फसल अवशेष वे बचे हुए पदार्थ हैं, जैसे डंठल, पुआल तथा पत्तियाँ, जो धान, गेहूँ, मक्का आदि फसलों की कटाई के बाद खेत में रह जाते हैं. इन फसल अवशेषों को "प्रकृति का स्वर्ण" माना जाता है, क्योंकि ये प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं तथा मृदा संवर्धन के लिए बहु-पोषक तत्वों (स्थूल एवं सूक्ष्म) और कार्बनिक पदार्थों के महत्वपूर्ण स्रोत हैं. दुर्भाग्यवश, इस मूल्यवान धरोहर की अधिकांश किसानों द्वारा पूरी तरह उपेक्षा की जाती है. कृषि में इसके प्रभावी पुनर्चक्रण के बजाय, प्रतिवर्ष लाखों टन फसल अवशेषों को जला दिया जाता है. इस "स्वर्ण" को जलाने से पोषक तत्वों की हानि होती है, मृदा में उपस्थित लाभकारी सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) जैसी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है.
फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उनका स्मार्ट प्रबंधन अपनाकर किसान उर्वरकों पर होने वाले खर्च को कम कर सकते हैं तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए मृदा स्वास्थ्य की रक्षा कर सकते हैं. अतः भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद एवं कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा प्रारम्भ किए गए खेत बचाओ अभियान 2026 के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु फसल अवशेषों का कुशल प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है.
भारत में प्रतिवर्ष औसतन लगभग 500 मिलियन टन (एमटी) फसल अवशेष उत्पन्न होते हैं. फसल अवशेषों का सर्वाधिक उत्पादन उत्तर प्रदेश (60 एमटी) में होता है, इसके बाद पंजाब (51 एमटी) तथा महाराष्ट्र (46 एमटी) का स्थान आता है (तालिका 1).
तालिका 1. भारत में विभिन्न फसलों द्वारा उत्पन्न फसल अवशेषों की मात्रा
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फसल |
वार्षिक उत्पन्न फसल अवशेष (मिलियन टन) |
कुल फसल अवशेष में भागीदारी (%) |
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धान |
170 |
34 |
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गेहूँ |
110 |
22 |
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अन्य अनाज (मक्का, बाजरा आदि) |
72 |
14 |
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रेशा फसलें (कपास, जूट) |
66 |
13 |
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तिलहनी एवं दलहनी फसलें |
42 |
8 |
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गन्ना (ऊपरी भाग एवं पत्तियाँ) |
12 |
2 |
फसल अवशेष प्रबंधन के लाभ
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फसल अवशेषों में आवश्यक पोषक तत्व होते हैं, जो मृदा की उर्वरता तथा पोषक तत्वों के भंडार को बढ़ाते हैं.
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फसल अवशेषों के पुनर्चक्रण से फसलों द्वारा अवशोषित पोषक तत्व पुनः मृदा में लौट आते हैं.
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अवशेषों की परत मृदा सतह को हवा तथा पानी से होने वाले कटाव से बचाती है.
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उचित अवशेष प्रबंधन से वायु प्रदूषण, ग्रीनहाउस गैसों (GHGs) के उत्सर्जन तथा पोषक तत्वों की हानि में कमी आती है.
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अवशेषों को खेत में बनाए रखने से मृदा स्वास्थ्य सुधरता है तथा मृदा नमी का संरक्षण होता है.
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फसल अवशेषों का उपयोग पशु चारे, कम्पोस्ट, जैव-ऊर्जा के कच्चे माल तथा औद्योगिक कच्चे माल के रूप में किया जा सकता है, जिससे आर्थिक मूल्य बढ़ता है तथा उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है.
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यह दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता एवं कृषि स्थिरता (सस्टेनेबिलिटी) को समर्थन प्रदान करता है.
अपने बहुआयामी महत्व के बावजूद, किसान फसल कटाई के बाद फसल अवशेषों को शीघ्रता से हटाने के आसान उपाय के रूप में जला देते हैं, विशेषकर खेत की अगली तैयारियों को सरल बनाने तथा गेहूँ जैसी अगली फसल की समय पर बुवाई सुनिश्चित करने के लिए. अवशेषों को जलाने की यह प्रथा मृदा स्वास्थ्य, पर्यावरणीय गुणवत्ता तथा कृषि की स्थिरता पर अनेक प्रतिकूल प्रभाव डालती है. फसल अवशेष जलाने से उत्पन्न ऊष्मा मृदा की सतही परत के तापमान को बढ़ा देती है, जो अक्सर ऐसे स्तर तक पहुँच जाता है जो मृदा में रहने वाले जीवों के लिए हानिकारक होता है. इसमें जीवाणु (बैक्टीरिया), कवक (फफूंद), एक्टिनोमाइसीट्स, शैवाल तथा केंचुए शामिल हैं, जो मृदा कार्बनिक पदार्थों के अपघटन, पोषक तत्वों के चक्रण, मृदा कणों के समुच्चयन तथा मृदा उर्वरता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. फसल अवशेषों को जलाने से पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की भी हानि होती है. अवशेषों में उपस्थित नाइट्रोजन, सल्फर तथा कार्बन जैसे तत्व दहन के दौरान वाष्पित होकर वायुमंडल में चले जाते हैं.
इससे न केवल मृदा की पोषक तत्व उपलब्ध कराने की क्षमता कम होती है, बल्कि आगामी फसलों के लिए रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी बढ़ जाती है.इसके अतिरिक्त, मृदा कार्बनिक पदार्थों के नष्ट होने से मृदा की संरचना, जल धारण क्षमता, वायुसंचार तथा समग्र मृदा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. फसल अवशेष जलाना ग्रीनहाउस गैसों (GHGs) के प्रमुख स्रोतों में से एक है. इस प्रक्रिया के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मीथेन (CH₄), नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) तथा विभिन्न वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (Volatile Organic Compounds) वायुमंडल में उत्सर्जित होते हैं.
तालिका 2. फसल अवशेषों में औसत पोषक तत्व की मात्रा तथा उनके जलाने से होने वाली पोषक तत्वों की हानि
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फसल |
पोषक तत्व की मात्रा (%) |
पोषक तत्वों की हानि (कि.ग्रा./टन अवशेष) |
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नाइट्रोजन (N) |
फॉस्फोरस (P) |
पोटाश (K) |
नाइट्रोजन (N) |
फॉस्फोरस (P) |
पोटाश (K) |
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धान |
0.61 |
0.18 |
1.38 |
6.1 |
1.8 |
13.8 |
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गेहूँ |
0.48 |
0.16 |
1.18 |
4.8 |
1.6 |
11.8 |
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मक्का |
0.52 |
0.18 |
1.35 |
5.2 |
1.8 |
13.5 |
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बाजरा |
0.45 |
0.16 |
1.14 |
4.5 |
1.6 |
11.4 |
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दलहनी फसलें |
1.29 |
0.36 |
1.64 |
12.9 |
3.6 |
16.4 |
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तिलहनी फसलें |
0.80 |
0.21 |
0.93 |
8.0 |
2.1 |
9.3 |
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गन्ना |
0.40 |
0.18 |
1.28 |
4.0 |
1.8 |
12.8 |
खेत पर फसल अवशेषों का प्रबंधन (On-Farm Management of Crop Residues)
❖ फसल अवशेष संरक्षण (Residue Retention): यह एक ऐसी प्रबंधन पद्धति है जिसमें फसल कटाई के बाद अवशेषों को खेत की मिट्टी की सतह पर ही छोड़ दिया जाता है. इससे मृदा स्वास्थ्य में सुधार होता है, मिट्टी में नमी का संरक्षण होता है, मृदा अपरदन (कटाव) कम होता है, पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण बढ़ता है तथा टिकाऊ कृषि उत्पादन को बढ़ावा मिलता है.
❖ फसल अवशेष समावेशन (Residue Incorporation): इस पद्धति में खेत में बचे हुए फसल अवशेषों, विशेषकर भूसे एवं पुआल, को जुताई के दौरान मिट्टी में मिला दिया जाता है. खेत में शेष बचे अवशेषों के उपयोग के लिए यह सबसे सामान्य और प्रभावी विकल्पों में से एक है. इससे अवशेष धीरे-धीरे विघटित होकर मृदा में जैविक पदार्थ तथा पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाते हैं, जिससे मृदा की उर्वरता और उत्पादकता में सुधार होता है.
खेत के बाहर फसल अवशेषों का प्रबंधन (Off-Farm Management of Crop Residues)
❖ वर्मी कम्पोस्ट/कम्पोस्ट उत्पादन (Vermicompost/Compost Production):फसल अवशेषों का उपयोग कम्पोस्टिंग अथवा वर्मी कम्पोस्टिंग के माध्यम से उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद बनाने में किया जा सकता है. यह खाद मृदा की उर्वरता, संरचना तथा जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ाने में सहायक होती है.
❖ बायोगैस उत्पादन (Biogas Production):फसल अवशेषों को बायोगैस उत्पादन हेतु उपयोग में लाया जा सकता है. इससे स्वच्छ, नवीकरणीय एवं पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा प्राप्त होती है तथा जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम होती है.
❖ मशरूम उत्पादन (Mushroom Production):धान के पुआल एवं अन्य फसल अवशेषों का उपयोग मशरूम उत्पादन के लिए सब्सट्रेट (आधार सामग्री) के रूप में किया जा सकता है. इससे कृषि अपशिष्ट का मूल्य संवर्धन होता है तथा पौष्टिक खाद्य पदार्थ का उत्पादन संभव होता है.
❖ पशु चारा एवं पशुशाला की फर्श सामग्री (Animal Fodder and Bedding Materials):फसल अवशेष पशुओं के लिए कम लागत वाले चारे तथा बिछावन सामग्री के रूप में उपयोग किए जा सकते हैं. उपयोग के पश्चात यह सामग्री गोबर के साथ मिलकर उत्तम गुणवत्ता की फार्मयार्ड खाद (एफ.वाई.एम.) में परिवर्तित हो जाती है, जिससे पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण सुनिश्चित होता है.
फसल अवशेष प्रबंधन की व्यावहारिक विधियाँ
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हैप्पी सीडर तकनीक (Happy Seeder Technology): यह तकनीक खरीफ धान की कटाई के बाद खेत में खड़े धान के ठूंठों के बीच बिना जुताई किए सीधे गेहूँ की बुवाई करने की सुविधा प्रदान करती है. खेत में मौजूद पुआल प्राकृतिक मल्च का कार्य करता है, जिससे नमी संरक्षण, खरपतवार नियंत्रण तथा मृदा स्वास्थ्य में सुधार होता है.
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जुताई द्वारा मिट्टी में मिलाना (Incorporation): रोटावेटर, रिवर्स मोल्ड बोर्ड प्लाउ अथवा अन्य उपयुक्त कृषि यंत्रों की सहायता से फसल अवशेषों को काटकर मिट्टी में मिला दिया जाता है. इसके बाद सिंचाई करने पर अवशेष प्राकृतिक रूप से विघटित होकर मिट्टी में जैविक पदार्थ एवं पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाते हैं.
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अपघटक (डीकम्पोजर) का छिड़काव (Spraying Decomposer): फसल अवशेषों पर सूक्ष्मजीव आधारित घोल, जैसे पूसा डीकम्पोजर, का छिड़काव किया जाता है. इससे अवशेषों के विघटन की प्रक्रिया तेज हो जाती है और लगभग एक माह के भीतर वे पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद में परिवर्तित हो जाते हैं.
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मल्चिंग (Mulching): फसल अवशेषों को मिट्टी की सतह पर बिछाकर छोड़ दिया जाता है. इससे मिट्टी में नमी का संरक्षण होता है, खरपतवारों की वृद्धि नियंत्रित होती है, मृदा अपरदन कम होता है तथा मिट्टी के तापमान का संतुलन बना रहता है.
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बेलिंग (Baling): स्ट्रॉ बेलर (Straw Baler) की सहायता से ढीले फसल अवशेषों को दबाकर गठ्ठरों (बेल) के रूप में तैयार किया जाता है. इन गठ्ठरों को पशु चारे, औद्योगिक उपयोग अथवा अन्य कृषि कार्यों के लिए बेचा जा सकता है, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है.
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कम्पोस्टिंग (Composting): फसल अवशेषों को एकत्र कर गोबर एवं पानी के साथ कम्पोस्ट गड्ढे में डालकर सड़ाया जाता है. इससे उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद तैयार होती है, जो मृदा की उर्वरता बढ़ाने तथा फसल उत्पादन में सुधार करने में सहायक होती है.
फसल अवशेष मृदा में कार्बन भंडार बढ़ाने, मृदा स्वास्थ्य को बनाए रखने तथा कृषि उत्पादकता को स्थायी रूप से बढ़ाने के लिए एक बहुमूल्य संसाधन हैं. फसल अवशेषों का संरक्षण, मिट्टी में समावेशन, कम्पोस्टिंग, मल्चिंग, बायोऊर्जा उत्पादन तथा अन्य मूल्यवर्धित उपयोगों के माध्यम से प्रभावी प्रबंधन करके इन्हें वास्तविक अर्थों में "अपशिष्ट से संपदा (Waste to Wealth)" में परिवर्तित किया जा सकता है. इससे न केवल मृदा की उर्वरता एवं पर्यावरणीय गुणवत्ता में सुधार होता है, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने और टिकाऊ कृषि विकास को भी बढ़ावा मिलता है.
लेखकगण : डॉ. राकेश कुमार एवं डॉ. अनुप दास
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना