Dragon Fruit Farming: ड्रैगन फ्रूट की खेती बना रही है अच्छी आमदनी का स्रोत, जानें लागत और मुनाफा! 16-17 अप्रैल को आयोजित होगा MIONP 2026: भारत को ऑर्गेनिक और लाभकारी कृषि की ओर ले जाने की पहल Success Story: बस्तर की मिट्टी से उभरी महिला एग्रीप्रेन्योर अपूर्वा त्रिपाठी, हर्बल उत्पादों से बना रहीं वैश्विक पहचान Pusa Corn Varieties: कम समय में तैयार हो जाती हैं मक्का की ये पांच किस्में, मिलती है प्रति हेक्टेयर 126.6 क्विंटल तक पैदावार! Watermelon: तरबूज खरीदते समय अपनाएं ये देसी ट्रिक, तुरंत जान जाएंगे फल अंदर से मीठा और लाल है या नहीं
Updated on: 2 April, 2026 6:24 PM IST
तोरई की खेती (Image Source-shutterstock)

गर्मी का मौसम शुरु होने के बाद किसानों के मन में यह उलझन होती है कि वह इस मौसम में किस फसल की खेती करें, जिससे उनकी आय में इजाफा हो सकें. ऐसे में अगर किसान भाई तोरई की खेती करते हैं, तो अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं. साथ ही इस सब्जी की गर्मी के मौसम में अधिक मात्रा में मांग रहती है, जिससे किसानों की अधिक कमाई होने की संभावना बढ़ जाती है.

इसके अलावा, अप्रैल का महीना इस फसल की बुवाई के लिए सबसे सही माना जाता है, जिससे समय पर फसल तैयार होकर अच्छे दाम मिलने की गुंजाइश बढ़ जाती है.

कम समय में तैयार, जल्दी आमदनी

तोरई की सबसे बड़ी खासियत इसकी जल्दी तैयार होने वाली फसल है. अप्रैल महीने में इसकी बुवाई सबसे उपयुक्त मानी जाती है और महज 40 से 45 दिनों के भीतर फसल तैयार हो जाती है. इससे किसानों को लंबे इंतजार के बिना जल्दी बाजार में उपज बेचने का मौका मिलता है और नकदी प्रवाह बना रहता है.

गर्मियों में बढ़ती डिमांड का फायदा

गर्मी के मौसम में हरी सब्जियों की मांग बढ़ जाती है, जिसमें तोरई की मांग काफी अधिक होती है. बाजार में इसकी अच्छी खपत होने के कारण किसानों को बेहतर दाम मिलते हैं. यही वजह है कि यह फसल कम समय में ज्यादा मुनाफा देने वाली साबित हो रही है.

खेती के लिए उपयुक्त परिस्थितियां

तोरई की अच्छी पैदावार के लिए रेतीली दोमट मिट्टी सबसे बेहतर मानी जाती है. खेत में जल निकासी का अच्छा इंतजाम होना जरूरी है, क्योंकि पानी रुकने से फसल को नुकसान हो सकता है. बुवाई से पहले खेत की 2-3 बार जुताई कर उसे भुरभुरा बनाया जाता है. इसके बाद बेड तैयार कर 1 से 2 फीट की दूरी पर बीज बोए जाते हैं.

मचान तकनीक से बढ़ती गुणवत्ता

तोरई की खेती में मचान (ट्रेलिस) तकनीक का इस्तेमाल किसानों के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो रहा है. इस तकनीक में बेलों को ऊपर चढ़ाया जाता है, जिससे फल जमीन को छूते नहीं हैं. इससे सड़न की संभावना कम हो जाती है और फल की गुणवत्ता बेहतर रहती है. साथ ही, धूप और हवा का सही संचार होने से उत्पादन भी बढ़ता है और तुड़ाई में आसानी होती है.

कम लागत में ज्यादा मुनाफा

तोरई की खेती की सबसे बड़ी ताकत इसका कम लागत वाला मॉडल है. एक बीघा जमीन में इसकी खेती करने पर लगभग 7 से 8 हजार रुपये का खर्च आता है. वहीं, सही देखभाल और तकनीक अपनाने पर किसान 70 से 80 हजार रुपये तक की कमाई कर सकते हैं. यानी लागत के मुकाबले कई गुना ज्यादा मुनाफा संभव है.

लेखक: रवीना सिंह

English Summary: Summer Season Farmers can earn Big profit cultivating ridge gourd
Published on: 02 April 2026, 06:29 PM IST

कृषि पत्रकारिता के लिए अपना समर्थन दिखाएं..!!

प्रिय पाठक, हमसे जुड़ने के लिए आपका धन्यवाद। कृषि पत्रकारिता को आगे बढ़ाने के लिए आप जैसे पाठक हमारे लिए एक प्रेरणा हैं। हमें कृषि पत्रकारिता को और सशक्त बनाने और ग्रामीण भारत के हर कोने में किसानों और लोगों तक पहुंचने के लिए आपके समर्थन या सहयोग की आवश्यकता है। हमारे भविष्य के लिए आपका हर सहयोग मूल्यवान है।

Donate now