वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई कि 160 वी पुणयतिथि पर शत-शत नमन

जीवनी:

रानी लक्षमीबाई उन चुनिंदा प्रथम स्वतंत्रता सेनानियों मे से एक है जिन्होने अंग्रेजी हुकुमत के खात्मे कि नीव रखी। उनका साहस अद्वतीय था। लक्षमीबाई का जन्म वाराणसी जिले भदैनी नामक नगर में हुआ था। उनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था। लेकिन प्यार से लोग उन्हे मनु बुलाते थे। उनकी मां का नाम भगीरथीबाई और पिता का नाम मोरोपंत तांबे था। मोरोपंत एक मराठी थे और मराठा बाजीराव कि सेवा में थे। माता भगीरथीबाई एक संसकृत कि ज्ञाता अतयंत बुद्धिमान महीला थी। उनकी मां कि मृत्यु के पश्चात घर में मनु कि देखभाल के लिए कोई नहीं था इसी कारण उनके पिता मोरोपंत अपनी पुत्री को पेशवा बाजीराव द्तीय के दरबार मे ले जाने लगे जहां बचपन से ही चंचल स्वाभान वाली मनु ने शास्त्र कि शिक्षा के साथ-साथ शस्त्र ज्ञान भी ग्रहण किया।

सन् 1842 में उनका विवाह झांसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव नेवालकर से हुआ और वह झांसी कि रानी बनी विवाह के बाद उनका नाम लक्षमीबाई रखा गया। सन् 1851 में रानी लक्षमीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया परंतु चार महीने कि उम्र में उसकी मृत्यु हो गई सन् 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थय बहुत अधिक बिगड़ जाने पर उन्हे दत्त्क पुत्र लेने कि सलाह दी पुत्र गोद लेने के बाद 21 नवमंबर 1853 को राजा गंगाधर राव कि मृत्यु हो गई दत्त्क पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया।

ब्रितानी राज ने अपनी राज्य हड़प नीती के तहत बालक दामोदर राव के बाद मुकदमा दाखिल किया हालांकि मुकदम्म्मे काफी बहस हुई परंतु इसे खारिज कर दिया गया अधिकारियों ने राज्य खज़ाना जब्त कर लिया और उनके पति के कर्ज को रानी के सालाना कर्ज में से काटने का फरमान जारी कर दिया इसके परिणाम स्वरुप रानी को झांसी का किला छोड़कर रानीमहल जाना पड़ा पर रानी ने हिम्मत नहीं हारी और हर हाल में झांसी राज्य कि रक्षा करने का निश्चय किया।

झांसी का युद्ध

झांसी 1857 के संग्राम का प्रमुख केंद्र बन गया जहां हिंसा भड़क उठी रानी लक्षमीबाई ने झांसी कि सुरक्षा को दुरुस्त करना आरंभ किया और एक स्वंयसेवक सेना का गठन करना प्रारंभ किया इस सेना में महीलाओं कि भर्ती कि गई और उन्हे युद्ध कला का प्रशिक्षण दिया गया साधारण जनता ने भी इस युद्ध में सहयोग दिया झलकारी बाई जो लक्षमीबाई कि हमशक्ल थी उसे अपनी सेना में प्रमुख स्थान दिया।

वीरगति:

1857 के सितंबर तथा अक्टूबर के महीनों में पड़ोसी राज्यो ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झांसी पर हमला कर दिया रानी ने सफलतापूर्वक इस आक्रमण को विफल कर दिया 1858 के जनवरी माह मे अंग्रेजी सेना ने झांसी कि और बढ़ना शुरु किया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया दो हफ्तो कि लड़ाई के बाद अंग्रेजी सेना ने कब्जा कर लिया परंतु रानी दामोदर राव के साथ बच निकलकर भागने में सफल रही रानी झांसी से भागकर कालपी पहुंची और तात्या टोपे से मिली।

तात्या टोपे और रानी कि संयुक्त सेनाओं ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिको के साथ मिलकर एक किले पर कब्जा कर लिया 18 जून 1858 में अंग्रेजी सेना से लड़ते-ल़ड़ते कहा जाता है कि रानी लक्षमीबाई अपने अंतिम युद्ध में अपने पुत्र गंगाधर राव को पास के गांव वालो को सौंपकर अंग्रेजी सेना से मोर्चा लिया और इस तरह के युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया कि सिर का एक भाग तलवार से कट जाने के बाद भी वह लड़ती रही और काफी अंग्रेज़ सैनिको को यमलोक पहुंचा दिया अंतत: इस युद्ध मे उनकी मृत्य हो गई लड़ाई कि रिपोर्ट में अंग्रेजी जनरल हूयरोज़ ने उल्लेख किया है कि रानी लक्षमीबाई अपनी सुंदरता,चालाकी और ढृढता के लिए तो उल्लेखनीय थी ही साथ ही विद्रोहियों नेताओं में सबसे अधिक खतरनाक भी थी।

 

भानु प्रताप
कृषि जागरण

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