कदन्न: पोषण सुरक्षा का स्रोत

मानव में पोषण का महत्व:

भोजन विज्ञान एवं इसका स्वास्थ्य के साथ संबंध ही पोषण कहलाता है। भोजन स्वास्थ्य तथा बीमारियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दुनिया भर में जीवन शैली सम्बंधित विकारों में वर्तमान वृद्धि को देखते हुए सभी आयु वर्गों में स्वस्थ पोषण को बढ़ावा देना अति आवश्यक है। व्यक्तिगत रूप से ही नहीं बल्कि पूरी आबादी के लिए खाने की आदत में सुधार होना चाहिए। पोषण दोधारी तलवार है क्योंकि पोषण में अधिकता तथा कमी  दोनों ही स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। शिशुओं में पोषण कि कमी  विशेष रूप से हानिकारक है जबकि वयस्कों में पोषण की अधिकता, किन्तु बाद के वर्षों में दोनों रूप सभी आयु वर्गों को प्रभावित करते हैं। पोषण कि कमी संबंधी बीमारियों के तहत कुछ महत्वपूर्ण उदहारण हैं, जैसे कि एनीमिया आहार में लोहा तत्व के अपर्याप्त सेवन के कारण होता है, ऑस्टियोपोरोसिस (हड्डियों की कमज़ोरी) आहार में कैल्शियम के अपर्याप्त सेवन के कारण होता है तथा आहार में विटामिनों के अपर्याप्त सेवन के कारण कई शारीरिक विकार उत्पन्न होते हैं। दूसरी ओर अधिक खाने तथा शारीरिक गतिविधि में कमी  मोटापे और मोटापे से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनती है।

मानव स्वास्थ्य पर कुपोषण का प्रभाव:

कई विकासशील देशों को कुपोषण के दोहरे बोझ का सामना करना पड़ रहा है, एक तरफ छिपी भूख के साथ एवं दूसरी तरफ मोटापे के साथ। वैश्विक स्तर पर लगभग 190 करोड़ वयस्क अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त हैं, जबकि 46 करोड़ 20 लाख कम वजन से ग्रस्त हैं। पांच साल से कम आयु के लगभग 5 करोड़ 20 लाख बच्चे कुपोषित हैं, 1 करोड़ 70 लाख गंभीर रूप से कुपोषित हैं और 15 करोड़ 50 लाख अल्प विकसित बच्चे हैं, जबकि 4 करोड़ 10 लाख अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त हैं। पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में 45% वैश्विक मौतें पोषण के तहत जुड़ी हुई हैं (डब्ल्यू.एच.ओ., 2018)। भारत में बड़े पैमाने पर गर्भवती महिलाओं में एनीमिया तथा बच्चों में शारीरिक विकास में कमी पाई जाती है। भारत में पोषण की अत्यधिक कमी के कारण पांच वर्ष से कम आयु के 20 प्रतिशत बच्चे कुपोषण से संबंधित विकार से ग्रस्त हैं। पांच साल से कम उम्र के भारतीय बच्चों में से कम से कम 43 प्रतिशत कम वजन वाले हैं एवं 48 प्रतिशत (यानी 6 करोड़ 10 लाख बच्चे) लगातार पोषण की कमी  के चलते अल्पविकसित हैं । विश्व के प्रति 10 अल्पविकसित बच्चों में से 3 भारतीय बच्चे होते हैं। भारत में प्रति वर्ष कम वजन वाले बच्चों के जन्म लेने की संख्या सबसे ज्यादा है जोकि 74 लाख है। 6 से 59 महीने की आयु में लगभग 70 प्रतिशत बच्चे एनीमिक पाए जाते हैं। जो माताएं एनीमिक होती हैं उनके बच्चों के एनीमिक होने कि संभावना 7 गुना अधिक होती है उन माताओं की तुलना में जोकि एनीमिक नहीं होती हैं (यू.एन.आई.सी.ई.एफ., 2018)। अधिक भोजन एवं शारीरिक गतिविधि की कमी मोटापे का मुख्य कारण है जो मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है। मोटापे से बीएमआई में वृद्धि होने के साथ-साथ गैर-संक्रमणीय बीमारियों का खतरा भी बढ़ता है जो कई बिमारियों के लिए कारण बनता है जैसे कि कार्डियोवैस्कुलर (ह्रदय सम्बन्धी रोग), मधुमेह, मस्कुलोस्केलेटल विकार (विशेष रूप से ऑस्टियोआर्थराइटिस - जोड़ों की अत्यधिक अक्षम अपक्षयी बीमारी) तथा कुछ कैंसर (जिनमें एंडोमेट्रियल, स्तन, डिम्बग्रंथि, प्रोस्टेट, यकृत, पित्ताशय की थैली, गुर्दे एवं कोलोन कैंसर प्रमुख हैं)। जीर्ण तथा गैर-संक्रमणीय बीमारियों में बढ़ोतरी हो रही है उदहारण के लिए टाइप-2 मधुमेह तथा ग्लूकोज की सहनशीलता में कमी  खतरनाक दर से बढ़ रही है एवं ग्रामीण (2.4%) तथा शहरी (11.6%) दोनों आबादी पर असर डाल रही है (डब्ल्यू.एच.ओ., 2018)। बढ़ते अनुसंधान एवं रोग्व्यापिकिय संबंधी साक्ष्य इन स्वास्थ्य समस्याओं के लिए आहार में विविधता की कमी को मुख्य कारण मानते हैं। अधिकांश स्वास्थ्य जोखिम आहार में जरुरी पोषक तत्वों की कमी  के कारण होता है। इसलिए, हाल के दिनों में हर कोई अपने आहार के बारे में जागरूक हुआ है तथा इस तरह दुनिया भर में खाद्य उत्पादों के विकास द्वारा स्वास्थ्य के लिए जरुरी पोषक तत्वों की कमी  की पहेली को सुलझाने का प्रयास तेज़ी से बढ़ रहा है। पोषण लोगों के आहार का मूल है, इसलिए अधिक भोजन के बजाय पौष्टिक भोजन करने की आवश्यकता है।

