भारत के विभिन्न क्षेत्रों की कृषि मृदाएँ अनेक चुनौतियों का सामना कर रही हैं, जिनमें कार्बनिक पदार्थों की घटती मात्रा, पोषक तत्वों का असंतुलन, मृदा क्षरण तथा उर्वरकों के उपयोग की कम दक्षता प्रमुख हैं. निरंतर खेती, सघन फसल प्रणालियों तथा रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता ने इन समस्याओं को और अधिक बढ़ा दिया है. साथ ही, फसल एवं पशुधन आधारित मिश्रित कृषि प्रणालियाँ देश के अनेक भागों में ग्रामीण आजीविका का एक महत्वपूर्ण घटक बनी हुई हैं. गोबर खाद, वर्मीकम्पोस्ट, कम्पोस्ट, हरी खाद, फसल अवशेष, बायोगैस स्लरी तथा जैव उर्वरकों जैसे कार्बनिक पोषक स्रोत मृदा स्वास्थ्य में सुधार तथा कृषि उत्पादकता को बनाए रखने के लिए व्यापक संभावनाएँ प्रदान करते हैं.
डेयरी पालन, बकरी पालन, भेड़ पालन, सूअर पालन तथा बेकयार्ड फार्मिंग जैसी पशुधन आधारित गतिविधियों से मूल्यवान कार्बनिक संसाधन प्राप्त होते हैं, जिन्हें कृषि प्रणाली के भीतर पुनर्चक्रित किया जा सकता है. इनका वैज्ञानिक उपयोग बाह्य आदानों पर निर्भरता को कम कर सकता है, उत्पादन लागत घटा सकता है, मृदा उर्वरता में सुधार कर सकता है तथा फसल उत्पादकता बढ़ा सकता है, जिससे भारत में सतत् एवं जलवायु-सहिष्णु कृषि को बढ़ावा मिलता है.
मृदा को भी संतुलित आहार की आवश्यकता होती है
जिस प्रकार मनुष्य के अच्छे स्वास्थ्य के लिए संतुलित आहार आवश्यक है, उसी प्रकार मृदा को भी संतुलित पोषण की आवश्यकता होती है. केवल यूरिया पर अत्यधिक निर्भरता से फसलों को नाइट्रोजन तो प्राप्त हो जाती है, किंतु इससे फॉस्फोरस, पोटाश, गंधक तथा जस्ता और बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी उत्पन्न हो जाती है. परिणामस्वरूप मृदा की उत्पादकता घटती है और खेती की लागत बढ़ जाती है. संतुलित उर्वरक उपयोग का अर्थ है मृदा परीक्षण एवं फसल की आवश्यकता के आधार पर सही मात्रा में, सही समय पर तथा सही विधि से पोषक तत्वों का प्रयोग करना. यह पद्धति फसल उत्पादन में वृद्धि करती है, पोषक तत्वों की हानि को कम करती है तथा दीर्घकाल तक मृदा स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहायक होती है.
कृषि और पशुधन : पोषक तत्वों का प्राकृतिक चक्र
कृषि और पशुधन मिलकर पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण की एक आदर्श प्राकृतिक प्रणाली का निर्माण करते हैं. फसल अवशेष पशुओं के लिए चारे का कार्य करते हैं, जबकि पशुओं से प्राप्त गोबर एवं मूत्र मूल्यवान पोषक स्रोतों के रूप में पुनः मृदा में लौटाए जाते हैं. पुनर्चक्रण की यह सतत प्रक्रिया मृदा की उर्वरता एवं उत्पादकता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
फसल → चारा → पशुधन → गोबर एवं मूत्र → वर्मीकम्पोस्ट → मृदा → फसल
यह चक्र न केवल बाह्य आदानों पर निर्भरता को कम करता है, बल्कि कृषि को अधिक टिकाऊ एवं आत्मनिर्भर भी बनाता है.
पशुधन : प्रकृति का उर्वरक कारखाना
भारत विश्व के सर्वाधिक पशुधन संपन्न देशों में से एक है. पशुधन केवल दूध, मांस, अंडे एवं रोजगार ही प्रदान नहीं करता, बल्कि जैविक खाद का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी है. प्रत्येक पशु अपने गोबर एवं मूत्र के माध्यम से मृदा में पोषक तत्वों की आपूर्ति करता है, जिससे मृदा की उर्वरता में वृद्धि होती है तथा फसल उत्पादन को स्थायी आधार प्राप्त होता है.
विभिन्न पशुधन से अनुमानित गोबर उत्पादन
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पशु |
गोबर उत्पादन (किलोग्राम/दिन) |
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गाय |
10–15 |
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भैंस |
15–20 |
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सूअर |
2–4 |
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बकरी |
0.5–1.0 |
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कुक्कुट |
0.08–0.12 |
इन संसाधनों का वैज्ञानिक एवं समुचित उपयोग किसानों की रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता को उल्लेखनीय रूप से कम कर सकता है.
वर्मीकम्पोस्ट : अपशिष्ट से संपदा का निर्माण
वर्मीकम्पोस्ट एक उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद है, जो केंचुओं द्वारा कार्बनिक अपशिष्टों के अपघटन से तैयार की जाती है. यह पशुधन से प्राप्त अपशिष्टों तथा फसल अवशेषों को एक मूल्यवान कृषि संसाधन में परिवर्तित कर देती है और इसे प्रायः “अपशिष्ट से संपदा (Waste to Wealth)” की अवधारणा का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है. साधारण गोबर खाद की तुलना में वर्मीकम्पोस्ट में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा पोटाश की मात्रा अधिक होती है. इसके अतिरिक्त, यह लाभकारी सूक्ष्मजीवों, एंजाइमों, पौध वृद्धि प्रवर्धकों तथा ह्यूमिक पदार्थों से समृद्ध होती है. ये घटक मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणवत्ता में सुधार करते हैं, पौधों की वृद्धि को प्रोत्साहित करते हैं तथा पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाकर फसल उत्पादकता में वृद्धि करने में सहायक होते हैं.
प्रमुख जैविक खादों में पोषक तत्वों की मात्रा (%)
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जैविक खाद |
नाइट्रोजन (N) |
फॉस्फोरस (P) |
पोटाश (K) |
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गोबर खाद |
0.5 |
0.2 |
0.5 |
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कम्पोस्ट |
0.8–1.0 |
0.4–0.8 |
1.0 |
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वर्मीकम्पोस्ट |
1.5–2.0 |
1.0–1.5 |
1.0–1.8 |
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बायोगैस स्लरी |
1.5–2.0 |
1.0 |
1.0 |
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कुक्कुट खाद |
2.5–3.5 |
2.0–2.5 |
1.5–2.0 |
वर्मीकम्पोस्ट का नियमित प्रयोग मृदा की संरचना में सुधार करता है, उसकी जलधारण क्षमता को बढ़ाता है तथा पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करता है.
संतुलित उर्वरक उपयोग में जैविक खादों की भूमिका
विभिन्न शोध अध्ययनों से यह निरंतर सिद्ध हुआ है कि जैविक खादों एवं रासायनिक उर्वरकों का समन्वित उपयोग केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने की तुलना में अधिक प्रभावी होता है. जैविक खादें मृदा में जैविक पदार्थ की मात्रा बढ़ाती हैं, पोषक तत्वों की उपलब्धता में सुधार करती हैं तथा उर्वरकों के उपयोग की दक्षता को बढ़ाती हैं. इसके परिणामस्वरूप मृदा स्वास्थ्य बेहतर होता है, फसल उत्पादकता में वृद्धि होती है तथा कृषि उत्पादन की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित होती है.
पोषक तत्व उपयोग दक्षता (%)
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उपचार (Treatment) |
दक्षता (%) |
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केवल NPK |
35 |
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NPK + गोबर खाद |
50 |
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NPK + कम्पोस्ट |
55 |
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NPK + वर्मीकम्पोस्ट |
60 |
इन निष्कर्षों से स्पष्ट रूप से सिद्ध होता है कि जैविक खादें उर्वरकों की उपयोग दक्षता को बढ़ाती हैं, जिससे फसलों की उत्पादकता में वृद्धि होती है तथा किसानों को अधिक लाभ प्राप्त होता है.
संतुलित उर्वरक उपयोग एवं जलवायु-अनुकूल कृषि
जलवायु परिवर्तन कृषि के लिए एक प्रमुख चुनौती बन चुका है, जिसके प्रभाव के रूप में अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ तथा तापमान में वृद्धि जैसी स्थितियाँ लगातार देखी जा रही हैं. ऐसे परिदृश्य में कार्बन-स्मार्ट कृषि की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है. पशुधन आधारित जैविक संसाधन जैसे गोबर खाद, वर्मीकम्पोस्ट तथा बायोगैस स्लरी मिट्टी में कार्बनिक कार्बन की मात्रा को बढ़ाते हैं. इससे मृदा की संरचना में सुधार होता है, जल धारण क्षमता बढ़ती है तथा मृदा में सूक्ष्मजीवों की गतिविधियाँ अधिक सक्रिय हो जाती हैं. इन सभी सुधारों के परिणामस्वरूप फसलें जलवायु जनित तनावों जैसे सूखा एवं अत्यधिक वर्षा की परिस्थितियों को अधिक प्रभावी ढंग से सहन कर पाती हैं. इसके अतिरिक्त, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होने से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आती है, जिससे जलवायु परिवर्तन के शमन में भी महत्वपूर्ण योगदान प्राप्त होता है.
संतुलित पोषक तत्त्व प्रबंधन: टिकाऊ कृषि की कुंजी
संतुलित पोषक तत्त्व प्रबंधन का उद्देश्य फसलों को उनकी आवश्यकतानुसार सभी आवश्यक पोषक तत्त्वों की पर्याप्त एवं संतुलित आपूर्ति सुनिश्चित करना है. इसमें रासायनिक उर्वरकों, जैविक खादों, जैव उर्वरकों तथा फसल अवशेषों के समन्वित उपयोग को शामिल किया जाता है. इस प्रणाली के अंतर्गत पोषक तत्त्वों का कुशल एवं वैज्ञानिक प्रबंधन न केवल फसल उत्पादन एवं उत्पादकता को बढ़ाता है, बल्कि मृदा स्वास्थ्य को भी दीर्घकाल तक बनाए रखता है. पशुधन इस पूरी कृषि प्रणाली का एक केंद्रीय घटक है, क्योंकि यह मृदा, फसल तथा मानव स्वास्थ्य के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता है.
संतुलित उर्वरक उपयोग एवं पशुधन आधारित जैविक खाद = स्वस्थ मिट्टी + अधिक उत्पादन + कम लागत + अधिक लाभ
यह सिद्धांत एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन की आधारशिला बनता है, जिसे व्यापक रूप से सतत् कृषि का एक प्रमुख स्तंभ माना जाता है.
किसानों के लिए अनुशंसाएँ
• प्रत्येक 2–3 वर्ष में मृदा परीक्षण कराएँ.
• मृदा स्वास्थ्य कार्ड में दी गई अनुशंसाओं का पालन करें.
• प्रति हेक्टेयर 5–10 टन गोबर की खाद या कम्पोस्ट का प्रयोग करें.
• गाँव स्तर पर वर्मी कम्पोस्ट इकाइयाँ स्थापित करें.
• फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उन्हें कम्पोस्ट में परिवर्तित करें.
• फसल चक्र में दलहनी फसलों को शामिल करें.
• फसल उत्पादन को पशुपालन के साथ एकीकृत करें.
• बायोगैस तथा जैविक खाद आधारित ग्रामीण उद्यमों को बढ़ावा दें.
निष्कर्ष
कृषि का भविष्य रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग में नहीं, बल्कि एक संतुलित एवं एकीकृत दृष्टिकोण में निहित है, जिसमें स्वस्थ मृदा, संतुलित पोषण और प्राकृतिक संसाधनों का दक्ष उपयोग शामिल है. गोबर खाद, वर्मीकम्पोस्ट, बायोगैस स्लरी तथा अन्य जैविक इनपुट जैसे पशुधन-आधारित संसाधन मृदा स्वास्थ्य में सुधार, पोषक तत्व उपयोग दक्षता बढ़ाने तथा सतत कृषि उत्पादन सुनिश्चित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. चूँकि ग्रामीण कृषि प्रणालियों में कृषि और पशुपालन एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं, इसलिए एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन उत्पादन लागत को कम करने, लाभप्रदता बढ़ाने और पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करने का एक व्यावहारिक मार्ग प्रदान करता है. किसानों को गोबर को “खेत का सोना”, वर्मी कम्पोस्ट को “मिट्टी का अमृत” तथा संतुलित उर्वरक उपयोग को “समृद्ध कृषि की कुंजी” के रूप में देखना चाहिए. अंततः, सतत् कृषि स्वस्थ मृदा, कुशल पोषक प्रबंधन तथा कृषि एवं पशुपालन के प्रभावी एकीकरण पर निर्भर करती है. यही मार्ग अनुकूल कृषि प्रणालियों, समृद्ध किसानों और विकसित भारत की ओर ले जाता है.
मुख्य संदेश
“गोबर खेत का सोना है, वर्मीकम्पोस्ट उसकी चमक है और संतुलित उर्वरक उपयोग कृषि सफलता की कुंजी है.”
लेखकगण: सुधांशु शेखर, अवनि कुमार सिंह एवं अनुप दास
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना