हरी खाद एक जैविक उर्वरक है, जिसमें हरी अवस्था वाली फसल को पूर्ण परिपक्वता अथवा पुष्पन अवस्था से पूर्व ही जुताई करके मिट्टी में मिला दिया जाता है. अपघटन के पश्चात यह मिट्टी को नाइट्रोजन, जैविक कार्बन तथा अन्य आवश्यक पोषक तत्त्वों से समृद्ध करती है. हरी खाद के लिए वे फसलें सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती हैं, जिनकी वृद्धि तीव्र होती है, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती हैं, मृदा उर्वरता में वृद्धि करती हैं तथा मिट्टी में मिलाने के बाद शीघ्र अपघटित होकर पर्याप्त मात्रा में जैविक पदार्थ एवं पोषक तत्त्व उपलब्ध कराती हैं. ढैंचा, सनई, लोबिया, मूंग तथा उड़द जैसी दलहनी फसलें हरी खाद के रूप में सर्वाधिक प्रचलित एवं उपयुक्त फसलें हैं.
हरी खाद मृदा उर्वरता में सुधार, मृदा संरचना के सुदृढ़ीकरण तथा मृदा में नमी संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. यह मृदा के भौतिक गुणों में सुधार कर उसे अधिक उत्पादक बनाती है तथा आगामी फसलों के लिए पोषक तत्त्वों की बेहतर उपलब्धता सुनिश्चित करती है. हरी खाद का उपयोग मृदा में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या एवं सक्रियता को भी बढ़ाता है, जो जैविक पदार्थों के अपघटन तथा पौधों के लिए पोषक तत्त्वों की उपलब्धता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. हरी खाद के उपयोग से रासायनिक उर्वरकों पर किसानों की निर्भरता कम होती है, जिससे उत्पादन लागत में कमी आती है तथा पर्यावरणीय सततता को बढ़ावा मिलता है. इसके अतिरिक्त, हरी खाद का नियमित उपयोग मृदा में कार्बनिक कार्बन की मात्रा में वृद्धि करता है, जिससे मृदा स्वास्थ्य में सुधार होता है तथा कृषि उत्पादन की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित होती है. अतः संतुलित पोषक तत्त्व प्रबंधन में हरी खाद की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है.
हरी खाद का महत्त्व एवं लाभ
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मृदा उर्वरता में वृद्धि: हरी खाद मृदा में नाइट्रोजन तथा जैविक कार्बन की उपलब्धता बढ़ाकर उसकी उर्वरता में उल्लेखनीय सुधार करती है.
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मृदा संरचना में सुधार: यह मृदा को भुरभुरी, छिद्रयुक्त तथा सुवातित बनाती है, जिससे पौधों की जड़ों का विकास बेहतर होता है.
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नमी संरक्षण: हरी खाद मृदा में नमी के संरक्षण में सहायक होती है तथा उसकी जलधारण क्षमता को बढ़ाती है.
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मृदा अपरदन की रोकथाम: हरी खाद की फसलें मृदा की सतह को ढककर वर्षा एवं हवा से होने वाले मृदा अपरदन को कम करने में सहायता करती हैं.
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सूक्ष्मजीवी गतिविधियों में वृद्धि: यह मृदा में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या एवं उनकी सक्रियता को बढ़ावा देती है, जिससे पोषक तत्त्वों का अपघटन एवं उपलब्धता बेहतर होती है.
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कृषि निवेश लागत में कमी: हरी खाद के उपयोग से रासायनिक उर्वरकों एवं पोषक तत्त्व प्रबंधन पर होने वाले व्यय में कमी आती है.
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फसल उत्पादकता में वृद्धि: मृदा की गुणवत्ता एवं पोषक तत्त्वों की उपलब्धता में सुधार के कारण फसलों की वृद्धि एवं उपज में वृद्धि होती है.
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रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता में कमी: हरी खाद पोषक तत्त्वों का एक सतत एवं प्राकृतिक स्रोत प्रदान करती है, जिससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है.
हरी खाद देने की विधियाँ
1. खेत में उगाकर हरी खाद देना
इस विधि में हरी खाद की फसल उसी खेत में उगाई जाती है, जहाँ उसे मिट्टी में मिलाना होता है. यह विधि मुख्यतः पर्याप्त वर्षा अथवा सुनिश्चित सिंचाई सुविधा वाले क्षेत्रों में अपनाई जाती है. हरी खाद की फसल को लगभग 40–50 दिनों तक बढ़ने दिया जाता है तथा पुष्पन अवस्था आने से पूर्व जुताई करके मिट्टी में मिला दिया जाता है. मिट्टी में मिलाने के बाद फसल का अपघटन होता है, जिससे मिट्टी में जैविक पदार्थ एवं पोषक तत्त्वों की मात्रा बढ़ती है और मृदा उर्वरता में सुधार होता है.
