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Updated on: 25 June, 2026 6:15 PM IST

भारत में कृषि ग्रामीण आजीविका तथा खाद्य एवं पोषण सुरक्षा का आधार है. बिहार जैसे राज्यों में, जहाँ 90 प्रतिशत से अधिक किसान लघु एवं सीमांत श्रेणी के हैं तथा उनके पास सीमित भूमि जोत उपलब्ध है, कृषि उत्पादन अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है. इनमें कृषि जोतों का निरंतर घटता आकार, कृषि आदानों की बढ़ती लागत, प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण, जलवायु परिवर्तन एवं मौसमीय अनिश्चितताएँ तथा कृषि आय में अस्थिरता प्रमुख हैं. इन परिस्थितियों में ऐसी कृषि प्रणालियों की आवश्यकता है जो एक साथ उत्पादकता, लाभप्रदता और स्थिरता को बढ़ाने में सक्षम हों.

समेकित कृषि प्रणाली इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु एक प्रभावी रणनीति के रूप में उभरकर सामने आई है. फसल उत्पादन को पशुपालन, मत्स्यपालन, बागवानी, कुक्कुटपालन, कृषि वानिकी, मधुमक्खी पालन, मशरूम उत्पादन तथा अन्य कृषि-आधारित उद्यमों के साथ एकीकृत करके समेकित कृषि प्रणाली संसाधनों के दक्ष उपयोग, आय के विविधीकरण तथा जलवायु एवं बाजार संबंधी जोखिमों के प्रति कृषि की सहनशीलता को बढ़ावा देती है. परिणामस्वरूप, यह खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ करने के साथ-साथ सतत कृषि विकास सुनिश्चित करने का एक व्यावहारिक एवं प्रभावी समाधान प्रदान करती है.

समेकित कृषि प्रणाली की अवधारणा एवं सिद्धांत

समेकित कृषि प्रणाली कृषि का एक समग्र तथा संसाधन-संरक्षण आधारित दृष्टिकोण है, जिसमें एक ही उत्पादन प्रणाली के अंतर्गत विभिन्न कृषि उद्यमों को परस्पर जोड़ा जाता है. उद्यमों का चयन एवं उनका एकीकरण स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों, उपलब्ध संसाधनों, बाजार की संभावनाओं तथा किसानों की आवश्यकताओं के आधार पर किया जाता है.

आईएफएस का मूल सिद्धांत कृषि संसाधनों का दक्षतापूर्ण उपयोग तथा पुनर्चक्रण है. फसल अवशेष, पशुधन अपशिष्ट, तालाब की गाद तथा प्रणाली के भीतर उत्पन्न अन्य उप-उत्पादों को पुनर्चक्रित करके अन्य घटकों के लिए निवेश के रूप में पुनः उपयोग किया जाता है. इस प्रकार का एकीकरण संसाधनों के उपयोग की दक्षता को बढ़ाता है, बाहरी आदानों पर निर्भरता को कम करता है, उत्पादन लागत में कमी लाता है तथा पर्यावरणीय प्रदूषण को न्यूनतम करता है. उत्पादकता में वृद्धि के अतिरिक्त, आईएफएस जैव विविधता संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य सुधार, जोखिम न्यूनीकरण, वर्षभर रोजगार सृजन तथा कृषि प्रणालियों की दीर्घकालिक स्थिरता को भी प्रोत्साहित करता है.

समेकित कृषि प्रणाली क्यों आवश्यक है ?

पारंपरिक रूप से अधिकांश किसान धान-गेहूँ अथवा अन्य अनाज आधारित एकल फसल प्रणाली अपनाते हैं. यह प्रणाली बाढ़, सूखा, असमय वर्षा तथा बाजार की अनिश्चितताओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होती है. एक ही फसल पर निर्भरता किसानों की आय को अस्थिर बनाती है तथा प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में पूरे परिवार की आजीविका संकट में पड़ जाती है. दूसरी ओर, रासायनिक उर्वरकों एवं बाहरी संसाधनों पर अत्यधिक निर्भर आधुनिक कृषि ने मिट्टी की उर्वरता, जैव विविधता तथा पर्यावरणीय संतुलन को भी प्रभावित किया है. ऐसे में समेकित कृषि प्रणाली किसानों को बहुआयामी उत्पादन, संसाधनों के कुशल उपयोग तथा जोखिम प्रबंधन का अवसर प्रदान करती है.

समेकित कृषि प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ

  • संसाधनों का पुनर्चक्रण: फसल अवशेष, पशुओ के गोबर, कुक्कुट एवं बत्तख की बीट आदि का खाद के रूप मे पुनः उपयोग कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जाती है .

  • भूमि का अधिकतम उपयोग: एक ही भूमि पर विभिन्न उद्यमों को समाहित कर प्रति इकाई क्षेत्र अधिक उत्पादन प्राप्त किया जाता है.

  • आय का विविधीकरण: समेकित कृषि में एक ही कृषि प्रणाली में विभिन्न कृषि और गैर-कृषि घटकों के एकीकरण से किसानों के लिए आय के स्रोतों में विविधता लाने में मदद मिलती है और फसल की विफलता या मूल्य में अस्थिरता का जोखिम कम हो जाता है.

  • प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण: यह प्रणाली फसल चक्र, अंतरफसल, कृषिवानिकी और जैविक एवं प्राकृतिक उर्वरकों के उपयोग के माध्यम से मृदा, जल एवं जैव-विविधता जैसे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को बढ़ावा देता है जिससे भविष्य के लिए इन संसाधनों की दीर्घकालिक उत्पादकता सुनिश्चित होती है.

  • मिट्टी की उर्वरता में सुधार: समेकित कृषि प्रणाली में विभिन्न कृषि और गैर-कृषि घटकों का एकीकरण करने से मृदा क्षरण में कमी एवं जैव-विविधता में वृद्धि होती है जिससे मिट्टी की उर्वरता में सुधार होता है. इससे फसल की पैदावार बढ़ती है और मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर होता है.

  • आजीविका एवं पोषण सुरक्षा में सुधार: इस प्रणाली का लक्ष्य उत्पादकता में वृद्धि, आय के स्रोतों में विविधता लाना और खाद्य सुरक्षा एवं पोषण में सुधार करके किसानों की आजीविका में सुधार करना है.

  • छोटे एवं सीमांत किसानों का सशक्तिकरण: समेकित कृषि प्रणाली विशेष रूप से छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए लाभप्रद है जिनके पास सीमित संसाधन हो सकते हैं और आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकियों को अपनाने में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. इन किसानों को स्थायी कृषि पद्धतियाँ प्रदान करके उन्हें सशक्त बनाने में यह प्रणाली मददगार है जो उनकी उत्पादकता, आय और समग्र कल्याण में सुधार करती हैं.

समेकित कृषि प्रणाली के अंतर्गत संसाधनों का पुनर्चक्रण

संसाधन पुनर्चक्रण समेकित कृषि प्रणाली की आधारशिला है. खेत के भीतर उत्पन्न जैविक अपशिष्टों को मूल्यवान आदानों में परिवर्तित कर एक चक्रीय एवं सतत उत्पादन प्रणाली का निर्माण किया जाता है. फसल अवशेष, पशुओं का गोबर एवं मूत्र, कुक्कुट मल, बत्तखों की बीट तथा अन्य कृषि उप-उत्पादों का प्रभावी रूप से पुनर्चक्रण कर उन्हें फार्म यार्ड खाद (एफवाईएम), वर्मी कम्पोस्ट, बायोगैस तथा अन्य जैविक संशोधकों में परिवर्तित किया जाता है.

समेकित कृषि प्रणाली के विभिन्न घटकों से प्राप्त जैविक खादों की पोषक तत्त्व संरचना तथा कार्बनिक कार्बन की मात्रा भिन्न-भिन्न होती है. ये पदार्थ पौधों के लिए पोषक तत्त्वों के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में कार्य करते हैं तथा मृदा उर्वरता एवं मृदा कार्बनिक पदार्थ के संरक्षण और संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

तालिका 1:  समेकित कृषि प्रणाली में उपयोग की जाने वाली प्रमुख जैविक खादों की पोषक तत्त्व संरचना

 

खाद का स्रोत

नाइट्रोजन (N %)

फॉस्फोरस (PO %)

पोटाश (KO %)

कार्बनिक कार्बन (%)

