मिर्च (कैप्सिकम स्पी. ) भारत की एक अत्यंत महत्वपूर्ण सब्जी एवं मसाले वाली फसल है। इसका सब्जी का उपयोग सब्जियों, अचार, मसालों और औषधियों के रूप में किया जाता है। सब्जियों का हमारे भोजन एवं जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका है जिसे ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में उगाया जाता है। उच्च तकनीकी बागवानी में संरक्षित खेती से सब्जियों की गुणवत्ता बढ़ाकर रोग व्याधि एवं मौसम से होने वाले नुकसान को कम कर अथवा बचाकर निर्यात के मानक के अनुसार उच्च गुणवत्ता वाली सब्जियों का बेहतर उत्पादन लिया जाता है। पारंपरिक रूप से रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता के कारण मिट्टी, पर्यावरण और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
मिर्च के मुख्य रोगः
1) डेम्पिंग ऑफ या आद्रगलन रोग: यह रोग नये पौधे के निचले हिस्से को प्रभावित करता है। इससे ग्रसित पौधा सुखकर नष्ट हो जाता है। यह समस्या बुवाई के समय के अलावा नर्सरी में भी आती है। इस रोग के नियंत्रण के लिये कार्बेन्डाजिम दवाई 1.5 ग्रा/ली. या कापर ऑक्सीक्लोराइड 2 ग्रा/ली. से 25-40 मिली./पौधा को उपचारित करते है।
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मिर्च का आद्रगलन रोग
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मिर्च का छाछ्या रोग
2) पाउडरी मिल्ड्यू या छाछ्या रोग: इस बिमारी में पौधे की पतियों पर सफ़ेद पाउडर जैसा चूर्ण दिखाई देता है ये चूर्ण पहले पौधे की निचली सतह पर और बाद में धीरे-धीरे ऊपर होते हुए सम्पूर्ण पत्तियों को ढक लेता है। जिससे पत्तियॉं सूख जाती है और फल निम्न स्तर और कम गुणवत्ता के प्राप्त होते है।
प्रबन्धनः पोन्जामिया/नीम का तेल 7 मिली./ली. गंधक डब्ल्यू. डी.जी. 2 ग्राम/ली. या हेक्साकोनेजोल 0.5 मिली./ली. या माइक्लोवुटानिल 1 ग्राम./ली. या डिनोकैप 1 मिली./ली. या एजोक्सीस्टंबिन 0.5 मिली./ली. या पेन्कोनेजोल 0.5 मिली./ली. या फलूसीलाजोल 0.5 मिली./ली. का छिड़काव करते है।
3) सर्कोस्पोरा लीफ स्पॉटः इसमें पहले पीले दाग पत्तियों पर दिखाई देता है फिर सम्पूर्ण पत्ता गहरा भूरा हो जाता है। जिसके परिणामस्वरुप पत्तियॉं गिर जाती है। इस रोग के नियंत्रण के लिये क्लोरोथेलोनिल 2.5 ग्रा./ली. या मैकोजेब 2.5 ग्रा. /ली. या कार्बेन्डेजिम का छिड़काव करते है।
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लीफस्पॉट रोग
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लीफ कर्ल रोग
4) फाइटोफ्थोरा रोग: ये बिमारी फूल और फल लगते समय लगता है जिसमें पत्तियॉं तैलिय हो जाती है और पौधा 2 से 3 दिन में मर जाता है। भारी बारिश, उच्च आर्द्रता से ये बिमारी तेजी से फेलती है। इस बिमारी से नेट हाऊस की फसल 50-80 प्रतिशत तक खराब हो जाती है। इस रोग के प्रबन्धन के लिये कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 2 ग्रा./ली. या मेटालेक्सील एम. जेड 2 ग्रा/ली. या फोसेटाइल ए. एल. 2 ग्रा. /ली. या एजोक्सीस्टंबिन 0.5 मिली/ली. का छिड़काव करते है।
5) मुरझा या विल्ट रोग: यह रोग फ्यूजेरियम स्पी. नामक कवक से होता है इस रोग लक्षण पौधों की पत्तियाँ पीली होकर मुरझा जाती हैं और जड़ें सड़ जाती हैं और पौधा सूख जाता है। इस रोग के नियंत्रण के लिये उचित फसल चक्र अपनाये, रोग-मुक्त बीज का प्रयोग करें। ट्राईकोडर्मा जैव-उपचारक से बुवाई से पहले बीज उपचार करें।
6) अर्धमुरझा या झुलसा रोग: यह रोग ऑल्टरनेरियां सोलेनाइ कवक से होता है इस रोग के लक्षण सर्वप्रथम पतियों पर भूरे या काले धब्बे बनते हैं और फल सड़ने लगते हैं। इस रोग के नियंत्रण के लिये सर्वप्रथम रोगग्रस्त पौधे को नष्ट करें और उसके बाद मैनकोजेब (0.2%) या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (0.3%) का छिड़काव करें।
7) पर्णमोचक या लीफ कर्ल रोग: यह रोग चिल्ली लीफ कर्ल वायरस से होता है और सफ़ेद मक्खी कीट द्वारा फैलता है इस रोग के लक्षण सर्वप्रथम पत्तियाँ सिकुड़ जाती हैं और ऊपर की ओर मुड़ जाती हैं। पौधों की वृद्धि रुक जाती है। इस रोग के नियंत्रण के लिये सफ़ेद मक्खी को नियंत्रित करें। रोग-प्रतिरोधी किस्में लगाएँ। नीम का घोल (5%) छिड़कें।
मिर्च के प्रमुख कीट:-
1. थ्रिप्स और माइट्सः ये कीट ज्यादतर पोली हाऊस की फसल को प्रभावित करते है। पत्तियों पर चाँदी जैसी चमकदार धारियाँ बनती हैं और पत्तियाँ मुड़ जाती हैं। ये कीट सुखें एवं उच्च तापमान में काफी प्रभावी होते है। बीमारी से प्रभावित पौधे बाजार-मूल्य को भी प्रभावित करते है। पत्ते के ऊपरी भाग पर थ्रिप्स व नीच के भाग पर माइट्स का प्रभाव होता है। इस रोग के प्रबन्धन के लिये थ्रिप्स और माइट्स को नियंत्रण करने के लिए एसिफेट 1 ग्राम/ली.1 या इमिडाक्लोप्रिड 3 मिली/ली. और गंधक सल्फर 2 मि.ली./ली. एन.एस.के.ई 4 प्रतिशत कीड़ों के दिखाई देने की स्थिति में छिड़काव करते है मृदा मे क्लोरोपाइरिफॉस 4 मिली./ली. या इमिडाक्लोरोप्रिड 1.5 मिली./ली के प्रयोग करने से प्रभावी परिणाम प्राप्त होता है। फसल की नियमित निगरानी
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थ्रिप्स व माइट्स कीट
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एफिड व मोयला कीट
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फल छेदक कीट
2. एफिड व मोयला कीट: निम्फस और युवा एफिड पत्तियों से रस चूष लेते है। जिससे पत्तियॉं सूख जाती है और पैदावार कम हो जाती है। पत्तियाँ सिकुड़कर मुड़ जाती हैं व पौधों की वृद्धि रुक जाती है। इससे ना सिर्फ पतियाँ मुड़ती है बल्कि बीमारियॉं भी फैलती है। इस रोग से बचाव के लिए पौधों का निरन्तर निरीक्षण करते रहना चाहिए और पोन्जामिया/नीम सॉंप 10-12 ग्रा./ली. या इमिडाक्लोप्रिड 0.5 मिली./ली. या थाइमेथोक्सैम 0.5 ग्रा/ली. का जल में मिलाकर छिड़काव करते है। पीले और नीले चिपचिपे ट्रैप ट्रैप लगाएँ या नीम आधारित कीटनाशी या थायोमेथोक्सम का छिड़काव करें। प्रकाश ट्रैप लगाकर रात में उड़ने वाले कीट पकड़ें।
3. फल छेदक कीट: फल छेदक रात के समय बहुत ज्यादा क्रियाशील होते है। लार्वा फल में छेद करके अंदर खाता है। फल बेकार हो जाते हैं। ये फल, फुल और पत्तियों पर अण्डा देते है और इनके अण्डे से काफी संख्या में लटें पैदा हो जाती है जो फसल को बर्बाद कर देते है। इसके नियंत्रण के लिये सामान्यतः इनके अण्डे समूह में होते है जिन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है और शिघ्रता से नष्ट किया जा सकता है। इसके लिए इन्डोक्साकार्ब 1 मिली/ली. का छिड़काव करते है। छिड़काव करते समय छोटे पौधो को मेथोमाइल बेटिंग से उपचारित करते है जो कि सुरक्षित, स्वास्थ्यवर्धक और प्रभावी होता है या संक्रमित फल को तोड़कर नष्ट करें या स्पिनोसैड 0.5 मी.ली प्रति लीटर का छिड़काव करें।
4. नेमेटोडस या सूत्रकर्मी: ये सामान्यतः सब्जियों की फसल में देखा जाता है। जब 3-4 बार लगातार एक ही खेत में एक ही फसल उगायी जाती है तब इससे होने वाला नुकसान काफी अधिक होता है। इससे पत्तियॉं पीली, छोटी और फल का आकार छोटा हो जाता है। जब प्रभावित पौधे को जड़ से उखाड़ा जाता है तो पाया जाता है कि जड़ों में गांठे है जिसमें बड़ी संख्या में छोटे और बड़े नेमेटोडस से भरा हुआ है। नेमेटोडस से बचाव के लिए खेत में फसल चक्र जैसे सोलेनेसी को छोड़कर गेंदा, मीठी मकई और बन्द गोभी अपनाते है। पौधरोपण से 4-5 दिन पहले नींम केक 2000 कि.ग्रा./है. बायो पेस्टिसाइड का प्रयोग करते है। प्रबन्धन के लिए ट्राइकोडर्मा विरिडी 20 ग्राम /मी.2 के साथ नीम केक /एफ.वाई.एम. /वर्मी कम्पोस्ट 100 ग्राम /मी.2 से भूमि उपचार करना चाहिए । कीटनाशक दवा पौधे के सम्पूर्ण भाग पर छिड़काव करते समय पहुचना चाहिए। छिड़काव करने वाला व्यक्ति अपने पूरे शरीर पर कपड़ा अच्छी तरह से पहनकर, मुंह ढककर और दस्ताने पहनकर करना चाहिए। मिर्च की सफल खेती के लिए फसल की नियमित निगरानी, रोग-प्रतिरोधी किस्मों का चयन, जैविक नियंत्रण एवं समय-समय पर उचित दवाओं का प्रयोग अत्यंत आवश्यक है।
रोग-मुक्त एवं प्रमाणित बीज का प्रयोग करें। खेत की गहरी जुताई करें ताकि कीट-प्यूपा नष्ट हो सकें। खरपतवार नियंत्रण करें क्योंकि यह कई कीटों के खरपतवार आश्रय स्थल होते हैं। उचित सिंचाई और जल निकास व्यवस्था बनाए रखें।
लेखक- बाबू लाल फगोडिया1 एवं आर. के. फगोडिया2
1कृषि विज्ञान केन्द्र, नई दिल्ली एवं 2कृषि महाविधालय, किशनगढ़बास अलवर (राजस्थान)