फरवरी का महीना शुरु होने वाला है और किसान भाइयों को तलाश है ऐसी फसल की जिसकी बाजार में अधिक मांग हो और कीमत भी अच्छी मिल जाए. ऐसे में किसानों के लिए सागर जिले से उगाया गया हाइब्रिड टमाटर किसानों के लिए सही विकल्प साबित हो सकता है. साथ ही इस किस्म की राजस्थान, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और दिल्ली में मांग बनी रहती है. अगर किसान इस किस्म को अपनाते हैं, तो वह इससे लाखों की कमाई कर सकते हैं.
फरवरी में क्यों फायदेमंद है टमाटर की खेती?
फरवरी का महीना टमाटर की खेती के लिए उचित माना जाता है, क्योंकि इस समय मौसम न ज्यादा ठंडा रहता है और न ही ज्यादा गर्म, जिससे पौधे की बढ़वार बेहतर होती है. अगर किसान फरवरी के पहले या दूसरे सप्ताह में प्रो-ट्रे में बीज डालकर नर्सरी तैयार करते हैं, तो करीब 25–30 दिनों में मजबूत पौधे तैयार कर सकते है.
वहीं, मार्च के पहले पखवाड़े में खेत में रोपाई करने पर मार्च के अंत या अप्रैल की शुरुआत में ही पहली तुड़ाई शुरू हो जाती है, जिससे किसानों की भी आमदनी दोगुना हो जाती है.
हाईटेक तकनीक क्यों लाभकारी है?
अब टमाटर की खेती को किसान पूरानी तकनीकों के माध्यम से नहीं कर रहे हैं. अब किसान ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग तकनीक को अपनाकर खेती को अधिक लाभकारी बना रहे हैं, क्योंकि ड्रिप सिस्टम से पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है, जिससे करीब 70 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है.
वहीं मल्चिंग शीट खेत में नमी बनाए रखती है और खरपतवार को पनपने नहीं देती और इसका किसानों को यह फायदा होता है कि उन्हें कम लागत, कम मेहनत में अधिक उत्पादन मिल जाता है.
सही वैरायटी का चुनाव सबसे जरूरी
अगर आप टमाचर की खेती कर रहे हैं, तो इस बात का ख्याल रखें कि टमाटर की खेती में सही बीज का ही चुनाव करें, क्योंकि अगर वैरायटी सही नहीं चुनी गई, तो वायरस और रोग पूरी फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं. ऐसे में किसान अगर 1546 और अधिराज जैसी हाइब्रिड वैरायटी का चुनाव करते हैं, तो बढ़िया मुनाफा कमा सकते हैं, क्योंकि इन वैरायटी में वायरस का खतरा कम होता है और उत्पादन भी ज्यादा मिलता है
अनुदान से होगा मुनाफा
जो किसान लागत की वजह से ड्रिप और मल्चिंग तकनीक अपनाने से हिचक रहे हैं, उनके लिए उद्यानिकी विभाग राहत लेकर आया है. विभाग की ओर से हाइब्रिड बीज, ड्रिप सिस्टम और मल्चिंग पर 45 से 55 प्रतिशत तक का अनुदान दिया जा रहा है.
वहीं, एक एकड़ में मल्चिंग का खर्च लगभग 20 हजार रुपये आता है, जिसमें करीब 10 हजार रुपये तक का अनुदान मिल सकता है. सपोर्टिंग सिस्टम पर 15–16 हजार रुपये खर्च होते हैं, जिनमें 8 हजार रुपये तक की सहायता मिलती है. वहीं ड्रिप सिस्टम की कुल लागत 75–80 हजार रुपये होती है, जिसमें 35 से 40 हजार रुपये तक का अनुदान किसानों को मिल जाता है.
लेखक: रवीना सिंह