पौष्टिकधान्य (न्युट्रासिरियल्स) के रूप में कदन्न तथा इसका मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव:

कदन्न को दो श्रेणियों के तहत वर्गीकृत किया जाता है, यानी प्रमुख कदन्न तथा लघु कदन्न। प्रमुख कदन्नों में, ज्वार तथा बाजरा काफी लोकप्रिय हैं, वहीँ लघु कदन्नों में, रागी, कोदों, सांवा, कुटकी, चेना या बरी तथा ककुम बहुत लोकप्रिय नहीं हैं।

प्रोटीन, ऊर्जा, खनिज तत्व, न्युट्रास्युटिकल्स, फाइटोकेमिकल्स, आहार में पाए जाने वाला रेशा तथा विटामिनों के संबंध में कदन्न अनाज पौष्टिक रूप से तुलनीय एवं प्रमुख अनाज से भी बेहतर होते हैं इसलिए उन्हें पौष्टिकधान्य (न्युट्रासिरियल्स) भी कहा जाता है। इन फसलों में आहार विविधता, खाद्य सुरक्षा तथा पोषण सुरक्षा को बढ़ाने की काफी क्षमता है।

कदन्न में मेथियोनीन (एक आवश्यक अमीनो एसिड जो प्रोटीन की गुणवत्ता में सुधार करता है) भरपूर मात्र में उपलब्ध होता है तथा गेहूं या चावल की तुलना में 8-10 गुना अधिक कैल्शियम मौजूद होता है। कदन्न कार्बोहाइड्रेट में धीमी पाचन क्षमता की अनूठी गुणवत्ता होती है जो मधुमेह रोगियों के लिए अनुकूल है। उत्कृष्ट माल्टिंग गुणों के कारण कदन्न खाद्य प्रसंस्करण तथा मूल्यवर्धन के विस्तार में काफी उपयोगी होता है। कदन्न फसलों को पर्यावरण की विस्तृत एवं विविध परस्थितियों में उगाया जा सकता है जैसेकि भारत में दक्षिणी कर्नाटक राज्य, नेपाल में हिमालय की तलहटी और पूर्वी व दक्षिणी अफ्रीका के मध्य-ऊंचे क्षेत्र, आदि, (आई.सी.आर.आई.एस.ए.टी.2012)।