2. हरी पत्तियों द्वारा हरी खाद देना
इस विधि में वृक्षों, झाड़ियों अथवा अन्य पौधों से प्राप्त हरी पत्तियों एवं कोमल टहनियों को खेत में फैलाकर जुताई के माध्यम से मिट्टी में मिला दिया जाता है. ये पौध सामग्री सीमित मृदा नमी की स्थिति में भी अपघटित होकर मिट्टी में जैविक पदार्थ एवं पोषक तत्त्वों की पूर्ति करती है. यह विधि विशेष रूप से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में उपयोगी होती है, जहाँ हरी खाद की पृथक फसल उगाना संभव नहीं होता.
हरी खाद के लिए निम्नलिखित फसलों का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है, क्योंकि इनमें तीव्र वृद्धि, अधिक हरित जैवभार उत्पादन, वायुमंडलीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण तथा शीघ्र अपघटन की क्षमता होती है.
1. सनई
सनई एक महत्वपूर्ण दलहनी फसल है, जो अच्छी जल निकासी वाली बलुई एवं दोमट मिट्टियों में अच्छी तरह विकसित होती है तथा हरी खाद के लिए अत्यंत उपयुक्त मानी जाती है. इसकी बुवाई अप्रैल–मई से लेकर मानसून प्रारम्भ होने तक अथवा सिंचित परिस्थितियों में की जा सकती है. इसके लिए 25–35 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है. यह तीव्र वृद्धि करने वाली फसल है, जिसे बुवाई के 40–60 दिन बाद मिट्टी में मिला दिया जाता है. इससे लगभग 18–28 टन हरित जैवभार प्राप्त होता है तथा यह प्रति हेक्टेयर लगभग 85–125 किलोग्राम नाइट्रोजन मिट्टी में उपलब्ध कराती है. इसकी प्रमुख उन्नत किस्में अंकुर स्वास्तिक, K-12 तथा शैलेश सनई हैं.
2. ढैंचा
ढैंचा हरी खाद के लिए सर्वाधिक प्रचलित दलहनी फसल है. इसे विभिन्न प्रकार की जलवायु एवं मृदा परिस्थितियों में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है. यह लगभग एक सप्ताह तक जलभराव सहन कर सकती है. जलभराव की स्थिति में इसके तने से पार्श्व जड़ें विकसित हो जाती हैं, जिससे पौधे तेज हवाओं का भी सामना कर लेते हैं. एक बार स्थापित होने के बाद यह सूखे को भी अच्छी तरह सहन करती है तथा क्षारीय एवं लवणीय मिट्टियों में भी उगाई जा सकती है. इसकी बुवाई सामान्यतः अप्रैल–मई में की जाती है. कतारों में बुवाई हेतु 25–30 किलोग्राम तथा छिटकवाँ बुवाई हेतु 30–50 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है. लगभग 45 दिनों में यह 20–25 टन हरित जैवभार उत्पन्न करती है तथा प्रति हेक्टेयर लगभग 85–105 किलोग्राम नाइट्रोजन उपलब्ध कराती है. धान की रोपाई से पूर्व ढैंचा को मिट्टी में मिलाने से खरपतवारों का प्रभाव भी कम होता है. इसकी प्रमुख किस्म नरेन्द्र ढैंचा-1 है.
3. टेफ्रोसिया
टेफ्रोसिया एक झाड़ीदार दलहनी हरी खाद फसल है, जिसका उपयोग मृदा उर्वरता बढ़ाने तथा जैविक पदार्थ की मात्रा में वृद्धि के लिए किया जाता है. इसकी जड़ों में बनने वाली ग्रंथियाँ वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती हैं. यह कम उर्वरता वाली मिट्टियों तथा कम से मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी अच्छी तरह विकसित होती है. इसकी बुवाई सामान्यतः मानसून के आगमन पर जून–जुलाई में की जाती है तथा 15–20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है. यह सूखा-सहिष्णु फसल है और बंजर एवं कम उपजाऊ भूमि में भी सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है. इसकी झाड़ीदार वृद्धि मृदा अपरदन को रोकने तथा खरपतवारों को नियंत्रित करने में सहायक होती है. बुवाई के 45–60 दिनों बाद इसे मिट्टी में मिला दिया जाता है. इससे लगभग 15–20 टन हरित जैवभार प्राप्त होता है तथा प्रति हेक्टेयर 60–90 किलोग्राम नाइट्रोजन मिट्टी में जुड़ती है. यह विशेष रूप से फलोद्यानों, ढालू भूमि तथा जैविक खेती प्रणालियों के लिए उपयोगी है.
