इस बार फसल होगी अच्छी, मानसून नहीं होगा प्रभावित...

भारतीय कृषि और उससे जुड़े व्यक्तियों के लिए इस बार राहत की खबर यह कि इस बार आने वाले मानसून पर अल नीनो का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. वरिष्ठ मौसम अधिकारी ने बताया कि इस बार मानसून ख़त्म होने के 4 महीने बाद अल नीनों सक्रीय होगा. इस प्रकार मानसून प्रभावित होने का कोई डर नहीं है.

इससे पहले ला नीना कमजोर रहने के चलते अनुमान जताया जा रहा था कि अल नीनो पहले ही सक्रिय हो सकता है। निजी अमेरिकी संस्था रेडिएंट सॉल्यूशंस ने अनुमान जताया था कि इस बार अल नीनो की वजह से मानसून कमजोर रह सकता है, जिससे भारत में सोयाबीन, मूंगफली और कपास की फसलें प्रभावित हो सकती हैं। पिछले साल भी मानसून की बारिश औसत के मुताबिक रही थी। लंबी अवधि के औसत की तुलना में 95% बारिश हुई थी, जबकि मौसम विभाग का अनुमान 98% का था। 

मानसून सीजन के 4 महीनों में साल भर होने वाली बारिश की 70 फीसदी बारिश होती है। इन महीनों में होने वाली बारिश खेती का प्रमुख आधार है। बता दें कि भारत की 2 लाख करोड़ डॉलर की इकोनॉमी में खेती का योगदान 15 फीसदी है। वहीं, भारत में कुल 130 करोड़ लोगों में से खेती पर कुल दो-तिहाई आबादी निर्भर है। 

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आम चुनावों के पहले जब मोदी सरकार ने बजट में रूरल एरिया और एग्रीकल्चर पर खासतौर फोकस किया है, ऐसे में मानसून सीजन पर सरकार की भी नजर है। अगर मानसून बेहतर रहता है तो यश्रल एरिया में सरकार अपनी योजनाओं को सही से लागू कराने में भी सफल होगी। वहीं बेहतर मानसून से रूरल इकोनॉमी को बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। वहीं, खेती प्रभावित होती है तो इसका असर किसानों की आय पर पड़ेगा, जिससे सरकार पर भी दबाव बढ़ेगा। 
 

मिनिस्ट्री ऑफ अर्थ एंड साइंस के सीनियर साइंटिस्ट माधवन नैयर राजीवन का कहना है कि वैसे तो अभी मानसून के बारे में कुछ प्रेडिक्ट करना जल्दबाजी होगी। लेकिन इस बात के संकेत हैं कि ला नीना सीजन के अंंत में न्यूट्रल फेज में जा रही है। 

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क्‍या होता है अल नीनो?
अल-नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यीय क्षेत्र की उस समुद्री घटना का नाम है जो दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित इक्वाडोर और पेरू देश के तटीय समुद्री जल में कुछ सालों के अंतराल पर घटित होती है। इसके तहत समुद्र की सतह के तापमान में असामान्‍य तौर पर इजाफा हो जाता है। इसका पूरे विश्व के मौसम पर प्रभाव पड़ता है।  

ला-नीना से ठीक उलटा होता है अल नीनो
नीना अल-नीनो से ठीक उलटा प्रभाव रखती है। पश्चिमी प्रशांत महासागर में अल-नीनो द्वारा पैदा किए गए सूखे की स्थिति को ला-नीना बदल देती है। यह आर्द्र मौसम को जन्म देती है। ला-नीना के कारण पश्चिमी प्रशांत महासागर के उष्ण कटिबंधीय भाग में तापमान में वृद्धि होने से वाष्पीकरण ज्यादा होने पर इंडोनेशिया और समीपवर्ती भागों में सामान्य से अधिक बारिश होती है। ला-नीनो कई बार दुनियाभर में भयंकर बाढ़ का कारण भी बन जाता है।

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