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Updated on: 15 June, 2026 10:32 PM IST

फसल उत्पादकता में वृद्धि, उर्वरकों की मात्रा एवं लागत में कमी तथा मृदा स्वास्थ्य के संरक्षण के लिए कुशल पोषक तत्व प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है. कृषि यंत्रीकरण उर्वरकों के सही स्रोत, सही मात्रा, सही समय तथा सही स्थान पर उनके प्रयोग को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे पोषक तत्वों के उपयोग दक्षता में वृद्धि होती है तथा पोषक तत्वों की हानि न्यूनतम होती है.

फसल अवशेष कोई बेकार की वस्तु नहीं हैं, बल्कि वे पौधों के पोषक तत्वों एवं कार्बनिक पदार्थों से भरपूर एक मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन है. फसल अवशेष पौधों के पोषक तत्वों का एक महत्वपूर्ण भंडार हैं, जिनमें अनाज वाली फसलों द्वारा अवशोषित लगभग 25% नाइट्रोजन (N) एवं फॉस्फोरस (P), 50% सल्फर (S) तथा 75% पोटाश (K) संरक्षित रहता है. उदाहरण के लिए, धान के पुआल में लगभग 39 किग्रा/हेक्टेयर नाइट्रोजन (N), 6 किग्रा/हेक्टेयर फॉस्फोरस (P), 140 किग्रा/हेक्टेयर पोटाश (K) तथा 11 किग्रा/हेक्टेयर सल्फर (S) पाया जाता है. कोई भी मशीन या तकनीक जो फसल अवशेषों के प्रभावी उपयोग को बढ़ावा देती है, चाहे वह इन-सीटू (खेत के भीतर) हो अथवा एक्स-सीटू (खेत के बाहर), पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में योगदान देती है, मृदा कार्बनिक कार्बन में वृद्धि करती है तथा मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है.

पोषक तत्व प्रबंधन हेतु प्रमुख उपकरण एवं कृषि यंत्रीकरण तकनीकें

  1. पत्ती रंग चार्ट (Leaf Colour Chart - LCC): धान उत्पादन में नाइट्रोजन (N) उर्वरक का महत्वपूर्ण योगदान होता है. पत्ती रंग चार्ट (LCC) का उपयोग धान की फसल में नाइट्रोजन उर्वरक की आवश्यकता का निर्धारण करने के लिए किया जाता है. LCC में हरे रंग की चार पट्टियाँ होती हैं, जिनका रंग पीला-हरा (Yellow Green) से गहरा हरा (Dark Green) तक होता है. यह धान की पत्तियों की हरितिमा (Greenness) को मापता है, जो उनमें विद्यमान नाइट्रोजन की स्थिति का संकेतक होती है . LCC के आधार पर आवश्यकता अनुसार नाइट्रोजन उर्वरक का प्रयोग किया जाता है, जिससे उर्वरक की बचत होती है, उत्पादन लागत कम होती है तथा नाइट्रोजन उपयोग दक्षता में वृद्धि होती है.

चित्र 1. पत्ती रंग चार्ट (स्रोत:आईआरआरआई)

पत्ती रंग चार्ट (LCC) का प्रयोग कैसे करें?

पत्ती रंग चार्ट (LCC) का उपयोग करने के लिए समान पौध संख्या वाले खेत से कम-से-कम 10 रोगमुक्त धान के पौधों अथवा गुच्छों का बेतरतीब ढंग से (रैंडमली) चयन करें. प्रत्येक पौधे या गुच्छे से सबसे ऊपर की, सबसे नई एवं पूर्णतः विकसित पत्ती का चयन करें, क्योंकि यह पौधे की नाइट्रोजन (N) स्थिति को सबसे अच्छी तरह दर्शाती है. पत्ती को तोड़े बिना उसके मध्य भाग को LCC पर रखकर रंग पट्टियों से तुलना करें. पत्ती के रंग का अवलोकन अपने शरीर की छाया में करें, क्योंकि सीधी धूप रीडिंग को प्रभावित कर सकती है. यदि संभव हो, तो प्रत्येक बार एक ही व्यक्ति द्वारा तथा दिन के लगभग एक ही समय पर रीडिंग ली जानी चाहिए. यदि पत्ती का रंग LCC की दो रंग पट्टियों के बीच दिखाई दे, तो दोनों मानों का औसत रीडिंग माना जाए. उदाहरण के लिए, यदि रंग 3 और 4 के बीच हो, तो रीडिंग 3.5 मानी जाएगी.

