सतावर का वैज्ञानिक नाम (ऐस्पेरेगस रेसीमोसस) है। लिलिएसी परिवार का यह पौधा हमारे देश में विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। सतावर की खेती भारत के अलावा चीन, नेपाल, अफ्रीका, बांग्लादेश और ऑस्ट्रेलिया एवं अन्य देशों में भी की जाती है, वही भारत में राजस्थान, उत्तराखंड, गुजरात, मध्य प्रदेश और यूपी के बाराबंकी, बरेली, प्रतापगढ़, रायबरेली, इलाहाबाद, सीतापुर, शाहजहांपुर, बदायूं, लखनऊ जैसे जिलों में इसकी खेती को मुख्य रूप से किया जाता है।
आयुर्वेद में औषधियों की रानी मानी जाने वाली सतावर का पौधा अनगिनत शाखाओं से युक्त काँटेदार लता के रूप में होता है। सतावर की पूर्ण विकसित लता 30 से 35 फीट तक ऊंची हो सकती है। प्रायः मूल से इसकी कई लताएं अथवा शाखाएं एक साथ निकलती हैं। यद्यपि यह लता की तरह बढ़ती है परन्तु इसकी शाखाएं काफी कठोर (लकड़ी के जैसी) होती हैं। इसके पत्ते काफी पतले तथा सुइयों जैसे नुकीले होते हैं। ग्रीष्म ऋतु में पुनः नवीन शाखाएं निकलती हैं। सितम्बर-अक्टूबर माह में इसमें गुच्छों में पुष्प आते हैं। फूल सफेद रंग के और अच्छी सुगंध वाले होते हैं। फल जामुनी लाल रंग का होता है। पौधे के मूलस्तम्भ से सफेद ट्यूबर्स (मूलों) का गुच्छा निकलता है जिसमें प्रायः प्रतिवर्ष वृद्धि होती जाती है। औषधीय उपयोग में मुख्यतः यही मूल अथवा इन्हीं ट्यूबर्स का उपयोग किया जाता है। बिहार राज्य के भोजपुर, कैमूर, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, मधुबनी, बेगूसराय, पूर्वी चम्पारण, वैशाली के कई किसान सफलतापूर्वक खेती कर रहे हैं। सतावर की एक प्रजाति ऐसी भी है जो कि काँटे रहित होती है। इस सतावर का वैज्ञानिक नाम एस्पेरेगस फिलिसिनस है। यह प्रजाति हिमालय में 4 से 9 हजार फीट की ऊँचाई पर पायी जाती है।
सतावर के प्रमुख औषधीय उपयोग
शक्तिवर्धक के रूप में
विभिन्न शक्तिवर्धक दवाइयों के निर्माण में सतावर का उपयोग किया जाता है। यह न केवल सामान्य कमजोरी, बल्कि शुक्रवर्धन तथा यौनशक्ति बढ़ाने से संबंधित बनाई जाने वाली कई दवाइयों जिनमें यूनानी पद्धति से बनाई जाने वाली माजून जंजीवेल, माजून शीर बरगदवली तथा माजून पाक आदि प्रसिद्ध हैं, में भी प्रयुक्त किया जाता है।
दुग्ध बढ़ाने हेतु
माताओं का दुग्ध बढ़ाने में भी सतावर काफी प्रभावी सिद्ध हुआ है तथा वर्तमान में इससे संबंधित कई दवाइयाँ बनाई जा रही हैं। न केवल महिलाओं बल्कि पशुओं-भैसों तथा गायों में दूध बढ़ाने में भी सतावर काफी उपयोगी सिद्ध हुआ है।
चर्मरोगों के उपचार हेतु, शारीरिक दर्दो के उपचार हेतु आंतरिक हैमरेज, गठिया, पेट के दर्दो, पेशाब एवं मूत्र संस्थान से संबंधित रोगों, गर्दन के अकड़ जाने (स्टिफनेस), पक्षाघात, अर्धपक्षाघात, पैरों के तलवों में जलन, साइटिका, हाथों तथा घुटने आदि के दर्द तथा सरदर्द आदि के निवारण हेतु बनाई जाने वाली विभिन्न औषधियों में भी इसे उपयोग में लाया जाता है।
जलवायु एवं तापमान
