काली तुलसी की खेती कर हो जाइए मालामाल...

तुलसी एक शाकीय तथा औषधीय पौधा है। इनमें ऑसीमम सैक्टम को प्रधान या पवित्र तुलसी माना गया जाता है,  इसकी भी दो प्रधान प्रजातियाँ हैं- श्री तुलसी जिसकी पत्तियाँ हरी होती हैं तथा कृष्णा तुलसी जिसकी पत्तियाँ निलाभ-कुछ बैंगनी रंग लिए होती हैं। इसके अतिरिक्त ऐलोपैथी, होमियोपैथी और यूनानी दवाओं में भी तुलसी का किसी न किसी रूप में प्रयोग किया जाता है।

तुलसी ऐसी औषधि है जो ज्यादातर बीमारियों में काम आती है। इसका उपयोग सर्दी-जुकाम, खॉसी, दंत रोग और श्वास सम्बंधी रोग के लिए बहुत ही फायदेमंद माना जाता है। तुलसी की पत्तियों में एक चमकीला पीला वाष्पशील तेल पाया जाता है जो कीड़े और बैक्टीरिया के खिलाफ उपयोगी होता है।

यह झाड़ी के रूप में उगता है और 1 से 3 फुट ऊँचा होता है। इसकी पत्तियाँ बैंगनी आभा वाली हल्के रोएँ से ढकी होती हैं। पत्तियाँ 1 से 2 इंच लम्बी सुगंधित और अंडाकार या आयताकार होती हैं। पुष्प मंजरी अति कोमल एवं 8 इंच लम्बी और बहुरंगी छटाओं वाली होती है, जिस पर बैंगनी और गुलाबी आभा वाले बहुत छोटे हृदयाकार पुष्प चक्रों में लगते हैं। बीज चपटे पीतवर्ण के छोटे काले चिह्नों से युक्त अंडाकार होते हैं।

नए पौधे मुख्य रूप से वर्षा ऋतु में उगते है और शीतकाल में फूलते हैं। पौधा सामान्य रूप से दो-तीन वर्षों तक हरा बना रहता है। इसके बाद इसकी वृद्धावस्था आ जाती है। पत्ते कम और छोटे हो जाते हैं और शाखाएँ सूखी दिखाई देती हैं। इस समय उसे हटाकर नया पौधा लगाने की आवश्यकता प्रतीत होती है।

प्रजातियाँ :

तुलसी की सामान्यतः निम्न प्रजातियाँ पाई जाती हैं:

ऑसीमम अमेरिकन (काली तुलसी) गम्भीरा या मामरी।

वैज्ञानिक नाम : ओसिमम केनम

सामान्य नाम : काली तुलसी

तुलसी पौधे का उपयोग:

तेल और पत्तियों का उपयोग भोजन को स्वादिष्ट बनाने, च्यूगंम, मिठाई, चाय, शीतल पेय, ऊर्जा पेय, दूध के उत्पाद, सौंदर्य प्रसाधन, साबुन, साबुन, शाँवर जेल, बाँडी लोशन और टूथपेस्ट में किया जाता है।

1- यह मलेरिया और डेंगू बुखार को रोकने के लिए एक निरोधक के रूप में काम करती है।

2- विशेष रूप से मधुमेह के इलाज के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।

3- ठडें बुखार वाले शरीर पर परजीवी संकमण, जोड़ो की सूजन और सरदर्द के इलाज के लिए इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

4- बुखार, पेचिश और दांत की समस्याओ के उपचार में इसे पारंपरिक औषधी की मान्यता प्राप्त हैं।

5- वातावरण सुगंधित करने में इसका उपयोग किया जाता है।

उत्पति और वितरण :

यह जड़ी-बूटी उष्ण कटिबंधीय अफ्रीका और दूसरे उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में सामान्यत: पाई जाती है। भारत में यह जम्मू कश्मीर, पंजाब, हिमालय प्रदेश, उत्तरांचल और दिल्ली में बहुतायत में पाई जाती है।

स्वरूप :

पौधा आधारीय शाखाओ, कोणीय तने और अण्डाकार रोमिल पत्तियों के साथ होता है।

यह पौधा अनियमित और झुंड में चक्राकार रूप से बढ़ता है।

इसके दलपुंज छोटे होते हैं।

पत्तियां :

पत्तियाँ एक दूसरे के सम्मुख और दांतेदार होती हैं।

पत्तियाँ छोटी और अस्पष्ट होती हैं।

फूल :

फूल बैंगनी और सफेद रंग के होते हैं।

फूलों से लौंग से मिलती–जुलती एक मीठी खुशबू आती है।

फूल अधिक सुस्पष्ट होते हैं।

फूल अगस्त माह से आना प्रारंभ होते हैं।

बीज :

बीज काले और दीर्धवृत्ताभ में होते हैं।

बीज गीले होने पर चिपचिपे हो जाते हैं।

परिपक्व ऊँचाई :

यह पौधा 2 फीट की ऊँचाई तक बढ़ता है।

जलवायु :

यह सूरज की रोशनी में बहुत अधिक पनपता है। तुलसी स्वाभाविक रूप से समुद्र तल से 2000 मीटर की ऊचाँई तक पाई जाती है। यह प्रारंभिक स्थिति में अच्छी तरह नहीं बढ़ती है और इसे धूप की आवश्यकता होती है।

भूमि :

इसे अच्छी तरह से सूखी मिट्टी की आवश्यकता होती है। पौधे को विशेष रूप से घर के अंदर गर्म मिट्टी में रखने पर तेजी से बढ़ता है। यह पौधा नम मिट्टी में स्वाभाविक रूप से बढ़ता है।

बुवाई का सही समय :

इसकी बुवाई वर्षा आधारित क्षेत्रों में बारिश के मौसम में और सिंचित क्षेत्रों अक्टूबर–नवंबर माह में की जाती है।

बुवाई-विधि

भूमि की तैयारी :

खेत को अच्छी तरह जोतकर और हेरो चलाकर क्यारियाँ बना ली जाती है। अच्छी तरह से मिश्रित FYM मिट्टी में मिलाना चाहिए।

फसल पद्धति विवरण :

तुलसी बीज आसानी से अंकुरित हो जाते हैं। चूंकि बीज छोटे होते हैं इसलिए इन्हे रेत और लकड़ी की राख के मिश्रण के साथ मिलाया जाता है। बीज अप्रैल–मई माह के महीनों के दौरान बोये जाते हैं। उन्हें समय–समय पर पानी दिया जाता है और अंकुरण एक से दो सप्ताह बाद होता है।

रोपाई:

सिंचित क्षेत्रों में 6 से 10 से.मी. लंबे अंकुरित पौधों को जुलाई या अक्टूबर–नवंबर माह में खेतों में लगाया जाता है। अंकुरित पौधों को कतार में 40 से.मी. की दूरी पर लगाया जाता है। रोपण के तुंरत बाद खेत की सिंचाई की जाती है।

पौधशाला प्रंबधन

नर्सरी बिछौना-तैयारी

क्यारियों को अच्छी तरह से तैयार किया जाता है। गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट का प्रयोग किया जाता है। बीज नर्सरी में बोये जाते हैं। एक हेक्टेयर भूमि के लिए लगभग 20-30 कि.ग्रा. बीजों की आवश्यकता होती है। बुवाई के बाद FYM और मिट्टी के मिश्रण की पतली परत को बीजों के ऊपर फैलाया जाता है। स्पिंक्लर द्वारा सिंचाई की जाती है। बीज अंकुरण के लिए 8-12 दिन का समय लेते है और लगभग 6 सप्ताह के बाद पौधे रोपण के लिए तैयार हो जाते हैं।

उत्पादन प्रौद्योगिकी खेती

खाद :

जैविक उर्वरक या तरल उर्वरक का प्रयोग किया जाता है। इसे कम उर्वरक की आवश्यकता होती है। बहुत ज्यादा उर्वरक से पौधा जल जाता है। कभी भी बहुत गर्म या ठंडे मौसम में उर्वरक नहीं डालना चाहिए। रोपण के समय आधारीय खुराक के रूप में मिट्टी में 40 कि.ग्रा./हे. P की मात्रा दी जाती है। पौधे के विकास के दौरान 40 कि.ग्रा./हे. N की मात्रा दो भागों में विभाजित करके दी जाती है।

सिंचाई प्रबंधन :

रोपण के बाद विशेष रूप से मानसून के अंत के बाद खेत की सिंचाई की जाती है। दूसरी सिंचाई के बाद पौधे अच्छी तरह जम जाते हैं। अंतराल को भरने और कमजोर पौधो को अलग करने का यह सही समय होता है ताकि खेत में एक समान पौधे रहें। गार्मियो में 3-4 बार सिंचाई की आवश्यकता होती है जबकि शेष अवधि के दौरान आवश्यकता के अनुसार सिंचाई की जाती है। लगभग 20-25 बार सिंचाई देना पर्याप्त होता है।

घसपात नियंत्रण प्रबंधन :

रोपण के पहले गहरी निराई की जाती है। खरपतवार की सभी जड़े हाथों से एकत्रित करके हटा दी जाती है। अच्छे प्रंबधन के अंतर्गत खेत को खरपतवार मुक्त रखने के लिए 4 या 5 बार निराई की आवश्यकता होती है। निराई को हाथ से या ट्रेक्टर चालित कल्टीवेटर द्वारा किया जा सकता है।

कटाई :

तुड़ाई अच्छी धूप वाले दिन में की जानी चाहिए। रोपण के 90-95 दिन बाद फसल प्रथम तुडाई के लिए तैयार हो जाती है। पत्ती उत्पादन के लिए फूलों के प्रारंभिक स्तर पर पत्तियों की तुड़ाई की जाती है। फसल को जमीनी स्तर से 15-20 से.मी़. ऊपर काटा जाता है । कटाई इस प्रकार की जाती है कि शाखाओ को काटने के बाद बचे हुये तने की फिर से उत्पत्ति हो सके।  अंतिम कटाई के दौरान संपूर्ण पौधे को उखाड़ा जाता है।

फसल काटने के बाद और मूल्य परिवर्धन

सुखाना :

इसे पतली परत बनाकर छायादार स्थान में 8-10 दिनों के लिए सुखाया जाता है।

इसे अच्छे हवा एवं छायादार स्थान मे ही सुखाना चाहिए।

आसवन :

तुलसी तेल को आंशिक रूप से सूखी जड़ी-बूटी के भाप आसवन के द्वारा प्राप्त किया जाता है।

आसवन सीधे अग्नि प्रज्जवलन भट्टी द्वारा किया जाता है जो भाप जनेरटर द्वारा संचालित होता है।

पैकिंग :

वायुरोधी थैले इसके लिए आदर्श होते हैं।

नमी के प्रवेश को रोकने के लिए पालीथीन या नायलाँन थैलो में पैक किया जाना चाहिए।

भडांरण :

पत्तियों को शुष्क स्थानों में संग्रहित किया जाना चाहिए।

गोदाम भंडारण के लिए आदर्श होते हैं।

शीत भंडारण अच्छे नहीं होते हैं।

परिवहन :

सामान्यत: किसान अपने उत्पाद को बैलगाड़ी या टैक्टर से बाजार तक पहुँचता हैं। दूरी अधिक होने पर उत्पाद को ट्रक या लाँरियो के द्बारा बाजार तक पहुँचाया जाता हैं। परिवहन के दौरान चढ़ाते एवं उतारते समय पैकिंग अच्छी होने से फसल खराब नहीं होती हैं।

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