10 पत्तियों की रीडिंग लेकर उनका औसत निकालें. यदि औसत रंग मान 3 से कम या अधिक आवश्यकता सीमा पर हो, तो नाइट्रोजन उर्वरक की टॉप ड्रेसिंग (ऊपरी छिड़काव) की आवश्यकता होती है. रोपाई के लगभग 14 दिन बाद, कल्ले निकलने (Tillering) की अवस्था से प्रत्येक 7–10 दिन के अंतराल पर LCC का उपयोग करें. यह प्रक्रिया बाली निकलने की शुरुआत (Panicle Initiation) के 5–10 दिन बाद तक जारी रखें.

2. SPAD मीटर: SPAD मीटर (Soil Plant Analysis Development Meter) हाथ में पकड़कर उपयोग किया जाने वाला इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है, जिसका उपयोग पौधों की पत्तियों में क्लोरोफिल की मात्रा मापने के लिए किया जाता है. पौधों की पत्तियों में क्लोरोफिल की मात्रा नाइट्रोजन की उपलब्धता का एक महत्वपूर्ण संकेतक होती है. SPAD मीटर के माध्यम से पत्तियों की हरितिमा का त्वरित एवं बिना क्षति पहुँचाए आकलन किया जा सकता है, जिससे यह पता चलता है कि फसल को अतिरिक्त नाइट्रोजन उर्वरक की आवश्यकता है या नहीं.

यह कैसे कार्य करता है?

SPAD मीटर को पत्ती पर क्लिप की तरह लगाया जाता है. यह पत्ती से होकर गुजरने वाले प्रकाश की मात्रा को मापता है और तुरंत एक SPAD मान प्रदर्शित करता है. यह मान पत्ती में क्लोरोफिल की मात्रा तथा फसल की नाइट्रोजन स्थिति का संकेत देता है.

SPAD मीटर के लाभ:

  • SPAD मीटर किसानों को यह निर्धारित करने में सहायता करता है कि नाइट्रोजन उर्वरक कब और कितनी मात्रा में आवश्यक है, जिससे उर्वरक के कम या अधिक प्रयोग से बचा जा सकता है.

  • नाइट्रोजन उर्वरक का प्रयोग तभी किया जाता है जब SPAD रीडिंग अनुशंसित सीमा से नीचे चली जाती है. इससे अनावश्यक उर्वरक उपयोग में 15–30% तक की कमी लाई जा सकती है.

  • फसल में डाले गए नाइट्रोजन उर्वरक का अधिक कुशलतापूर्वक उपयोग किया जाता है, जिससे नाइट्रोजन की हानि कम होती है.

3. मल्चर : मल्चर एक कृषि यंत्र है जो धान के पुआल, गेहूँ के ठूंठ, मक्का के डंठलों तथा अन्य फसल अवशेषों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर खेत की सतह पर समान रूप से फैला देता है.

मल्चर उर्वरक की बचत कैसे करता है?

  • फसल अवशेषों में नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P), पोटाश (K) तथा सल्फर (S) जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व मौजूद होते हैं. जब इन अवशेषों को मल्चर द्वारा काटकर खेत में छोड़ दिया जाता है, तो वे धीरे-धीरे विघटित होकर इन पोषक तत्वों को पुनः मृदा में उपलब्ध कराते हैं, जिससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है.

  • फसल अवशेषों को जलाने से कार्बनिक पदार्थ नष्ट हो जाते हैं तथा विशेष रूप से नाइट्रोजन एवं सल्फर जैसे पोषक तत्वों की हानि होती है. मल्चिंग इन पोषक तत्वों को कृषि प्रणाली में सुरक्षित रखती है.

  • मल्च के सड़ने-गलने से मृदा में जैविक कार्बन एवं कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है, जिससे मृदा की उर्वरता तथा पोषक तत्व धारण क्षमता में वृद्धि होती है.

  • मल्च मिट्टी की सतह से जल के वाष्पीकरण को कम करता है, जिससे मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है. इससे पौधों द्वारा पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग होता है और उर्वरकों की प्रभावशीलता बढ़ती है.

  • मल्च की परत मृदा को जल एवं वायु अपरदन से बचाती है, जिससे उपजाऊ ऊपरी मिट्टी एवं उसमें मौजूद पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं.

  • फसल अवशेष मिट्टी में रहने वाले लाभकारी सूक्ष्मजीवों के विकास को प्रोत्साहित करते हैं. ये सूक्ष्मजीव पोषक तत्वों को मुक्त कर उन्हें पुनः फसलों के लिए उपलब्ध कराते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि होती है.

4. शून्य जुताई सीड-कम-फर्टिलाइजर ड्रिल

शून्य जुताई सीड-कम-फर्टिलाइजर ड्रिल एक ऐसी मशीन है जो बिना जुताई किए बीज एवं उर्वरक की बुवाई करती है. पारंपरिक छिड़काव विधि में उर्वरक मिट्टी की सतह पर खुला पड़ा रहता है, जिससे नाइट्रोजन का वाष्पीकरण एवं बहाव के कारण नुकसान होता है. इस मशीन की इनवर्टेड-‘T’ टाइन मिट्टी में संकरी नालियाँ बनाती हैं, जिनमें बीज एवं उर्वरक एक साथ उचित गहराई पर डाले जाते हैं.

उर्वरक की बचत कैसे होती है?

  • उर्वरकों को बीज के नीचे अथवा उसके समीप रखने से पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है, जिससे जड़ों द्वारा उनका बेहतर उपयोग होता है और उर्वरकों की हानि कम होती है.

  • जीरो टिल ड्रिल फॉस्फोरस को जड़ क्षेत्र के निकट उचित स्थान पर रखती है, जबकि पारंपरिक छिड़काव विधि में यह मिट्टी की ऊपरी सतह तक ही सीमित रहता है. परिणामस्वरूप फसल द्वारा फॉस्फोरस का अधिक कुशल उपयोग संभव हो पाता है.

  • जीरो टिलेज के अंतर्गत फसल अवशेषों को खेत में सुरक्षित रखा जाता है. इन अवशेषों के धीरे-धीरे विघटित होने से पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण होता है, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है तथा मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर होता है.

  • जीरो टिलेज में मिट्टी की जुताई नहीं की जाती, जिससे मिट्टी में उपलब्ध नमी लंबे समय तक सुरक्षित रहती है. यह नमी फसल की प्रारंभिक वृद्धि एवं पोषक तत्वों के बेहतर अवशोषण में सहायक होती है.

5. लिक्विड फर्टिलाइजर एप्लीकेटर (तरल उर्वरक एप्लीकेटर): लिक्विड फर्टिलाइजर एप्लीकेटर एक यंत्रीकृत उपकरण है, जिसे ट्रैक्टर के साथ जोड़कर खेत में तरल उर्वरकों के नियंत्रित एवं सटीक अनुप्रयोग के लिए उपयोग किया जाता है. इसमें टैंक, पंप, नियंत्रण प्रणाली, पाइप तथा नोजल/इंजेक्टर लगे होते हैं, जो तरल उर्वरकों को निर्धारित मात्रा में फसलों तक पहुँचाकर पोषक तत्वों के कुशल उपयोग को सुनिश्चित करते हैं.

इस यंत्र में तरल उर्वरक को एक टैंक में रखा जाता है, जहाँ से ट्रैक्टर के पीटीओ द्वारा संचालित पंप उसे पाइपों के माध्यम से मिट्टी में पहुँचाता है. उर्वरक को मिट्टी की सतह के नीचे 3–4 इंच की गहराई पर नियंत्रित मात्रा में डाला जाता है. आवश्यकता अनुसार उर्वरक की दर को बदला जा सकता है. मिट्टी के भीतर सटीक स्थान पर उर्वरक देने से पोषक तत्वों की हानि कम होती है तथा उर्वरक उपयोग दक्षता में 20–40% तक सुधार होता है.

6. सुपर सीडर: सुपर सीडर एक बहुउद्देशीय ट्रैक्टर चालित कृषि यंत्र है, जो फसल अवशेष प्रबंधन, भूमि की तैयारी तथा बीज एवं उर्वरक की बुवाई को एक ही संचालन में पूरा करता है. यह धान के अवशेषों को काटकर मिट्टी में मिलाता है, उपयुक्त बीज क्यारी तैयार करता है तथा बीज और उर्वरक को निर्धारित गहराई पर स्थापित करता है. इसके साथ ही कुछ फसल अवशेष मिट्टी की सतह पर मल्च के रूप में बने रहते हैं, जो मिट्टी की नमी एवं उर्वरता बनाए रखने में सहायक होते हैं.

सुपर सीडर से बीज और उर्वरक सही स्थान पर डाले जाते हैं, मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, पोषक तत्वों की बर्बादी कम होती है, मिट्टी में नमी बनी रहती है और फसल की जड़ें अधिक अच्छी तरह विकसित होती हैं.

7. स्ट्रॉ बेलर: स्ट्रॉ बेलर एक कृषि यंत्र है, जिसका उपयोग धान के पुआल, गेहूँ के भूसे तथा अन्य फसल अवशेषों को एकत्रित कर उन्हें दबाकर सघन गट्ठरों (Bales) के रूप में तैयार करने के लिए किया जाता है. इससे फसल अवशेषों का संग्रहण, परिवहन, भंडारण एवं विभिन्न उपयोगों के लिए प्रबंधन आसान हो जाता है. फसल की कटाई के बाद खेत में बिखरे हुए अवशेषों को स्ट्रॉ बेलर द्वारा एकत्र किया जाता है. यह मशीन पुआल या भूसे को दबाकर सघन गोलाकार (Round) अथवा आयताकार (Rectangular) गट्ठरों में परिवर्तित करती है. इसके बाद गट्ठरों को बाँधकर भंडारण, परिवहन या अन्य उपयोगों के लिए खेत से बाहर निकाल दिया जाता है.

स्ट्रॉ बेलर फसल अवशेषों के संग्रहण को संभव बनाता है, जिन्हें अन्यथा खेतों में जला दिया जाता. इससे पौधों के लिए आवश्यक मूल्यवान पोषक तत्वों की हानि को रोका जा सकता है. फसल अवशेषों में नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P), पोटाश (K), सल्फर (S) तथा अन्य पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते हैं. इन अवशेषों का संग्रहण एवं उचित उपयोग करके इन पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण कृषि प्रणाली में किया जा सकता है.

इसके अतिरिक्त, गट्ठरों के रूप में संचित पुआल का उपयोग कम्पोस्ट निर्माण, वर्मी-कम्पोस्ट उत्पादन, मशरूम उत्पादन, बायोचार निर्माण तथा पशु चारे के रूप में किया जा सकता है. इस प्रकार स्ट्रॉ बेलर पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण को बढ़ावा देता है, रसायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करता है तथा उर्वरकों की बचत में महत्वपूर्ण योगदान देता है.

8. स्टेशनरी श्रेडर: स्टेशनरी श्रेडर एक ऐसी मशीन है जो एक निश्चित स्थान पर लगाई जाती है. इसमें फसल अवशेष, खरपतवार, सूखी पत्तियाँ तथा अन्य जैविक कचरे को लाकर डाला जाता है, जहाँ उन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में काट दिया जाता है. यह मशीन बिजली या डीज़ल इंजन से चलती है.

फसल अवशेषों, बागवानी अपशिष्टों एवं अन्य जैविक पदार्थों को मशीन में डालने पर इसके घूमने वाले ब्लेड या हैमर उन्हें बारीक टुकड़ों में काट देते हैं. तैयार सामग्री का उपयोग कम्पोस्ट, वर्मी-कम्पोस्ट, मल्च, बायोगैस एवं पशु चारे के रूप में किया जा सकता है. आवश्यकता होने पर इसे सीधे खेत में फैलाकर भी पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण को बढ़ावा दिया जा सकता है. धान, गेहूँ, मक्का, गन्ना, केला, नारियल, खरपतवार एवं अन्य जैविक अवशेष इस मशीन द्वारा आसानी से संसाधित किए जा सकते हैं.

यह उर्वरक की बचत कैसे करता है?

छोटे-छोटे टुकड़ों में काटे गए फसल अवशेष अपेक्षाकृत तेजी से विघटित होते हैं तथा उन्हें कम्पोस्ट में परिवर्तित किया जा सकता है, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है. फसल अवशेषों में निहित मूल्यवान पोषक तत्व कम्पोस्ट या मल्च के माध्यम से पुनः मिट्टी में लौट आते हैं, जबकि अवशेषों को जलाने पर ये पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं. श्रेड की गई जैविक सामग्री वर्मी-कम्पोस्ट उत्पादन के लिए एक उत्कृष्ट कच्चा माल है, जिससे पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद तैयार होती है.

उदाहरण के लिए, अरहर (Pigeon Pea) के डंठलों को श्रेड करके उसी खेत में मिलाया जा सकता है जहाँ फसल उगाई गई थी. यह श्रेड की गई जैविक सामग्री समय के साथ विघटित होकर मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ाती है तथा मूल्यवान पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण करती है. इससे मिट्टी की संरचना में सुधार होता है, लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ती है, मिट्टी में कार्बनिक कार्बन की मात्रा बढ़ती है तथा मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर होता है. परिणामस्वरूप रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है और उर्वरक उपयोग दक्षता में वृद्धि होती है.

लेखकगण: प्रेम कुमार सुन्दरम, बिकास सरकार एवं अनुप दास
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना

English Summary: Agricultural Mechanization for Efficient Nutrient Management and Fertilizer Savings
Published on: 15 June 2026, 10:46 PM IST

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