सतावर की खेती के लिए मध्यम तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है। इसकी खेती के लिए उचित तापमान 10 से 50 डिग्री सेल्सियस उपयुक्त माना जाता है। बुवाई के लिए 30-35 डिग्री सेल्सियस व कटाई के लिए 20-25 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त रहता है। वहीं 600-100 मिलीमीटर वर्षा पर्याप्त होती है। समुद्र तल से 800-1500 मीटर तक सतावर की खेती सफलतापूर्वक उगायी जाती है। इस प्रकार ज्यादा ठंडे प्रदेशों को छोड़ कर सम्पूर्ण भारत की जलवायु इसकी खेती के लिए उपयुक्त है। विशेष रूप से मध्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों में यह काफी अच्छी प्रकार पनपता है।
उपयुक्त मिट्टी
इसकी खेती में रेतीली भूमि की आवश्यकता होती है। रेतीली भूमि में इसकी जड़ों को फैलने के लिए सुविधा प्राप्त हो जाती है। मिट्टी कार्बनिक जीवांश युक्त जिसमें जल निकास की पर्याप्त व्यवस्था हो, इसकी खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। लाल दोमट से चिकनी मिट्टी व काली मिट्टी से लैटेराइट मिट्टी में सतावर उगाई जाती है। पौधे की वृद्धि के लिए मिट्टी का पीएच मान 6-8 उपयुक्त माना जाता है। सतावर की फसल एक उथली जड़ वाली होती है। अतः इस प्रकार की उथली तथा पठारी मृदा के तहत जिसमें मृदा की गहराई 20-30 सें. मी. की है, उसमें आसानी से उगाया जा सकता है।
सतावर की खेती हेतु नर्सरी
एक एकड़ भूमि में सतावर के खेती के लिए 100 वर्ग फीट की नर्सरी पर्याप्त होती है। पौधशाला की भूमि की अच्छी प्रकार जुताई कर ढेले फोड़कर समतल कर लेना चाहिए। फंफूदीजनित रोग से बचाव हेतु भूमि का शोधन फार्मेल्डीहाइड से अवश्य कर लेना चाहिए। पौधशाला में जैविक खाद व कम्पोस्ट डालकर मिट्टी में मिला दें। नर्सरी भूमि से काफी ऊँची रखनी चाहिए। एक हेक्टेयर के खेत में 3-4 कि.ग्रा. सतावर के बीज डाले जाते हैं। 15 मई के बाद बीज शैय्या में बीज का छिड़काव कर दें। बीजों की रोपाई के बाद उसके ऊपर गोबर मिश्रित मिट्टी को चढ़ा देना चाहिए। इससे बीज अच्छी तरह से ढक जायेंगे। इसके बाद स्प्रिंकलर्स विधि द्वारा बीजों की हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। इनके बीजों का अंकुरण 10 से 15 दिनों में आरम्भ हो जाता है, तथा 40 से 45 दिनों बाद इसके पौधों को पॉलीथीन की थैलियों में रखकर भी तैयार कर सकते हैं।
खेत की तैयारी
सतावर बहुवर्षीय पौधा है तथा इसकी खेती 2-3 साल की अवधि की होती है। अतः भूमि की तैयारी अच्छी प्रकार से करनी चाहिए। प्रारम्भ में देशी हल या कल्टीवेटर से 2-3 बार खेत की गहरी जुताई, वर्षा ऋतु में (जून-अगस्त) कर लेनी चाहिए। तत्पश्चात 2-3 टन केंचुआ खाद या कम्पोस्ट या 20-25 टन गोबर खाद उपलब्धता के अनुसार प्रति एकड़ जुते हुए खेत में बुवाई के पहले डालकर मिला देना चाहिए। इसके पश्चात् नवंबर के शुरुआती दिनों में दूसरी जुताई कर देनी चाहिए।
मुख्य खेत में पौधों की रोपाई
सुविधा अनुसार जुते हुए खेत में 10 मीटर की क्यारियां बनाकर इसमें 4 और 2 के अनुपात में मिट्टी व गोबर की खाद मिलाकर डालनी चाहिए। इसके बाद 60-80 से.मी. की दूरी रखते हुए 9 इंच की मेड़ को तैयार कर लें। जब नर्सरी में पौध 40 दिन के हो जाएं तथा वह 4-5 इंच की ऊँचाई प्राप्त कर ले। नर्सरी से पौधों को सावधानीपूर्वक उखाड़कर माह जुलाई से अगस्त के बीच रोपाई कर देनी चाहिए। पौधों के उचित विकास के लिए 4-5x1-2 मीटर फासले का प्रयोग करें और 20 सें.मी. गहराई में पौध का रोपण करना चाहिए। रोपाई शाम के समय करना बेहद अच्छा रहता है। रोपाई के तुरंत बाद सिंचाई कर देना काफी लाभप्रद होता है।
आरोहण की व्यवस्था
सतावर एक लता है अतः इसके सही विकास के लिए आवश्यक है कि इसके लिए उपयुक्त आरोहण की व्यवस्था की जाए। इस कार्य हेतु यूं तो मचान जैसी व्यवस्था भी की जा सकती है परन्तु यह ज्यादा उपयुक्त रहता है यदि प्रत्येक पौधे के पास लकड़ी के सूखे डंठल अथवा बाँस के डंडे गाड़ दिए जाएं ताकि सतावर की लताएं उन पर चढ़ कर सही विस्तार पा सकें। कई किसानों द्वारा इसे केवल फैसिंग पर भी लगाया जाता है।
खरपतवार नियंत्रण तथा निराई गुड़ाई की व्यवस्था
फसल के शुरुआती दिनों में काफी खरपतवार उग आते हैं जिनको खुरपी से निराई-गुड़ाई कर बाहर निकाल देना चाहिए। इससे एक तरफ जहाँ खरपतवार पर नियंत्रण होता है वहीं हाथ से निराई-गुड़ाई करने से मिट्टी भी नर्म रहती है जिससे पौधों की जड़ों के प्रसार के लिए उपयुक्त वातावरण भी प्राप्त होता है। निराई-गुड़ाई करते समय ध्यान रखें कि पौधे व प्रारोह को कोई नुकसान ना पहुँचे। 6 से 8 बार पूरी फसल में निराई गुड़ाई करना बेहतर होता है।
सिंचाई एवं जल निकास प्रबंधन
सतावर के पौधों को सिंचाई की आवश्यकता कम होती है। फिर भी शुरुआती दिनों में एक माह में 4 से 6 दिन के अंतर पर सिंचाई करते रहें। इसके बाद हर माह में एक सिंचाई से ट्यूबर्स (जड़ों) का अच्छा विकास हो जाता है। सिंचाई के साथ साथ निकास की व्यवस्था इसमें अति आवश्यक है जिससे जड़ों के पास जल भराव न हो सके जो कि पौधों की वृद्धि के लिए हनिकारक होता है। वैसे कम पानी अथवा बिना सिंचाई के अर्थात असिंचित फसल के रूप में भी सतावर की खेती की जा सकती है लेकिन इससे उपज में कमी देखी गयी है।
फसल पकने की अवधि
सतावर की जड़ें लगाने के 24-40 माह बाद परिपक्व हो जाती हैं किन्तु बुवाई के 24 माह बाद मृदा एवं मौसमी दशाओं को देखते हुए खुदाई कर लेना चाहिए जिससे अधिक गुणवत्ता वाली जड़ें प्राप्त होती हैं किन्तु कुछ किसान इसकी खुदाई बुवाई के 24 माह बाद भी करते हैं।
कटाई, प्रसंस्करण एवं उपज
सतावर की खुदाई का उपयुक्त समय अप्रैल-मई है। 24 से 40 माह की फसल, जब पौधों पर लगे हुए फल पक जायें, खुदाई योग्य हो जाती है। ऐसी स्थिति में कुदाली की सहायता से सावधानीपूर्वक जड़ों को खोद लिया जाता है। खुदाई से पहले यदि खेत में हल्की सिंचाई देकर मिट्टी को थोड़ा नर्म बना लिया जाए तो फसल को उखाड़ना आसान हो जाता है। जड़ों को उखाड़ने के बाद उसमें चीरा लगाकर ऊपर का छिलका उतार लिया जाता है। सतावर के कंदों को ट्यूबर्स से अलग करने के लिए इसे पानी में हल्का उबाला जाता है। थोड़ी देर बार ठंडे पानी में कंदों को रखते हैं। ऐसा करने से छिलका बड़ी आसानी से उतर जाता है। कंदों को छीलने के बाद छाया में सुखा लिया जाता है। कंदों के पूरी तरह सूख जाने के बाद एयरटाइट प्लास्टिक के बैग में भरकर बिक्री हेतु भेज देना चाहिये। कंदों की प्रोसेसिंग यानी छिलाई व उबालने, के बाद रंग हल्का पीला हो जाता है। यह देखकर चिंता न करें। एक एकड़ खेत से 150-180 कुन्तल गीली सतावर प्राप्त होती है। जो कि छीलने व सुखाने के बाद 15-18 कुन्तल प्राप्त होती है।
लेखक- डॉ.आर.एस.सेंगर, डा.शालिनी गुप्ता, गरिमा शर्मा एवं डॉ.निधि.सिंह
पादप जैव प्रौद्योगिकी प्रभाग
सरदार वल्लभभाई पटेल, कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