रबी फसलों के प्रमुख खरपतवार एवं उनका प्रबंधन

कृषि में खरपतवार आज की समस्या नहीं अपितु मनुष्य ने जब से कृषि कार्य प्रारम्भ किया तभी से यह उसके साथ है| प्रारम्भ में मनुष्य ने अपने चारों ओर उगे कुछ उपयोगी पौधों को चुना और उन्हें अपनी खाद्य समस्या हल करने के लिए उगाना शुरु किया| अनुभव के परिणाम स्वरुप उसने देखा कि बोई गई फसल के अतिरिक्त कुछ बिना बोये गये अनचाहे पौधे उग आते हैं जो फसल की वृध्दि रोक अधिकतम पैदावार लेने में बाधक होते हैं | इन्हीं अवांछित पौधों को जो बिना बोये ही फसलों के साथ उग आते हैं खरपतवार कहा जाता है| देश की तेज गति से बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए खाद्यान्न पूर्ति की समस्या का समाधान तभी सम्भव है जब जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न चुनौती को ध्यान में रखते हुए प्राप्त इकाई से अधिक से अधिक उत्पादन लिया जाए तथा उर्वरक, पानी आदी साधनों को समुचित ढंग से अपनाने के साथ – साथ फसल को खरपतवार, कीट, रोग आदि से भी बचाया जाए| यदी किसान को अपनी फसल से भरपूर उपज प्राप्त करनी है तो अपनी फसल के प्रमुख शत्रु, खरपतवारों पर नियंत्रण कर उनको समय से नष्ट करना होगा| खरपतवारों की उपस्थिति फसल की उपज को लगभग 37% तक कम करती है|

खरपतवारों से हानियां :- आमतौर पर विभिन्न फसलों की पैदावार में खरपतवारों द्वारा 5 से 85% तक की कमी प्रकोप एवं परिस्थितियों के आधार पर आंकी गयी हैं| कभी–कभी तो यह शत-प्रतिशत तक हो जाती है| खरपतवार फसलों के लिए भूमि में निहित पोषक तत्व एवं नमी का एक बड़ा हिस्सा शोषित कर लेते हैं तथा साथ ही साथ फसल को आवश्यक प्रकाश एवं स्थान से भी वंचित रखते हैं| फलस्वरुप पौधे की विकास गति धीमी व गुणवत्ता भी प्रभावित होती है| यह भी देखा गया है कि जहां खरपतवारों का प्रकोप ज्यादा होता है वहां कीटों एवं बीमारियों का आक्रमण भी बढ़ जाता है| खरपतवारों द्वारा पोषक तत्वों का पलायन एवं पैदावार में कमी एवं हानि का विवरण क्रमशः (सारणी 1-2) में दिया गया है|

खरपतवारों की रोकथाम :- प्राय: देखा गया है कि किसान फसल में कीड़े-मकोड़ों एवं रोग-बीमारियों की रोगथाम की ओर तुरन्त ध्यान देते हैं लेकिन खरपतवारों के प्रति उदासानी रहते हैं| यहां पर महत्वपूर्ण ध्यान देने योग्य बात यह है कि फसल को हमेशा न तो खरपतवार मुक्त रखा जा सकता है और न ही ऐसा करना आर्थिक द्रष्टि से लाभकारी है| अत: क्रान्तिक (नाजुक) अवस्था (सारणी-3) में विशेषकर खरपतवार नियंत्रण के तरीकों को अपनाकर पैदावार में कमी को रोका जा सकता है| साथ ही किसान इस बात का ध्यान विशेष रुप से रखें कि उखाड़े गए खरपतवार मेंढों पर न छोड़ें उन्हें एक जगह गङ्ढे में इकट्ठा करें अन्यथा उनके बीज गिरकर पुन: वर्षा आदि से खेतों में पहुंचकर हानि पहुचाते हैं|

 

रबी फसलों के प्रमुख खरपतवार:- किसी स्थान पर खरपतवारों की उपस्थिति वहां की जलवायु, भूमि, संरचना, भूमि में नमी की मात्रा, खेतों में बोई गई पिछली फसल आदि पर निर्भर करती है| इसलिए एक ही फसल में अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग प्रकार के खरपतवार पाये जाते हैं| विभिन्न रबी फसलों में उगने वाले प्रमुख खरपतवारों का विवरण सारणी-4 में दिया गया है|

रबी फसलों में खरपतवारों की रोकथाम:- खरपतवारों की रोकथाम में ध्यान देने योग्य बात यह है कि खरपतवारों का नियंत्रण सही समय पर करें| खरपतवारों की रोकथाम निम्नलिखित तरीकों से की जा सकती है|

निवारण विधि:- इस विधि में वे सभी क्रियाएं शामिल हैं जिनके द्वारा खेतों में खरपतवारों के प्रवेश को रोका जा सकता है| जैसे-प्रमाणित बीजों का प्रयोग, अच्छी सड़ी गोबर एवं कम्पोस्ट खाद का प्रयोग, सिंचाई की नालियों की सफाई, खेत की तैयारी एवं बुवाई में प्रयोग किये जाने वाले यंत्रों की प्रयोग से पूर्व अच्छी तरह से सफाई इत्यादि|

सस्य विधि:- गर्मी में खेत की गहरी जुताई, स्टेल सीड बेड विधि, जीरो टिल सीड ट्रिल अथवा हैप्पी सीडर का प्रयोग, फसल चक्र विधि, अनर्तवर्ती फसल विधि इत्यादि का प्रयोग भी खरपतवारों को नियंत्रित करता है|

यांत्रिक विधि:- खरपतवारों पर काबू पाने की यह एक सरल एवं प्रभावी विधि है| फसल की प्रारंभिक अवस्था में बुवाई के 15-45 दिन के मध्य फसलों को खरपतवारों से मुक्त रखना जरुरी है| सामान्यत: दो निराई-गुड़ाई, पहली 20-25 व दूसरी 45 दिन बाद करने से खरपतवारों का नियंत्रण प्रभावी ढंग से होता है| इसके लिए परम्परागत कृषि यंत्रों के अतिरिक्त उन्नत नीदानाशक यंत्रों जैसे खींचकर अथवा ढकेलकर चलाये जानेवाले सस्ते हल्के एवं प्रभावी वीडरों का प्रयोग किया जा सकता है| इन यंत्रों का प्रयोग कतार में बोई गई फसलों में ही सम्भव है|

रासायनिक विधि:

शाकनाशी रसायनों का प्रयोग:- वर्तमान समय में मजदूरों की कमी की समस्या को देखते हुए खरपतवारों का नियंत्रण शाकनाशी रसायनों द्वारा करने से जहां एक ओर खरपतवारों का उचित समय पर नियंत्रण हो जाता है वहीं दूसरी ओर लागत एवं समय की भी बचत होती है लेकिन शाकनाशी नाशकों का उपयोग करते समय यह ध्यान रखना होगा कि उसकी उचित सांद्रता को उचित विधि द्वारा उपयुक्त समय पर प्रयोग करें ताकि इनसे समुचित लाभ प्राप्त हो सके अन्यथा लाभ के बजाय हानि भी हो सकती है| फसलों में उपयोग किये जाने वाले रसायनों का प्रयोग मुख्यत: तीन तरीकों से किया जा सकता है |

(अ) बोने से पहले भूमि में मिलाकर:- इस प्रकार के शाकनाशी को फसल की बुवाई के पहले खेत में अंतिम तैयारी करते समय मिला देना चाहिए तथा यह ध्यान रखना चाहिए कि खेत में पर्याप्त नमी उपलब्ध हो, जैसे–फ्लूक्लोशलिन|

(ब) अंकुरण के पूर्व छिड़काव:- इस तरह के शाकनाशी बुवाई के बाद किन्तु फसल व खरपतवार के अंकुरण के पहले खेत में छिड़क दिये जाते हैं‌| जहां तक हो सके इनका प्रयोग फसल बोने के 3 दिन के भीतर कर देना चाहिए, जैसे–पेन्डीमेथालिन|

(स) अंकुरण के बाद छिड़काव:- इस प्रकार के शाकनाशी रसायनों का प्रयोग बुवाई के 30-35 दिन बाद किया जाता है| जैसे – 2,4-डी , क्लोडिनाफॉप, फेनाक्साप्रांप, सल्फोसल्फ्यूरॉन इत्यादि जिससे खरपतवार अंकुरण अवस्था में ही समाप्त हो जाते हैं अथवा बाद में नीदा रसायन के प्रभाव से पूर्णतया नष्ट हो जाते हैं| खरपतवारनाशी रसायनों का विस्तृत विवरण (सारणी-5) में दिया गया है|

खरपतवारनाशी रसायनों के प्रयोग में सावधानियां:-

रसायन की जिस फसल के लिए अनुशंसा की गई है उसी में प्रयोग करें| शाकनाशी रसायनों की उचित मात्रा को उचित समय पर छिड़काव करें| छिड़काव के समय खेत में पर्याप्त नमी होना आवश्यक है| पानी की उचित मात्रा का प्रयोग करना चाहिए| छिड़काव यंत्र को छिड़कने से पहले अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिए| छिड़काव के लिये हमेशा फ्लैट फैन नोजल का ही प्रयोग करें| शाकनाशी एवं पानी के घोल को छानकर छिड़काव करना चाहिये| छिड़काव करते समय विशेष पोषक दस्ताने तथा चश्मे आदि का प्रयोग करना चाहिये ताकि रसायन शरीर पर न पड़े| छिड़काव के समय मौसम साफ होना चाहिये तथा हवा की गति तेज नहीं होनी चाहिये| रसायन के खाली डिब्बों को नष्ट करके जमीन में दबा देना चाहिये| शाकनाशी रसायन को खाने की चीजों से दूर रखना चाहिये| शाकनाशी के छिड़काव के बाद शरीर को अच्छी तरह से धो लेना चाहिये| छिड़काव करते समय खाने की वस्तुओं का प्रयोग नहीं करना चाहिये|

रजनीश सिंह, डॉ. घनश्याम सिंह, तेज प्रताप, डॉ. चन्दन कुमार सिंह एवं अनुपम आदर्श
सस्य विज्ञान विभाग, नरेंद्र देव विश्वविद्यालय कृषि एवं प्रौद्योगिकी, कुमरगंज, फैजाबाद,उत्तर प्रदेश
सस्य विज्ञान विभाग, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, भागलपुर (बिहार)
पादप रोग विज्ञान विभाग, शोध सहायक, वनस्पति संगरोध केंद्र, अमृतसर, पंजाब
उद्यान विभाग, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, भागलपुर (बिहार)

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