गोबर  खाद

0.5–0.6

0.15–0.3

0.5–1.0

15–25

वर्मीकम्पोस्ट

0.8–1.5

1.0–1.8

1.2–2.0

9.5–18

बकरी खाद

1.0-2.0

0.5-1.0

0.5-1.5

15–22

कुक्कुट खाद

2.5–4.0

2.0–3.0

1.5–2.5

20–27

बत्तख खाद

0.9-1.1

0.3-0.6

0.3-0.5

18–25

पोल्ट्री खाद में नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है, जबकि वर्मीकम्पोस्ट पोषक तत्त्वों की संतुलित आपूर्ति के साथ-साथ लाभकारी सूक्ष्मजीवों का भी समृद्ध स्रोत है, जैसा कि तालिका 1 में दर्शाया गया है. गोबर खाद तथा बकरी खाद मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं, जबकि बत्तख की बीट समेकित मत्स्य–बत्तख पालन प्रणाली में पोषक तत्त्वों के एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में कार्य करती है.

संसाधनों के इस पुनर्चक्रण से उर्वरकों एवं अन्य कृषि आदानों पर होने वाला व्यय कम होता है, जिससे खेती की लागत में उल्लेखनीय कमी आती है और किसानों की शुद्ध आय बढ़ती है.  संसाधन पुनर्चक्रण का पर्यावरणीय महत्व भी अत्यधिक है. फसल अवशेषों को जलाने के स्थान पर उनका उपयोग खाद, पशु चारा अथवा मल्च के रूप में करने से वायु प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आती है. जैविक पदार्थों के नियमित उपयोग से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ती है, जिससे सूखा एवं जलवायु परिवर्तन के प्रति फसलों की सहनशीलता में सुधार होता है.

“खेत बचाओ अभियान” के संदर्भ में समेकित कृषि प्रणाली का विशेष महत्व है, क्योंकि अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से मृदा स्वास्थ्य में गिरावट, कार्बनिक पदार्थों की कमी तथा पर्यावरणीय प्रदूषण जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं. समेकित कृषि प्रणाली में संसाधनों का पुनर्चक्रण मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग तथा पर्यावरण-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देता है, जो न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करता है, बल्कि स्वस्थ मिट्टी, स्वच्छ पर्यावरण और टिकाऊ कृषि विकास की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है.

निष्कर्ष

समेकित कृषि प्रणाली कृषि विकास का एक टिकाऊ, संसाधन-कुशल एवं जलवायु-सहिष्णु मॉडल है, जिसमें फसल, पशुपालन, मत्स्य पालन, बागवानी तथा अन्य कृषि उद्यमों को एकीकृत रूप से जोड़ा जाता है. संसाधनों के प्रभावी पुनर्चक्रण एवं पोषक तत्त्वों के कुशल चक्रण के माध्यम से यह प्रणाली उपलब्ध संसाधनों के उपयोग की दक्षता बढ़ाती है, मृदा स्वास्थ्य में सुधार करती है, बाहरी आदानों पर निर्भरता कम करती है तथा किसानों की आय के स्रोतों में विविधता लाती है. समेकित कृषि प्रणाली न केवल कृषि उत्पादकता एवं लाभप्रदता में वृद्धि करती है, बल्कि जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं तथा बाजार संबंधी जोखिमों के प्रति कृषि को अधिक लचीला और सुरक्षित बनाती है. विशेष रूप से बिहार जैसे राज्यों में, जहाँ अधिकांश किसान छोटे एवं सीमांत वर्ग से संबंधित हैं, यह प्रणाली खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने, ग्रामीण रोजगार सृजन, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा किसानों की आजीविका में सुधार का एक व्यावहारिक एवं प्रभावी माध्यम प्रदान करती है. इस प्रकार, समेकित कृषि प्रणाली का व्यापक प्रसार एवं अपनाव एक ऐसी कृषि व्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है जो अधिक उत्पादक, लाभकारी, संसाधन-कुशल, पर्यावरण-अनुकूल तथा जलवायु-स्मार्ट हो. भविष्य की टिकाऊ कृषि एवं ग्रामीण विकास के लिए समेकित कृषि प्रणाली एक सशक्त एवं दूरदर्शी समाधान के रूप में उभर रही है.

लेखकगण: संजीव कुमार एवं अनुप दास
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना

English Summary: Integrated farming system for sustainable agriculture and farmers income growth
Published on: 25 June 2026, 06:20 PM IST

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