प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट एवं ऊर्जा मूल्यों के मामले में कदन्न की पोषण क्षमता गेहूं और चावल जैसे लोकप्रिय अनाज के बराबर होती है। कदन्न में लगभग 7.7-12.5% ​​प्रोटीन, 1.5-5.2% वसा, 55-72.6% कार्बोहाइड्रेट, 2-7% आहार में पाए जाने वाला रेशा तथा 2.5-3.5% खनिज तत्व पाए जाते हैं (सालेह एवं सहयोगी, 2013)। रागी कदन्न में 350 मिलीग्राम/100 ग्राम कैल्शियम होता है जो सभी कदन्नों में सबसे ज्यादा होता है तथा चावल व गेहूं से लगभग 10 गुना अधिक होता है। कैल्शियम एक महत्वपूर्ण खनिज तत्व है जिसका उपयोग मानव शरीर में मजबूत हड्डियों और दांतों का निर्माण करने के लिए होता है। ह्रदय तथा अन्य मांसपेशियों के सुचारू रूप से काम करने के लिए भी कैल्शियम की आवश्यकता होती है। कैल्शियम की कमी के कारण ओस्टियोपोरोसिस, ऑस्टियोपेनिया और हाइपोक्लेसेमिया जैसे विकारों के विकास का जोखिम बढ़ जाता है। जिन बच्चों को पर्याप्त कैल्शियम नहीं मिलता है वे वयस्कों के रूप में अपनी पूर्ण संभावित ऊंचाई तक विकसित नहीं हो पाते हैं। मानव आहार में रागी कदन्न को शामिल करके कैल्शियम की कमी की समस्या को कम किया जा सकता है। सभी कदन्नों में से बाजरा में 11 मिलीग्राम/100 ग्राम लौह तत्व पाया जाता है जो कि चावल की तुलना में सात गुना अधिक तथा गेहूं की तुलना  में तीन गुना अधिक होता है।

लौह तत्व की शरीर में कमी से एनीमिया होता है जो लाल रक्त कोशिकाओं (आरबीसी) में हीमोग्लोबिन के स्तर को कम करता है। हेमोग्लोबिन आरबीसी में पाए जाने वाला प्रोटीन है जो ऊतकों तक ऑक्सीजन ले जाने के लिए ज़िम्मेदार है। लौह तत्व की कमी से होने वाला एनीमिया सबसे आम प्रकार का एनीमिया है, और ऐसा तब होता है जब शरीर में खनिज लोहा पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुँचता है। मानव शरीर को हीमोग्लोबिन बनाने के लिए लोहे की आवश्यकता होती है। जब रक्त प्रवाह में पर्याप्त लोहा नहीं होता है, तो शेष मानव शरीर को ऑक्सीजन की मात्रा नहीं मिल पाती है। शिशुओं एवं गर्भवती महिलाओं में एनीमिया का प्रसार अधिक पाया जाता है। नियमित आहार में बाजरा को शामिल करने से मानव शरीर में लौह तत्व की कमी की स्थिति को सुधारा जा सकता है। कदन्नों में विभिन्न प्रकार के जैव सक्रिय यौगिक भी पाए जाते हैं जैसे फाइटेट्स, पॉलीफिनॉल्स, टैनिन, ट्रीप्सिन अवरोधक कारक। ये जैव सक्रिय यौगिक विभिन्न धातुओं के साथ यौगिक बनाकर उन्हें निष्क्रिय करते हैं तथा उत्प्रेरक अवरोध गतिविधियों के लिए जिम्मेदार होते हैं जिस कारण इन्हें "विरोधी पोषक तत्व" के रूप में जाना जाता है किन्तु आजकल उन्हें न्यूट्रास्यूटिकल्स (औषधियुक्त पोषक तत्व) कहा जाता है। यह पाया गया है कि ये विरोधी पोषक तत्व विभिन्न प्रकार के कैंसर जैसे बड़ी आंत का कैंसर, स्तन कैंसर, आहार नलिका का कैंसर इत्यादि के जोखिम को कम करते हैं। कदन्न के दाने में बीज का छिलका

एक मुख्य खाद्य घटक है और यह फाइटोकेमिकल्स (पादप रसायनों) का समृद्ध स्रोत है, जैसे आहार में पाए जाने वाला रेशा तथा पॉलीफिनॉल्स। अब यह पाया गया है कि फाइटेट्स, पॉलीफिनॉल्स तथा टैनिन कदन्न आधारित खाद्य पदार्थों की एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि में भरपूर योगदान देते हैं तथा मानव स्वास्थ्य में सुधार, उम्र बढ़ने में देरी एवं चयापचय विकारों में रोकथाम के लिए एक महत्वपूर्ण कारक हैं (देवी एवं सहयोगी, 2014)। कदन्नों में विटामिन बी समुह प्रचुर मात्र में पाया जाता है, विशेष रूप से विटामिन बी 1 (थियामिन), विटामिन बी 2 (रिबोफ्लेविन) तथा विटामिन बी 3 (नियासिन)। विटामिन बी 1 की कमी परिधीय तंत्रिका क्षति (बेरीबेरी) या केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में घावों (वर्निकि-कोर्साकॉफ सिंड्रोम) का कारण बनती है। विटामिन बी 2 की कमी से मुंह, होंठ और जीभ के कोनों में घाव तथा सेबोरिक डर्मेटाइटिस (रुसी) कि समस्या होती है। विटामिन बी 3 की कमी से पेलाग्रा (प्रकाश संवेदनशील त्वचा रोग) तथा अवसादग्रस्त मनोवैज्ञानिक विकार उत्तपन्न होता है। नियमित आहार में कदन्न को शामिल करने से  विटामिन बी 1, बी 2 एवं बी 3 की कमी के कारण होने वाली बिमारियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। कदन्न में प्रतिरोधी स्टार्च तथा घुलनशील व अघुलनशील आहारीय रेशा भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है (सालेह एवं सहयोगी 2013)।

प्रतिरोधी स्टार्च मुख्य रूप से भोजन के पश्चात् होने वाले ग्लाइसेमिक एवं इंसुलिनमिक प्रतिक्रियाओं को कम करता है, प्लाज्मा कोलेस्ट्रॉल एवं ट्राइग्लिसराइड सांद्रता में कमी लाता है, पूरे शरीर में इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार करता है, संतृप्ति में वृद्धि करता है तथा वसा भंडारण को कम करता है। प्रतिरोधी स्टार्च वसा असुंतलन एवं इंसुलिन प्रतिरोध से जुड़े रोगों की रोकथाम के साथ-साथ, वजन, मधुमेह टाइप 2 और कोरोनरी हृदय रोग के उपचार के लिए अति महत्वपूर्ण है तथा ये गुण प्रतिरोधी स्टार्च को वजन घटाने के आहार एवं आहार संबंधी उपचार के विकास के लिए एक आकर्षक आहार लक्ष्य बनाते हैं। आहारीय रेशा जो मानव की छोटी आंत में अपचनीय है वहीँ दूसरी तरफ बड़ी आंत में पूरी तरह से या आंशिक रूप से किण्वित होता है तथा दो रूपों में उपलब्ध होता है पहला पानी में घुलनशील एवं पानी में अघुलनशील कार्बनिक यौगिक। आहारीय रेशे को कई अलग-अलग भिन्नताओं में विभाजित किया जा सकता है। इन भिन्नताओं में एरेबीनोजाईलान, इन्यूलिन, पेक्टिन, ब्रान, सेलूलोज़, बीटा-ग्लुकान तथा प्रतिरोधी स्टार्च शामिल हैं। आहारीय रेशे के घटक बड़ी आंत के कार्यों को व्यवस्थित करते हैं तथा ग्लूकोज, लिपिड चयापचय एवं खनिज जैव उपलब्धता पर महत्वपूर्ण शारीरिक प्रभाव डालते हैं। आहारीय रेशा कुछ जठरंत्रिय रोगों, कब्ज, बवासीर, बड़ी आंत का कैंसर, एसिड भाटा रोग, ग्रहणी अल्सर, विपुटीशोथ, मोटापा, मधुमेह, आघात, उच्च रक्तचाप तथा हृदय रोगों के खिलाफ सुरक्षात्मक प्रभाव के रूप में जाने जाते हैं।

कदन्न आधारित खाद्य उद्योग:

कदन्न के बाजार को उत्पाद के आधार पर जैसे कि लपसी या हलुआ या दलिया, भाप से पके हुए उत्पाद, रोटी, पेय पदार्थ आदि के आधार पर विभाजित किया जा सकता है। लपसी या हलुआ या दलिया तथा भाप से पके हुए उत्पाद कदन्न से प्रमुख पारंपरिक रूप से पके हुए उत्पादों में से कुछ हैं। ये मुख्य रूप से भारत और अफ्रीका के विभिन्न हिस्सों में खाए जाते हैं। लपसी या हलुआ या दलिया कदन्न से आमतौर पर तैयार भोजन है। वो देश जहां ज्वार तथा अन्य कदन्नों की खेती की जाती है, वहां आम तौर पर कठोर/मोटी लपसी या हलुआ या दलिया का उपभोग किया जाता है। भारत में, कुदमु बनाने के लिए किण्वित कदन्न के आंटे को भाप से पकाया जाता है। ज्वार बैटर को गीला पिसाई करने के पश्चात् काले चने के बैटर के साथ मिलाया जाता है तथा रात भर किण्वित करके मोल्डों में स्थानांतरित किया जाता है एवं इडली बनाने के लिए पकाया भाप से पकाया जाता है। भारत में अन्य पारंपरिक रूप से तैयार किये जाने वाले किण्वित रोटी में मुख्य रूप से डोसा, मसा, इंजेरा, किसरा तथा गैलेट शामिल हैं। सदियों से विभिन्न गैर-मादक तथा मादक किण्वित पेय पदार्थ बनाने के लिए अफ्रीका में माल्ट किए गए कदन्नों का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।

इन दिनों पकाने के लिए तैयार (आर.टी.सी.) कदन्न आधारित खाद्य उत्पाद खाद्य बाजार में उपलब्ध हैं जैसे कि रागी माल्ट, कार्बनिक शिशु भोजन, कदन्न पुलाव, कदन्न डोसा मिश्रण, सांवा व ककुम डोसा और इडली, चेना उपमा, रागी सिवइं, कदन्न हलुआ या दलिया, ज्वार नूडल्स, कोदों व कुटकी खीर, इत्यादि। खाने के लिए तैयार (आर.टी.ई.) कदन्न आधारित खाद्य उत्पाद भी बाजार में उपलब्ध हैं, जैसे कि न्यूट्रिमिक्स चॉकलेट, बहु कदन्न कुकीज़, केक, खिचड़ी, फ्लेक्स, मुसली, मफिन, रोटी, चिकी, कुरकुरा, लस्सी, आइसक्रीम, रागी बॉल्स, इत्यादि।

भौगोलिक आधार पर, वैश्विक कदन्न बाजार को उत्तरी अमेरिका, यूरोप, एशिया प्रशांत, लैटिन अमेरिका, मध्य पूर्व और अफ्रीका में विभाजित किया जा सकता है। अफ्रीका, भारत और चीन में सभी प्रकार के कदन्नों की आम तौर पर खेती की जाती है। एशिया में, भारत प्रमुख तथा लघु कदन्नों का मुख्य उत्पादक है, जो मुख्य रूप से देश के उत्तर-पश्चिमी एवं दक्षिणी-पूर्व भागों में उगाया जाता है। एशिया में, नेपाल तथा भूटान भी प्रमुख कदन्न उत्पादक देश हैं।

निष्कर्ष:

भारतीय लोगों में खतरनाक दर से कुपोषण संबंधी बीमारियां, जीवन शैली विकार तथा जीर्ण बीमारियां बढ़ रही हैं। आहार इस तरह के विकारों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है तथा कदन्न आधारित खाद्य उत्पादों को आहार में शामिल करके, महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की जैव उपलब्धता को बढ़ाया जा सकता है जिससे रक्तचाप में कमी, हृदय रोग के खतरे में कमी, कैंसर की रोकथाम, मधुमेह में कमी, ट्यूमर में कमी होती है तथा मानव स्वास्थ्य में गिरावट को रोकने में सहायता मिलती है। इसके अतिरिक्त कदन्न आधारित भोजन खनिज एवं विटामिन की कमी से भी लड़ता है, इसलिए छिपी भूख को भी कम करता है। हाल के दशक में आहार और स्वास्थ्य में कदन्नों के पौष्टिक महत्व के कारण, कई कदन्न आधारित खाद्य उद्योगों ने आर.टी.सी. तथा आर.टी.ई. कदन्न उत्पादों का विकास एवं विपणन प्रारंभ किया है। कदन्न को पौष्टिक धान्य (न्युट्रासिरियल्स) के रूप में भी माना जाता है, इसलिए ये पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में सक्षम हो सकते हैं।

संदर्भ:

देवी, पी.बी., विजयभारथी, आर., सथ्यबामा, एस., मल्लेशी, एन.जी. एवं प्रियदर्शिनी, वी.बी. (2014) हेल्थ बेनेफिट्स ऑफ़ फिंगर मिलेट्स (इल्लुसिन कोराकाना एल) पोलिफिनाल्स एंड डाईट्री फाइबर: ए रिभिव, जे फूड साइंस टेक्नोलॉजी, 51(6): 1021-1040.

आई.सी.आर.आई.एस.ए.टी. (2012) ग्लोबल स्ट्रेटजी फॉर द एक्स सिटू कंजर्वेशन, इंटरनेशनल क्राप्स रिसर्च इन्स्चीटियुट फार द सेमी एरिड ट्रापिक्स (आई.सी.आर.आई.एस.ए.टी.), पाटनचेरू 502 324, आंध्र प्रदेश, भारत.

सालेह, ए., झांग, क्यू., चेन, जे. एवं शेन, क्यू. (2013) मिलेट ग्रेन्स: न्युट्रीसनल क्वालिटी, प्रोसेसिंग एंड पोटेंसिअल हेल्थ बेनेफिट्स, फूड साइंस एंड फूड सेफ्टी (12):281-295.

यु.एन.आई.सी.ई.एफ. (2018) http://unicef.in/Story/Nutrition, पुनःप्राप्त 2 मई 2018 को.

डब्ल्यू.एच.ओ. (2018) ग्लोबल  न्युट्रीसन पॉलिसी रिभिव 2016-17, जिनेवा, वर्लड हेल्थ आर्गेनाइजेशन.

 

उदित एम. नकरानी, दिवाकर सिंह* एवं किरण पी. सुथार

पादप आण्विक जीवविज्ञान एवं जैव प्रौद्योगिकी विभाग,

अस्पी बागायत वनीय महाविद्यालय,

नवसारी कृषि विश्वविद्यालय, नवसारी, 396450 गुजरात

Email: diwakar@nau.in

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