उर्वरकों की बढ़ती लागत और मिट्टी के स्वास्थ्य में गिरावट किसानों के लिए प्रमुख चिंताएँ हैं. फसलों की बेहतर उपज के लिए उर्वरक आवश्यक हैं, लेकिन उनका अनुचित उपयोग मिट्टी को नुकसान पहुँचा सकता है, उपयोग दक्षता को कम कर सकता है तथा लागत बढ़ा सकता है.
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भारत में पोषक तत्वों के उपयोग का पैटर्न अत्यंत असंतुलित है, जहाँ एन:पी:के (N:P:K) का अनुपात लगभग 3:3.5:1 है, जो फास्फोरस एवं पोटाश की तुलना में नाइट्रोजन के अत्यधिक उपयोग को दर्शाता है.
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उर्वरकों के इस असंतुलित उपयोग का प्रतिकूल प्रभाव मिट्टी के स्वास्थ्य, पोषक तत्वों की उपलब्धता तथा दीर्घकालिक उत्पादकता पर पड़ रहा है.
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इसलिए अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए उर्वरकों का संतुलित एवं वैज्ञानिक तरीके से प्रयोग किया जाना चाहिए.
उर्वरकों का उचित उपयोग क्यों महत्वपूर्ण है
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उर्वरकों का सही उपयोग न केवल फसल की उपज एवं गुणवत्ता में वृद्धि करता है, बल्कि दीर्घकाल तक मिट्टी की उर्वरता एवं स्थिरता बनाए रखने में भी सहायक होता है.
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प्रत्येक खेत की आवश्यकताएँ अलग-अलग होती हैं. बिना सोचे-समझे उर्वरकों का प्रयोग न करें. अधिक उर्वरक का अर्थ अधिक उपज नहीं होता. बेहतर उत्पादन प्राप्त करने, लागत कम करने तथा मिट्टी को स्वस्थ बनाए रखने के लिए उर्वरकों का विवेकपूर्ण उपयोग करें.
4R सिद्धांतों का पालन करें:
सही उर्वरक, सही मात्रा, सही समय तथा सही विधि
उर्वरकों के उपयोग में क्या करें
मृदा परीक्षण का पालन करें
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उर्वरकों के प्रयोग से पहले मिट्टी की जाँच कराएँ ताकि खेत की वास्तविक पोषक तत्व स्थिति का पता चल सके.
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मृदा परीक्षण परिणामों एवं फसल की आवश्यकता के अनुसार पोषक तत्वों का प्रयोग करें.
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अनुमान के आधार पर उर्वरक न डालें, क्योंकि अंधाधुंध प्रयोग से असंतुलन एवं अनावश्यक खर्च बढ़ता है.
संतुलित उर्वरीकरण अपनाएँ
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फसल की आवश्यकता के अनुसार एन:पी:के (N:P:K) का उचित अनुपात (4:2:1) अपनाएँ ताकि बेहतर वृद्धि हो सके.
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केवल यूरिया पर निर्भर न रहें, क्योंकि यह केवल नाइट्रोजन प्रदान करता है और पोषक तत्वों का असंतुलन उत्पन्न करता है.
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सूक्ष्म पोषक तत्वों (मृदा परीक्षण के अनुसार) का भी प्रयोग करें, क्योंकि उनकी कमी फसल उत्पादन को सीमित कर सकती है.
सही समय पर उर्वरकों का प्रयोग करें
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फसल की महत्वपूर्ण वृद्धि अवस्थाओं पर उर्वरकों का प्रयोग करें, जब पोषक तत्वों की माँग अधिक होती है.
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नाइट्रोजन को 2-3 बार विभाजित मात्रा में दें ताकि हानि कम हो तथा उपयोग दक्षता बढ़े.
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सिंचाई से पूर्व उर्वरकों का प्रयोग करें ताकि वे अच्छी तरह घुलकर जड़ों तक पहुँच सकें.
जैविक स्रोतों का उपयोग करें
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मिट्टी के स्वास्थ्य एवं उर्वरता में सुधार हेतु गोबर की सड़ी खाद, कम्पोस्ट तथा वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग करें.
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फसल अवशेषों को जलाने के बजाय खेत में ही मिलाएँ ताकि पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण हो सके.
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ढैंचा, सनई, लोबिया, पिल्लीपेसरा आदि हरी खाद फसलों का प्रयोग करें, जो प्राकृतिक रूप से मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाती हैं.
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मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने तथा इष्टतम उत्पादन प्राप्त करने के लिए समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (अजैविक + जैविक) अपनाएँ.
उर्वरकों का उचित स्थान पर प्रयोग करें
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उर्वरकों को जड़ क्षेत्र के निकट डालें ताकि पौधे पोषक तत्वों को आसानी से अवशोषित कर सकें.
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विशेष रूप से यूरिया का सतही छिड़काव (ब्रॉडकास्टिंग) करने से बचें, क्योंकि इससे पोषक तत्वों की हानि बढ़ती है.
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धान में गहरी सतह पर उर्वरक देने की तकनीक अपनाएँ, जिससे नाइट्रोजन की हानि कम होती है और उपयोग दक्षता बढ़ती है.
जैव उर्वरकों का उपयोग करें
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दलहनी फसलों में प्राकृतिक नाइट्रोजन स्थिरीकरण हेतु राइजोबियम का उपयोग करें.
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प्रभावी गांठ निर्माण (नोड्यूलेशन) सुनिश्चित करने के लिए फसल-विशिष्ट राइजोबियम स्ट्रेन का उपयोग करें.
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फास्फोरस की उपलब्धता बढ़ाने हेतु फॉस्फेट घुलनशील बैक्टीरिया का प्रयोग करें.
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अनाज एवं सब्जी फसलों में एजोटोबैक्टर/एजोस्पिरिलम का उपयोग करें.
मिट्टी में नमी बनाए रखें
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उर्वरकों का प्रयोग नम मिट्टी में करें ताकि उनका घुलन एवं अवशोषण बेहतर हो सके.
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आवश्यकता पड़ने पर उर्वरक देने के बाद सिंचाई करें ताकि पोषक तत्व जड़ क्षेत्र तक पहुँच सकें.
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अत्यधिक शुष्क परिस्थितियों में उर्वरकों का प्रयोग न करें, क्योंकि ऐसे में पोषक तत्वों का अवशोषण उचित रूप से नहीं हो पाता है.
नमी तनाव की स्थिति में पर्णीय पोषण अपनाएँ
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पर्णीय छिड़काव (Foliar Feeding) पोषक तत्व उपयोग दक्षता बढ़ाता है तथा मिट्टी में नमी की कमी के दौरान फसल वृद्धि बनाए रखने में सहायक होता है.
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अनुशंसा के अनुसार 2 प्रतिशत यूरिया घोल अथवा डीएपी घोल का छिड़काव करें.
उर्वरकों के उपयोग में क्या न करें
मृदा परीक्षण के बिना उर्वरक प्रयोग न करें
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इससे मिट्टी में पोषक तत्वों का असंतुलन उत्पन्न होता है, जो फसल वृद्धि को प्रभावित करता है.
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अनावश्यक अथवा अत्यधिक उर्वरक प्रयोग से पैसे की बर्बादी होती है.
यूरिया का अत्यधिक उपयोग न करें
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अधिक नाइट्रोजन से पौधे कमजोर एवं अत्यधिक कोमल हो जाते हैं तथा कीटों के प्रति संवेदनशील बनते हैं.
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विशेष रूप से अनाज फसलों में गिरने की समस्या बढ़ती है.
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कीट एवं रोगों के प्रकोप की संभावना बढ़ जाती है.
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दानों की गुणवत्ता घटती है तथा कुल उत्पादन कम हो सकता है.
सभी उर्वरकों का प्रयोग एक साथ न करें
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इससे पोषक तत्वों की हानि रिसाव एवं वाष्पीकरण के माध्यम से बढ़ जाती है.
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उर्वरकों की उपयोग दक्षता कम हो जाती है तथा फसल को अपेक्षित लाभ नहीं मिलता.
सूखी मिट्टी में उर्वरकों का प्रयोग न करें
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नमी की कमी के कारण पोषक तत्वों का समुचित अवशोषण नहीं हो पाता.
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उर्वरकों की बर्बादी होती है तथा फसल की प्रतिक्रिया कमजोर रहती है.
भारी वर्षा से पहले उर्वरकों का प्रयोग न करें
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वर्षा जल के साथ पोषक तत्व खेत से बह जाते हैं.
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इससे जल प्रदूषण बढ़ता है तथा उर्वरकों की प्रभावशीलता कम हो जाती है.
जैविक खादों की उपेक्षा न करें
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समय के साथ मिट्टी कठोर एवं कम उपजाऊ हो जाती है.
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लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधि तथा मिट्टी का स्वास्थ्य प्रभावित होता है.
असंतुलित उर्वरीकरण से बचें
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सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी फसल वृद्धि एवं उत्पादन को प्रभावित करती है.
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लगातार असंतुलन मिट्टी के स्वास्थ्य एवं उत्पादकता को कमजोर करता है.
जैव उर्वरकों का अनुचित उपयोग न करें
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जैव उर्वरकों को रासायनिक उर्वरकों अथवा कीटनाशकों के साथ सीधे न मिलाएँ.
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जैव उर्वरकों की विफलता से बचने हेतु अनुशंसित उपयोग विधियों का पालन करें.
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अत्यधिक गर्मी, गंभीर सूखे अथवा भारी वर्षा के दौरान उनका प्रयोग न करें.
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समाप्ति तिथि के बाद जैव उर्वरकों का उपयोग न करें.
स्वस्थ मिट्टी ही सतत् कृषि की आधारशिला है. मृदा परीक्षण पर आधारित संतुलित उर्वरीकरण तथा जैविक खादों, जैव उर्वरकों, हरी खादों एवं फसल विविधीकरण के समन्वित उपयोग से मिट्टी की उर्वरता बनाए रखते हुए स्थिर फसल उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है. रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक एवं असंतुलित उपयोग को कम करने से न केवल खेती की लागत घटती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण तथा दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता में भी सुधार होता है. आज वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियों को अपनाकर किसान आने वाली पीढ़ियों के लिए अधिक सुदृढ़, लाभकारी एवं टिकाऊ कृषि व्यवस्था का निर्माण कर सकते हैं.
लेखकगण: डॉ. सोनका घोष एवं डॉ. अनुप दास
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना