मृदा कृषि उत्पादकता तथा पर्यावरणीय स्थिरता का आधार है. किन्तु निरंतर फसल उत्पादन, रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग, मृदा अपरदन तथा जलवायु परिवर्तन के कारण व्यापक स्तर पर मृदा का क्षरण हुआ है. मृदा में जैविक पदार्थों की घटती मात्रा, पोषक तत्त्वों का असंतुलन, लवणीयता तथा मृदा संरचना का खराब होना फसल उत्पादकता को प्रभावित करने वाली प्रमुख समस्याएँ हैं. इस संदर्भ में, मृदा संशोधक मृदा स्वास्थ्य की पुनर्स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. मृदा संशोधक ऐसे पदार्थ हैं जिन्हें मृदा के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक गुणों में सुधार लाने के लिए मृदा में मिलाया जाता है, जिससे पौधों की वृद्धि एवं उत्पादकता में वृद्धि होती है. ये सतत् कृषि तथा एकीकृत पोषक तत्त्व प्रबंधन प्रणाली के महत्वपूर्ण घटक हैं.
मृदा संशोधकों की भूमिका
मृदा संशोधक उर्वरकों से इस दृष्टि से भिन्न होते हैं कि इनका मुख्य उद्देश्य प्रत्यक्ष रूप से पोषक तत्त्व उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि मृदा की दशाओं में सुधार करना होता है. ये मृदा सुधारक (Soil Conditioners) के रूप में कार्य करते हैं तथा मृदा की संरचना, वातन, जलधारण क्षमता, पोषक तत्त्वों की उपलब्धता एवं सूक्ष्मजीवों की सक्रियता में सुधार लाते हैं. मृदा संशोधकों का उपयोग मृदा क्षरण को कम करने, पोषक तत्त्व उपयोग दक्षता बढ़ाने तथा कृत्रिम (रासायनिक) आदानों पर निर्भरता घटाने में सहायक होता है. इसके अतिरिक्त, ये कार्बन संचयन को बढ़ावा देकर पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं.
मृदा संशोधकों के प्रकार
मृदा संशोधकों को व्यापक रूप से दो प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है-
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जैविक मृदा संशोधक
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अजैविक मृदा संशोधक
1. जैविक मृदा संशोधक
जैविक मृदा संशोधक पौधों, पशुओं अथवा सूक्ष्मजीवों से प्राप्त होते हैं तथा जैविक पदार्थों से समृद्ध होते हैं. पर्यावरण-अनुकूल होने तथा दीर्घकालिक लाभ प्रदान करने के कारण इनका व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है.
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गोबर खाद: यह पशुओं के गोबर, मूत्र तथा बिछावन सामग्री का मिश्रण होती है. यह मृदा की उर्वरता, संरचना तथा सूक्ष्मजीवीय सक्रियता में सुधार करती है.
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कम्पोस्ट: फसल अवशेष, रसोई अपशिष्ट तथा पत्तियों जैसे कार्बनिक पदार्थों के अपघटन से तैयार की जाती है. यह पोषक तत्त्वों एवं जैविक पदार्थ का एक स्थिर स्रोत है.
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वर्मीकम्पोस्ट: केंचुओं की सहायता से तैयार की जाने वाली यह खाद पोषक तत्त्वों से भरपूर होती है तथा वृद्धि हार्मोन एवं लाभकारी सूक्ष्मजीवों के माध्यम से पौधों की वृद्धि को प्रोत्साहित करती है.
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हरी खाद: ढैंचा एवं सनई जैसी फसलों को उगाकर फूल आने की अवस्था में मृदा में मिला दिया जाता है, जिससे मृदा में नाइट्रोजन तथा जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है.
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फसल अवशेष: कटाई के बाद खेत में बचे पुआल एवं ठूंठ (स्टबल) को मृदा में मिलाने से कार्बन की मात्रा बढ़ती है तथा मृदा की संरचना में सुधार होता है.
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जैव उर्वरक: राइजोबियम, एजोटोबैक्टर तथा फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु जैसे सूक्ष्मजीवी कल्चर, जो पोषक तत्त्वों की उपलब्धता बढ़ाते हैं.
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बायोचार: बायोमास के पायरोलिसिस से प्राप्त कार्बन-समृद्ध पदार्थ, जो मृदा में कार्बन की मात्रा, जलधारण क्षमता तथा पोषक तत्त्वों को धारण करने की क्षमता में वृद्धि करता है.
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कृषि-औद्योगिक अपशिष्ट: प्रेसमड (गन्ने के रस के शोधन से प्राप्त अवशेष), कॉयर पिथ (नारियल रेशा अवशेष) तथा बैगास (गन्ने का रेशेदार अवशेष जैसे पदार्थ), जो पोषक तत्त्व उपलब्ध कराने के साथ-साथ मृदा के गुणों में भी सुधार करते हैं.
2. अजैविक मृदा संशोधक
अजैविक मृदा संशोधक खनिज-आधारित पदार्थ होते हैं, जिनका उपयोग मुख्यतः मृदा की रासायनिक समस्याओं, जैसे pH असंतुलन एवं लवणीयता के सुधार हेतु किया जाता है.
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चूना: अम्लीय मृदाओं की अम्लता को कम कर मृदा का pH बढ़ाने के लिए उपयोग किया जाता है. जिन मृदा का pH 6.5 से कम हो, उनमें नालियों (Furrow) में 3–4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से इसका प्रयोग किया जाता है.
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जिप्सम: क्षारीय मृदाओं के सुधार तथा कैल्शियम एवं गंधक की पूर्ति के लिए उपयोग किया जाता है. सोडिक मृदाओं के सुधार हेतु जिप्सम की अनुशंसित मात्रा 10–15 टन प्रति हेक्टेयर है. मृदा की ऊपरी 10 सेमी परत में अच्छी तरह मिलाकर प्रयोग करना चाहिए.
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गंधक: क्षारीय मृदाओं में pH कम करने के लिए उपयोग किया जाता है. सामान्यतः 1.0–1.5 टन गंधक प्रति हेक्टेयर की अनुशंसा की जाती है. बेहतर परिणामों के लिए गंधक को 10–15 टन प्रति हेक्टेयर अच्छी तरह गोबर खाद के साथ मिलाकर प्रयोग करना चाहिए.
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जिओलाइट: मृदा की धनायन विनिमय क्षमता तथा जलधारण क्षमता में वृद्धि करता है.
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बेंटोनाइट एवं परलाइट: मृदा की संरचना तथा जलधारण क्षमता में सुधार करते हैं.
मृदा संशोधकों का महत्त्व
1. मृदा के भौतिक गुणों में सुधार
मृदा संशोधक मृदा के कणों के समुच्चयन को बढ़ावा देकर उसकी संरचना में सुधार करते हैं, घनत्व को कम करते हैं तथा रंध्रता में वृद्धि करते हैं. इससे जड़ों का विकास बेहतर होता है, मृदा का वातन सुधरता है तथा जल का अंतःस्रवण बढ़ता है. विशेष रूप से जैविक मृदा संशोधक मृदा की जलधारण क्षमता बढ़ाते हैं, जो सूखे की परिस्थितियों में अत्यंत लाभकारी होती है.
2. मृदा के रासायनिक गुणों में सुधार
मृदा संशोधक पोषक तत्त्वों की उपलब्धता एवं संतुलन में सुधार करते हैं. कार्बनिक संशोधक मृदा में कार्बनिक कार्बन तथा धनायन विनिमय क्षमता को बढ़ाते हैं, जबकि अजैविक संशोधक मृदा के pH को संतुलित करने तथा पोषक तत्त्वों की कमी को दूर करने में सहायक होते हैं. साथ ही, ये पोषक तत्त्वों के निक्षालन एवं स्थिरीकरण से होने वाली हानियों को भी कम करते हैं.
3. जैविक सक्रियता एवं मृदा स्वास्थ्य में वृद्धि
जैविक मृदा संशोधक सूक्ष्मजीवों को ऊर्जा का स्रोत उपलब्ध कराकर उनकी सक्रियता को बढ़ाते हैं. सूक्ष्मजीवों की विविधता बढ़ने से पोषक तत्त्वों का चक्रण, कार्बनिक पदार्थों का अपघटन तथा मृदा जनित रोगों का दमन बेहतर होता है. इनके प्रयोग से मृदा एंजाइमों की सक्रियता एवं सूक्ष्मजीवी जैवभार में भी उल्लेखनीय वृद्धि होती है.
4. सतत् फसल उत्पादकता
मृदा स्वास्थ्य में सुधार होने से फसलों की उपज एवं गुणवत्ता दोनों में वृद्धि होती है. मृदा संशोधक रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को आंशिक रूप से कम करते हैं, जिससे उत्पादन लागत घटती है तथा पर्यावरणीय जोखिम भी कम होते हैं.
5. पर्यावरणीय लाभ
मृदा संशोधक मृदा अपरदन को कम करते हैं, कार्बन संचयन को बढ़ावा देते हैं तथा रासायनिक पदार्थों के अत्यधिक उपयोग से होने वाले प्रदूषण को कम करने में सहायक होते हैं. इसके अतिरिक्त, जैविक अपशिष्टों का मृदा संशोधक के रूप में पुनः उपयोग चक्रीय अर्थव्यवस्था की अवधारणा को भी सुदृढ़ करता है.
मृदा के प्रकार के अनुसार मृदा संशोधकों का उपयोग
विभिन्न प्रकार की मृदा में उनकी अंतर्निहित समस्याओं के आधार पर अलग-अलग मृदा संशोधकों के उपयोग की आवश्यकता होती है. उपयुक्त मृदा संशोधकों का चयन एवं प्रयोग मृदा स्वास्थ्य सुधारने तथा फसल उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
मृदा संशोधकों के उपयोग में व्यावहारिक सावधानियाँ
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मृदा संशोधकों का चयन मृदा परीक्षण के आधार पर किया जाना चाहिए.
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स्थानीय स्तर पर उपलब्ध एवं कम लागत वाले मृदा संशोधकों के उपयोग को प्राथमिकता देनी चाहिए.
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मृदा संशोधकों का अत्यधिक प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं.
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कम्पोस्ट एवं अन्य जैविक संशोधकों का उचित अपघटन एवं उपचार आवश्यक है, ताकि रोगजनकों एवं हानिकारक अशुद्धियों से बचा जा सके.
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रासायनिक उर्वरकों के साथ एकीकृत पोषक तत्त्व प्रबंधन के अंतर्गत मृदा संशोधकों का समन्वित उपयोग सर्वोत्तम परिणाम प्रदान करता है.
निष्कर्ष
मृदा संशोधक सतत् मृदा प्रबंधन एवं कृषि उत्पादकता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साधन हैं. ये न केवल मृदा के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों में सुधार करते हैं, बल्कि पारिस्थितिक तंत्र की सहनशीलता तथा पर्यावरणीय स्थिरता को भी सुदृढ़ बनाते हैं. मृदा के प्रकार एवं फसल की आवश्यकताओं के अनुसार उपयुक्त मृदा संशोधकों का वैज्ञानिक चयन एवं संतुलित उपयोग मृदा स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार लाकर दीर्घकालीन कृषि उत्पादकता सुनिश्चित कर सकता है. सतत् कृषि पर बढ़ते वैश्विक जोर के साथ, मृदा संशोधकों का महत्व भविष्य में और अधिक बढ़ेगा तथा वे रासायनिक आदानों के अत्यधिक उपयोग के प्रभावी एवं व्यावहारिक विकल्प के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे.
लेखक: रेश्मा शिंदे, अनुप दास, संतोष एस. माली एवं अवनि कुमार सिंह
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना