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Updated on: 29 June, 2026 12:29 PM IST

भारत की आधुनिक कृषि प्रणाली आज एक गंभीर, किंतु प्रायः अनदेखे संकट का सामना कर रही है. रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया, के निरंतर एवं असंतुलित उपयोग के कारण मृदा की उर्वरता में कमी, मृदा का कठोर होना तथा उसकी संरचना का ह्रास हो रहा है. निम्नभूमि धान उत्पादन प्रणालियों में नाइट्रोजन का अत्यधिक प्रयोग न केवल लघु एवं सीमांत किसानों के लिए खेती की लागत बढ़ाता है, बल्कि जल स्रोतों को प्रदूषित करता है तथा मृदा में उपस्थित लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या भी कम कर देता है. ऐसी परिस्थितियों में ऐसे टिकाऊ एवं कम लागत वाले विकल्पों की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, जो मृदा स्वास्थ्य को पुनर्स्थापित करते हुए फसल उत्पादकता को भी बनाए रखें.

नील-हरित शैवाल, जिन्हें सायनोबैक्टीरिया भी कहा जाता है, इस समस्या का वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित एवं व्यवहारिक समाधान प्रस्तुत करते हैं. यह धान के खेत में एक स्व-क्रियाशील प्राकृतिक नाइट्रोजन कारखाने की तरह कार्य करता है, जिससे किसान रासायनिक उर्वरकों पर अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं तथा साथ ही मृदा स्वास्थ्य में भी सुधार कर सकते हैं.

संतुलित उर्वरक उपयोग एवं सतत धान उत्पादन में नील-हरित शैवाल की भूमिका

धान की खेती में संतुलित पोषक तत्त्व प्रबंधन बनाए रखने में नील-हरित शैवाल की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है. यह जलमग्न (डूबी हुई) परिस्थितियों में वायुमंडलीय नाइट्रोजन का प्राकृतिक रूप से स्थिरीकरण करता है और उसे पौधों के लिए उपलब्ध रूप में परिवर्तित कर देता है. औसतन, नील-हरित शैवाल प्रति हेक्टेयर लगभग 20–30 किलोग्राम नाइट्रोजन उपलब्ध कराता है, जिससे किसान 40–60 किलोग्राम यूरिया के उपयोग को कम कर सकते हैं तथा धान में अनुशंसित नाइट्रोजन उर्वरक की मात्रा में लगभग 25 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है. विभिन्न अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ है कि नील-हरित शैवाल का उपयोग यदि अनुशंसित नाइट्रोजन उर्वरक की दो-तिहाई मात्रा के साथ किया जाए, तो इससे अधिक धान उत्पादन तथा बेहतर शुद्ध लाभ प्राप्त होता है. इस प्रकार, यह धान में समेकित पोषक तत्त्व प्रबंधन की एक प्रभावी रणनीति सिद्ध होती है. नील-हरित शैवाल पोषक तत्त्वों की क्रमिक एवं निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करता है, जिससे नाइट्रोजन उपयोग दक्षता बढ़ती है तथा लीचिंग और वाष्पीकरण (Volatilization) के माध्यम से होने वाली पोषक तत्त्वों की हानि कम होती है. परिणामस्वरूप, यह सतत एवं पर्यावरण-अनुकूल धान उत्पादन को प्रोत्साहित करता है.

नाइट्रोजन स्थिरीकरण के अतिरिक्त, नील-हरित शैवाल मृदा की समग्र उर्वरता में भी महत्वपूर्ण सुधार करता है. शैवाल जैव-द्रव्य के विघटन के बाद मृदा में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है, जिससे मृदा की संरचना में सुधार होता है, जल धारण क्षमता बढ़ती है तथा लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता में वृद्धि होती है. ये सभी प्रक्रियाएँ पोषक तत्त्वों के प्रभावी चक्रण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं. इसके अतिरिक्त, नील-हरित शैवाल मृदा में उपस्थित फॉस्फोरस के अनुपलब्ध रूपों को घुलनशील बनाकर पौधों के लिए उपलब्ध कराता है, जिससे अतिरिक्त रासायनिक फॉस्फेट उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है. इस प्रकार, नील-हरित शैवाल संतुलित एवं समेकित पोषक तत्त्व प्रबंधन प्रणाली को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देता है.

इसके अलावा, नील-हरित शैवाल प्राकृतिक रूप से पौध वृद्धि को प्रोत्साहित करने वाले पदार्थ, जैसे ऑक्सिन (Auxins), जिबरेलिन (Gibberellins) तथा विभिन्न विटामिन, का उत्पादन करता है. ये पदार्थ जड़ों के बेहतर विकास, अधिक कल्लों (Tillers) के निर्माण तथा फसल की समग्र स्फूर्ति एवं वृद्धि को बढ़ावा देते हैं. स्वस्थ एवं सशक्त पौधे पोषक तत्त्वों का अधिक कुशलतापूर्वक उपयोग करते हैं, जिससे उनकी वृद्धि और उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार होता है. समय के साथ नील-हरित शैवाल के नियमित उपयोग से इसके लाभ संचयी रूप से बढ़ते जाते हैं तथा किसान सामान्यतः 15 से 30 प्रतिशत तक अधिक उपज के साथ-साथ मृदा की गुणवत्ता में भी स्पष्ट सुधार का अनुभव करते हैं.

नील-हरित शैवाल का प्रक्षेत्र स्तर पर संवर्धन

नील-हरित शैवाल तकनीक को किसानों के लिए अधिक सुलभ एवं किफायती बनाने हेतु इसका संवर्धन खेत स्तर पर सरल विधियों से आसानी से किया जा सकता है. इन विधियों में बहुत कम निवेश की आवश्यकता होती है तथा इन्हें व्यक्तिगत किसान या सामुदायिक स्तर पर सफलतापूर्वक अपनाया जा सकता है.

प्रक्षेत्र विधि बड़े पैमाने पर नील-हरित शैवाल उत्पादन की सबसे अधिक प्रचलित एवं प्रभावी तकनीक है. इसके लिए जल स्रोत के निकट लगभग 40 वर्ग मीटर का समतल भू-भाग चुनकर उसके चारों ओर मेड़ (Bund) बना दी जाती है, ताकि पानी रुका रहे. इसके बाद खेत में 5–7 सेमी गहराई तक पानी भर दिया जाता है तथा उपयुक्त परिस्थितियाँ बनाए रखने के लिए 2–4 किलोग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 200–400 ग्राम चूना मिलाया जाता है. मृदा के बैठ जाने के बाद 5 किलोग्राम नील-हरित शैवाल स्टार्टर कल्चर को पानी की सतह पर समान रूप से बिखेर दिया जाता है. लगभग 10 से 15 दिनों में हरे रंग की मोटी शैवाल परत (Algal Mat) विकसित हो जाती है. इसके बाद पानी निकालकर इस परत को सुखाया जाता है और सूखने पर इसे परतों (Flakes) के रूप में एकत्र कर लिया जाता है. इस विधि से लगभग 30–40 किलोग्राम नील-हरित शैवाल प्राप्त होता है, जो 3–4 हेक्टेयर क्षेत्र में उपयोग के लिए पर्याप्त होता है.

छोटे स्तर पर उत्पादन के लिए ट्रफ अथवा टैंक विधि अपनाई जा सकती है. इस विधि में उथले टैंक या ट्रफ में मृदा एवं पानी भरकर उसमें आवश्यक पोषक तत्त्व मिलाए जाते हैं तथा नील-हरित शैवाल कल्चर का संरोपण (Inoculation) किया जाता है. इसी प्रकार, गड्ढा विधि (Pit Method) में खेत में छोटे-छोटे अस्तरयुक्त (Lined) गड्ढे तैयार किए जाते हैं और उनमें ट्रफ विधि के समान प्रक्रिया अपनाकर नील-हरित शैवाल का संवर्धन किया जाता है. एक अन्य व्यवहारिक तकनीक नर्सरी विधि है, जिसमें धान की पौधशाला के साथ-साथ नील-हरित शैवाल का भी संवर्धन किया जाता है. इससे एक ओर स्वस्थ धान की पौध तैयार होती है, वहीं दूसरी ओर जैव उर्वरक के रूप में नील-हरित शैवाल का उत्पादन भी हो जाता है.

धान की खेती में नील-हरित शैवाल का प्रयोग

सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त करने के लिए नील-हरित शैवाल का प्रयोग उचित समय तथा अनुशंसित मात्रा में करना आवश्यक है. सामान्यतः प्रति हेक्टेयर 10 किलोग्राम सूखे नील-हरित शैवाल फ्लेक्स (Flakes) के प्रयोग की अनुशंसा की जाती है. धान की रोपाई के 7 से 10 दिन बाद इन्हें खेत में समान रूप से बिखेर देना चाहिए. इस समय तक धान की फसल अच्छी तरह स्थापित हो जाती है तथा पर्याप्त सूर्यप्रकाश जल की सतह तक पहुँचता है, जिससे नील-हरित शैवाल का तीव्र संवर्धन एवं नाइट्रोजन स्थिरीकरण सुचारु रूप से होता है.

नील-हरित शैवाल के सफल उपयोग के लिए उचित जल प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है. इसके प्रयोग के बाद कम-से-कम 10–15 दिनों तक खेत में 3–5 सेमी जल स्तर बनाए रखना चाहिए, ताकि शैवाल की वृद्धि तथा वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण प्रभावी ढंग से हो सके. साथ ही, नील-हरित शैवाल के प्रयोग से ठीक पहले या तुरंत बाद नाइट्रोजन उर्वरकों की अधिक मात्रा का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे इसकी सक्रियता प्रभावित हो सकती है. नाइट्रोजन उर्वरकों को विभाजित मात्रओं में देने से नील-हरित शैवाल के साथ उनका बेहतर समन्वय स्थापित होता है, जिससे पोषक तत्त्वों के उपयोग की दक्षता बढ़ती है तथा धान की फसल को अधिक लाभ प्राप्त होता है. 

सावधानियाँ एवं सीमाएँ

यद्यपि नील-हरित शैवाल अत्यंत लाभकारी जैव उर्वरक है, फिर भी इसके प्रभावी उपयोग के लिए कुछ आवश्यक परिस्थितियों का ध्यान रखना चाहिए. इसका सर्वोत्तम प्रदर्शन तटस्थ से हल्की क्षारीय मृदाओं में होता है. यदि मृदा अम्लीय हो, तो उसमें पहले चूने का प्रयोग करके अम्लता का सुधार करना आवश्यक है, अन्यथा नील-हरित शैवाल की प्रभावशीलता कम हो सकती है. नील-हरित शैवाल कीटों एवं रोगों के नियंत्रण में प्रयुक्त कुछ कीटनाशकों के प्रति भी संवेदनशील होता है, विशेषकर यदि उनका प्रयोग नील-हरित शैवाल के संरोपण (Inoculation) के तुरंत पहले या बाद में किया जाए. इसके अतिरिक्त, नील-हरित शैवाल की समुचित वृद्धि के लिए खेत में निरंतर जलभराव तथा पर्याप्त सूर्यप्रकाश का उपलब्ध होना आवश्यक है. चूँकि नील-हरित शैवाल का प्रभाव धीरे-धीरे विकसित होता है, इसलिए इसके लाभ रासायनिक उर्वरकों की भाँति तुरंत दिखाई नहीं देते, बल्कि लगातार कई फसल मौसमों तक इसके नियमित उपयोग के बाद अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं.

आगे की दिशा  

नील-हरित शैवाल तकनीक को अपनाना केवल खेती की एक नई पद्धति अपनाना नहीं है, बल्कि यह मृदा स्वास्थ्य के पुनर्स्थापन तथा सतत् कृषि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. धान की खेती में नील-हरित शैवाल को समेकित करने से किसान रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर नाइट्रोजन उर्वरकों, के उपयोग में उल्लेखनीय कमी ला सकते हैं, उत्पादन लागत घटा सकते हैं, मृदा की उर्वरता में सुधार कर सकते हैं तथा फसल उत्पादकता बढ़ा सकते हैं. समय के साथ इसका नियमित उपयोग मृदा की प्राकृतिक जैविक प्रणाली को पुनर्जीवित करने में सहायक होता है, जिससे दीर्घकालीन उत्पादकता, पोषक तत्त्वों की स्थिर उपलब्धता तथा पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित होता है. इसलिए, नील-हरित शैवाल को अपनाना आत्मनिर्भर, पर्यावरण-अनुकूल एवं आर्थिक रूप से लाभकारी धान उत्पादन प्रणाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं दूरदर्शी कदम है.

लेखकगण: रेश्मा शिंदे, अनुप दास, संतोष एस. माली एवं अवनि कुमार सिंह
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना

English Summary: blue green algae in paddy cultivation an effective biofertilizer
Published on: 29 June 2026, 12:31 PM IST

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