

यह मॉडल एली (Alley) क्षेत्र में उगाए गए भूमि सुधा (Tephrosia candida) पौधों से प्राप्त जैवभार के माध्यम से पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण कर फल पौधों के थाले (Plant Basin) को समृद्ध बनाने पर आधारित है. इस मॉडल में फल पौधों को अनुशंसित दूरी पर लगाया जाता है तथा कतारों के मध्य उपलब्ध अंतराल में 3.0 मीटर चौड़ी पट्टियों में भूमि सुधा के पौधे बीज द्वारा स्थापित किए जाते हैं. भूमि सुधा के बीजों की बुवाई जुलाई माह में 30 सेमी × 30 सेमी की दूरी पर की जाती है. पौधों की ऊँचाई के लगभग 60 प्रतिशत भाग तक छंटाई (Lopping) करके प्राप्त ताजा जैवभार को फल पौधों के थाले में डाला जाता है. भूमि सुधा से वर्ष में कम-से-कम तीन बार (अक्टूबर, मार्च तथा जून) छंटाई द्वारा जैवभार प्राप्त किया जा सकता है, जिसका उपयोग फल पौधों के मल्चिंग (Mulching) के लिए किया जाता है. ऊतक (Tissue) में पोषक तत्वों की मात्रा के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि प्रारम्भिक तीन वर्षों के दौरान भूमि सुधा के माध्यम से फल पौधों के जड़ क्षेत्र में लगभग 1.17 टन प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन, 0.06 टन प्रति हेक्टेयर फॉस्फोरस तथा 0.42 टन प्रति हेक्टेयर पोटाश का पुनर्चक्रण किया जा सकता है. आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो प्रारम्भिक तीन वर्षों में भूमि सुधा के जैवभार द्वारा पुनर्चक्रित किए जा सकने वाले नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा पोटाश का अनुमानित मूल्य क्रमशः ₹23,400, ₹23,600 तथा ₹25,200 प्रति हेक्टेयर है.

फल फसलों के थाले में भूमि सुधा के जैवभार का मल्च के रूप में उपयोग, मृदा में उपलब्ध पोटाश तथा जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ाने और मृदा के घनत्व (Bulk Density) को कम करने का एक प्रभावी उपाय सिद्ध हुआ है. भूमि सुधा जैवभार की मल्चिंग से वर्षा आधारित परिस्थितियों में फल फसलों की वृद्धि संबंधी विभिन्न मापदण्डों, जैसे तने का व्यास, पौधों की ऊँचाई, छत्रक (Canopy) का फैलाव तथा फल उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है. फल उपज में लगभग 25–30 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई. यह प्रौद्योगिकी वर्तमान में राँची पठार तथा अन्य क्षेत्रों में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), कृषि विज्ञान केन्द्रों (KVKs), किसान संगठनों तथा अन्य संस्थाओं के सहयोग से किसानों द्वारा व्यापक रूप से अपनाई जा रही है.

तालिका 1 : भूमि सुधा (Tephrosia candida) का पोषक तत्व संघटन

क्र. सं.

मानदण्ड

भूमि सुधा

1.

शुष्क जैवभार उत्पादन (टन/हेक्टेयर)

12.8

2.

नाइट्रोजन (N, %)

2.94

3.

फॉस्फोरस (P, %)

0.24

4.

पोटाश (K, %)

1.06

5.

जिंक (Zn, ppm)

35.35

6.

तांबा (Cu, ppm)

19.18

7.

मैंगनीज (Mn, ppm)

177.60

8.

लोहा (Fe, ppm)

203.00

निष्कर्ष

फलोद्यान के एली (Alley) क्षेत्र में भूमि सुधा (Tephrosia candida) जैसे जैवभार उत्पादक पौधों का समावेशन फल वृक्षों की वृद्धि एवं उत्पादकता में सुधार का एक प्रभावी उपाय है. आवश्यकता पड़ने पर इन पौधों को आसानी से हटाया जा सकता है, इसलिए यह सुबबूल (Leucaena leucocephala) का एक प्रभावी एवं व्यावहारिक विकल्प सिद्ध होता है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, अनुसंधान केंद्र, राँची में किसानों को वितरण हेतु भूमि सुधा के बीजों का उत्पादन किया जा रहा है तथा झारखंड के बड़ी संख्या में किसान अपने फल बागानों में भूमि सुधा के पौधे पहले ही स्थापित कर चुके हैं. उचित प्रचार-प्रसार एवं विस्तार गतिविधियों के माध्यम से इस पौधे का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा सकता है, जिससे फल बागानों की उत्पादकता बढ़ाने, मृदा उर्वरता में सुधार लाने तथा पोषक तत्वों के सतत पुनर्चक्रण को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण योगदान प्राप्त किया जा सकता है.

लेखकगण: महेश कुमार धाक, रेशमा शिंदे, जयपाल सिंह चौधरी एवं अनुप दास
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना

English Summary: Tephrosia candida a sustainable solution for soil fertility through biomass recycling
Published on: 19 June 2026, 06:58 PM IST

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