4. उड़द
उड़द एवं मूंग दोनों दलहनी फसलें हैं, जिन्हें ग्रीष्म (जायद) तथा खरीफ दोनों मौसमों में अच्छी जल निकासी वाली बलुई अथवा दोमट मिट्टियों में उगाया जा सकता है. फलियों की तुड़ाई के पश्चात शेष फसल अवशेषों को मिट्टी में मिलाकर हरी खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है. इस प्रकार इन फसलों से एक ओर अनाज प्राप्त होता है, वहीं दूसरी ओर मृदा उर्वरता में भी सुधार होता है. इनकी बुवाई हेतु सामान्यतः 20–25 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है. ये लगभग 8–12 टन हरित जैवभार उत्पन्न करती हैं तथा प्रति हेक्टेयर लगभग 40–60 किलोग्राम नाइट्रोजन मिट्टी में उपलब्ध कराती हैं.
5. लोबिया
लोबिया एक दलहनी फसल है, जिसे सिंचित परिस्थितियों में आंशिक हरी खाद के रूप में उगाया जा सकता है. यह अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट मिट्टियों के लिए उपयुक्त है तथा जलभराव को सहन नहीं कर सकती. इसकी बुवाई के लिए 25–35 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है. यह लगभग 15–25 टन हरित जैवभार उत्पन्न करती है तथा प्रति हेक्टेयर लगभग 60–74 किलोग्राम नाइट्रोजन मिट्टी में उपलब्ध कराती है.
6. बरसीम
बरसीम एक वार्षिक शीतकालीन दलहनी चारा फसल है, जिसे मुख्यतः हरे चारे के लिए उगाया जाता है. हरी खाद के दृष्टिकोण से भी यह मृदा उर्वरता बढ़ाने तथा कार्बनिक पदार्थ की मात्रा में वृद्धि करने वाली महत्वपूर्ण फसल है. यह ठंडी जलवायु तथा अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टियों में अच्छी तरह विकसित होती है. इसकी बुवाई सामान्यतः अक्टूबर–नवंबर में की जाती है तथा 25–30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है. हरी खाद के लिए इसे सामान्यतः बुवाई के 60–80 दिनों बाद अथवा पहली कटाई से पूर्व मिट्टी में मिला दिया जाता है. राइजोबियम जीवाणुओं के साथ सहजीवी संबंध के कारण यह प्रति हेक्टेयर लगभग 60–100 किलोग्राम नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती है. बरसीम मृदा में जैविक पदार्थ की मात्रा बढ़ाती है, नमी संरक्षण में सहायता करती है, मृदा संरचना में सुधार लाती है तथा अपनी सघन वृद्धि के कारण खरपतवारों को भी नियंत्रित करती है. हालांकि, इसे तीव्र जैवभार उत्पन्न करने वाली फसलों की अपेक्षा द्वितीयक हरी खाद फसल माना जाता है.
7. रिजका (लूसर्न/अल्फाल्फा)
रिजका, जिसे अल्फाल्फा भी कहा जाता है, एक बहुवर्षीय दलहनी चारा फसल है, जिसे उच्च गुणवत्ता वाले हरे एवं सूखे चारे के लिए व्यापक रूप से उगाया जाता है. यह ठंडी एवं अपेक्षाकृत शुष्क जलवायु तथा गहरी, अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टियों में सर्वोत्तम वृद्धि करती है. इसकी गहरी जड़ प्रणाली मृदा की निचली परतों से पोषक तत्त्वों का अवशोषण कर मृदा संरचना में सुधार करती है. हरी खाद के रूप में इसकी जड़ों में उपस्थित राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते हैं. इसकी बुवाई हेतु लगभग 15–20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है. यद्यपि इसे सामान्यतः 3–4 वर्षों तक बहुवर्षीय चारा फसल के रूप में उगाया जाता है, फिर भी बुवाई के लगभग 50–70 दिनों बाद अथवा पहली कटाई से पूर्व इसे मिट्टी में मिलाकर हरी खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है. यह प्रति हेक्टेयर लगभग 80–120 किलोग्राम नाइट्रोजन उपलब्ध कराने की क्षमता रखती है तथा दीर्घकाल में मृदा उर्वरता एवं मृदा स्वास्थ्य में निरंतर सुधार करती है. तीव्र वृद्धि वाली हरी खाद फसलों की तुलना में यह दीर्घकालिक मृदा सुधारक फसल के रूप में अधिक उपयोगी मानी जाती है.
इन फसलों के अतिरिक्त मोठ, कुल्थी, जंगली नील, सेंजी तथा खेसारी को भी उपयुक्त कृषि-जलवायु परिस्थितियों में हरी खाद की फसलों के रूप में उगाया जाता है.
अतः हरी खाद संतुलित पोषक तत्त्व प्रबंधन की एक महत्वपूर्ण जैविक पद्धति है, जो मृदा उर्वरता में वृद्धि, मृदा संरचना में सुधार, मृदा में नमी संरक्षण तथा लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता को बढ़ावा देती है. हरी खाद को अपनाने से किसानों की रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है, उत्पादन लागत में कमी आती है तथा कृषि प्रणालियों की दीर्घकालिक सततता सुनिश्चित होती है.
लेखकगण: बी. के. झा, कीर्ति सौरभ एवं उज्ज्वल कुमार
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना