गांव वालों के लिए बनी प्रेरणा ये शहरी बिटिया

 

कहते हैं कि छोटी सी चीज सबकुछ बदलकर रख देती हैं, और जब मन में ऊँची उड़ान भरने की चाहत हो तो पंख खुद ब खुद लग जाते हैं. यदि कोई इंसान अपनी अंतरात्मा और मन की शक्ति को पहचान कर यह जान लेता है कि उसको भविष्य में कैसे सफलता पानी है, तभी वह अपनी मंजिल पाने के लिए कड़ी मेहनत करने में लग जाता है. ऐसी ही कहानी है हरियाणा की कनिका आहूजा की.  

कनिका आहूजा एक ऐसे माहौल में पली हैं, जहाँ पर इस समाज के लिए कुछ करने का जज्बा रहा है. कनिका ने अपनी ग्रेजुएशन तक की पढाई पूरी करने के बाद उन्होंने श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से एमबीए किया. उसके बाद उन्होंने एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी की शुरुआत की. कनिका नौकरी तो कर रही थी लेकिन उनका मन कही और था. वो तो इस समाज के लिए कुछ करना चाहती थी. इस समाज के ऐसे तबके लिए कुछ अलग करना चाहती थी, हालाँकि समाज सेवा तो उनके खून में शामिल थी इसलिए वह समाज के लिए कुछ करना चाहती थी. जो उनके जहन में चल रहा था तो वो बिलकुल अलग था. वो सोच रही थी कि उनको ऐसा क्या करना चाहिए जिससे की समाज के लिए कुछ अच्छा कर सके.

उन्होंने इसी दौरान अपने माता-पिता द्वारा बनायीं गयी संस्था कंजर्व इंडिया के साथ काम करना शुरू किया. इसी दौरान हरियाणा के बहादुरगढ़ के स्लम एरिया में लगाए गए एक मेडिकल कैंप ने कनिका को कुछ अलग सोचने पर मजबूर कर दिया. हुआ यूँ कि मेडिकल कैंप में उनके एक दोस्त जो स्लम में रहने वाले बच्चों का इलाज कर रहे थे. उन्होंने कनिका को बताया कि लगभग 80 प्रतिशत बच्चे कुपोषण की वजह से बीमार हो रहे है. इसके बाद कनिका ने खुद बहादुरगढ़ के स्लम एरिया में जाकर देखा तो वहां पर सड़ी गली सब्जिया खाने को लोग मजबूर थे.

फसलों में अंधाधुंध होते कीटनाशकों के इस्तेमाल से मानव शरीर को काफी परेशानियों को झेलना पड़ रहा. जिससे कई तरह की घटक बीमारियाँ भी हो रहीं हैं. ऐसे में कनिका के जेहन में जो हलचल थी यहाँ पर उसका हल मिल चूका था. कनिका ने सोचा की क्यों न लोगो को कीटनाशक मुक्त सब्जियां उपलब्ध कराई जाए. बस अपने इसी उद्देश्य को पूरा करने की राह पर कनिका चल पड़ी. कनिका ने अपने सामाजिक संगठन कलेवर बड की शुरुआत की. इसी समय कनिका की मुलाकात एक इटैलियन कंपनी का सहयोग मिला  और कनिका ने अपने संगठन के जरिए स्मार्ट एग्रीकल्चर को बढ़ावा देना शुरू किया. इसके लिए उन्होंने करनाल के इंडो-इस्रायली सेंटर ऑफ एक्सेसिलेंसी से ट्रेंनिंग ली. इसके बाद दो सालों तक उन्होंने इस पर रिसर्च किया.

अपना  रिसर्च पूरा करने के बाद कनिका ने कृषि के बहादुरगढ़ में ही तीन फैक्ट्रीयों की छत पर अपने प्रोजेक्ट शुरू किए. इनकी सफलता के बाद उनका हौसला बुलंद हुआ. अब कनिका अपनी सामाजिक संस्था कलेवर बड के जरिए पालीहाउस में खेती करने की तकनीकों के विषय में जागरूकता भी फैला रही हैं. इस समय कनिका ने खुद तीन पालीहाउस लगाकर समाज में कृषि के प्रति एक नयी चेतना फैला रही हैं. उनके दो पालीहाउस बहादुरगढ़ में और एक मानेसर में हैं. इसके अलावा एक पालीहाउस मदन पुर खादर में हैं.

इसके जरिए वहां पर स्लम एरिया में रहने वाले लोगो को सब्जी प्राप्त हो जाती है. एक छोटे पालीहाउस  को लगाने में कम से कम 1 से अधिक का खर्च आता है. कनिका बताती है कि जहाँ एक और किसान खेती छोड़ रहें हैं. वहीँ दूसरी ओर शहरों में रहने वाले लोगो का रुझान इस और बढ़ता जा रहा है . उनका मानना है कि इससे हमें कीटनाशक मुक्त सब्जियां प्राप्त हो रही है. जिससे की शारीर में होने वाली घटक बिमारियों का खतरा बहुत कम होता जा रहा है. इससे हमारे लाइफस्टाइल में भी सुधार आ रहा है. कनिका आहूजा अपने काम के प्रति बहुत ही सजग हैं और अब वो कोटा, नॉएडा और भुवनेश्वर में भी पालीहाउस बनाने  की तैयारी कर रही है.

कनिका इसके अलावा किचन गार्डनिंग और टेरेस गार्डनिंग को भी बढ़ावा दे रही है. इसके लिए लोगो को जागरूक कर रही हैं. जहाँ ग्रामीण लोग एक और खेती से अपलायन कर आहें हैं वही दूसरी और शहर की यह बेटी आज के युवाओं के लिए एक  प्रेरणा बनी हुयी है, जो खेती को नए आयाम देकर एक नयी उड़ान भर रही है.

- इमरान खान 

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