कीटनाशकों से सम्बंधित भ्रांतियों के समाधान


हमारे दैनिक आहार में कीटनाशकों और उनके अवशिष्टों का उपयोग एक लगातार बढ़ रही वैश्विक चिंता है। आज अधिकांश लोग सब्जियों और फलों की गुणवत्ता पर प्रश्न उठाते हैं। उनका प्रश्न है- क्या प्रतिदिन उपयोग में आने वाली सब्जियाँ और फल स्वच्छ हैं और उनमें कीटनाशकों के अवशिष्ट नहीं हैं, क्योंकि कुछ गैर-सरकारी संगठनों का मानना हैं कि उनमें कीटनाशकों के अवशिष्ट उच्च मात्रा में होते हैं। फसल बढ़ाने और बेहतर गुणवत्ता का उत्पाद पाने के लिये खेतों में अधिकांश खाद्य पदार्थों पर कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। निहित स्वार्थ के चलते कुछ गैर-सरकारी संगठनों द्वारा कीटनाशकों के अवशिष्टों के प्रभाव पर अफवाहें फैलाई जा रही हैं, इसलिये इसके प्रति लोगों की राय अलग-अलग है। फसल का स्वास्थ्य विभिन्न कारकों से ज्ञात किया जाता है, जैसे मृदा की उर्वरता, तकनीक, सिंचाई की सुविधा, अच्छी गुणवत्ता के बीज और खरपतवार, रोगों तथा कीटों से फसलों की सुरक्षा। कृषिरसायनों के फायदों और मनुष्यों एवं फसलों पर इनके प्रभाव के बारे में अफवाहें और बेबुनियादी कहानियों पर विश्वास करने के बजाय कृषिरसायनों के बारे में विशेषज्ञों की राय जानना उचित होगा।

फिक्की एक ऐसा फोरम है, जो फसल की सुरक्षा और भारतीय किसानों की बम्पर पैदावार की वकालत करता है। इसके हालिया शोध ने कीटनाशकों के उपयोग से जुड़ी कई भ्रांतियों को दूर किया है। यह मानना गलत है कि कीटनाशकों से फसल का स्वास्थ्य बेहतर नहीं होता है और यह उत्पादनशीलता बढ़ाने का एक शॉर्टकट है। पेट्रोलियम और केमिकल्स पर स्थायी समिति की 37वीं रिपोर्ट (2002) के अनुसार भारत में खरपतवार, कीट, रोग, जीव-जन्तु, आदि के कारण अनाज उत्पादन में 28 प्रतिशत का नुकसान होता है और यह राशि प्रतिवर्ष 90000 करोड़ रूपये है और वर्तमान एमएसपी के कारण यह हानि 400000 करोड़ रूपये प्रतिवर्ष की हो सकती है।  इसलिये स्थायी समिति ने हर्बिसाइड्स और फंगीसाइड का उपयोग बढ़ाने की सलाह दी है। खेती के समय और कटाई के बाद फसलों को क्षति होने का जोखिम रहता है। हमारी कृषिभूमि पर 10,000 प्रकार के कीट और 30,000 प्रकार की खरपतवार पाई जाती है। इसके अलावा फंगी, बैक्टीरिया, वाइरस और सूक्ष्मजीव भी फसलों को नुकसान पहुँचाते हैं, क्योंकि यह प्राकृतिक पोषक तत्वों को मृदा से पौधे तक नहीं पहुँचने देते हैं और फसल की वृद्धि रूक जाती है। भारत में कई दशकों से ऐसा होता आया है, जिससे किसानों को बहुत नुकसान हुआ है और भारत की बड़ी जनसंख्या पोषक भोजन के अधिकार से वंचित हुई है। कीटनाशक फसलों के पोषक मूल्य को बचाते हैं और उत्पादन बढ़ाते हैं। जैसा कि सरकार ने बताया है, विभिन्न कीटों, रोगों और खरपतवार के कारण फसल की 10 से 30 प्रतिशत हानि होती है।



एक अन्य आम धारणा यह है कि किसान बड़ी मात्रा में कृषिरसायनों का उपयोग करते हैं, जिससे फसल की गुणवत्ता खराब होती है। हालांकि एक अध्ययन के अनुसार भारत में कीटनाशकों का उपयोग विश्व में सबसे कम होता है, जहाँ प्रति हेक्टेयर उपभोग केवल 0.6 किलोग्राम है, जो अमेरिका (5-7 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) और जापान (11-12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) की तुलना में बहुत कम है। इसके अलावा किसानों को कीटनाशकों के उपयोग और फसलों पर उनके प्रभाव के बारे में बड़े कॉर्पोरेशन द्वारा बड़े पैमाने पर प्रशिक्षित भी किया जा रहा है, ताकि उन्हें इनके लाभों की सही जानकारी हो। उन्हें खुराक की जानकारी है और कुशल किसान फसल की वृद्धि में कीटनाशकों की भूमिका को समझते हैं। हालांकि कृषि की आधुनिक विधियों को अपनाने वाले किसान भारतीय कृषि क्षेत्र को नया आयाम दे रहे हैं और देश में उनके प्रयासों की सराहना भी हो रही है। लेकिन दुर्भाग्य से उत्तर, पूर्व, उत्तर-पूर्व और मध्य भारत में पिछड़े किसान हैं, जहाँ तकनीक की पहुँच नहीं है और कृषिरसायनों का कम उपयोग होता है, जिससे भारत के अन्य भागों की तुलना में यहाँ कम फसल होती है।

देश में खेती में हो रहे परिवर्तन को देखते हुए कई लोगों को यह चिंता है कि कीटनाशकों के अवशिष्ट से कैंसर होता है, लेकिन इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। अभी तक कीटनाशक और कैंसर के मध्य कोई सम्बंध स्थापित नहीं हुआ है। रजिस्ट्रेशन और बाजार में आने से पहले सभी कृषिरसायनों का कठोर वैज्ञानिक परीक्षण होता है। विश्वसनीय संस्थानों की हालिया रिपोर्ट्स से सिद्ध हुआ है कि कीटनाशकों से कैंसर या जन्मजात विकृति नहीं होती है। कैंसर उत्पन्न करने वाले उत्पादों की डब्ल्यूएचओ की सूची में किसी कीटनाशक का नाम नहीं है, इसलिये कृषि से सम्बंधित सबसे बड़ी आधुनिक भ्रांतियों में एक यह है कि ऑर्गेनिक खेती स्थायी होती है। डब्ल्यूएचओ के कैंसर कारकों में तंबाकू, अल्कोहल और लाल मांस, आदि हैं। पूरी तरह से ऑर्गेनिक खेती करना उच्च उत्पादन के लिये सहज और लाभप्रद नहीं है। किसानों द्वारा आमतौर पर एनिमल डंक या एनिमल मैन्योर का उपयोग किया जाता है, जो कि कृषि मवेशियों की संख्या घटने के कारण दुर्लभ हो चुकी है। कृषि के लिये नोबल पुरस्कार जीतने वाले एकमात्र वैज्ञानिक डॉ. नॉर्मेन बोरलॉग ने एक बार कहा था, ‘‘आज हमारे ग्रह पर 6.6 बिलियन लोग हैं। ऑर्गेनिक खेती से केवल चार बिलियन लोगों का पेट भर सकता है। दो बिलियन लोग कहाँ जाएंगे?’’
वर्तमान में भारत पर भूमि और खाद्य संसाधनों का अत्यधिक दबाव है, क्योंकि यहाँ वर्ष 2050 तक 1.6 बिलियन लोगों का पेट भरना जरूरी है। देश के कई भागों में आज भी लोग भूख और कुपोषण से पीड़ित हैं। इसलिये इस समस्या को दूर करने और पर्याप्त पोषक भोजन की मांग पूरी करने की आवश्यकता है। प्राकृतिक भूमि-आधारित संसाधन, प्राकृतिक जल और जैव-विविधता पर भी भारी दबाव है। पोषक आहार की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए कृषि क्षेत्र को बढ़ाना या मौजूदा कृषिभूमि की उर्वरता और उत्पादनशीलता में सुधार जरूरी है। चूंकि कृषि भूमि सीमित है, इसलिये उत्पादनशीलता बढ़ाना ही एकमात्र विकल्प है। इसके लिये आधुनिक कृषि तकनीकों, मशीनों, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, उच्च उपज वाले बीजों, खाद और कीटनाशकों का सही उपयोग होना चाहिये। एक तथ्य यह है कि फसल बढ़ने से कीटों का जोखिम भी बढ़ जाता है, इसलिये कीटनाशकों का उपयोग बढ़ाना पड़ता है। इसलिये भारत को अपने किसानों से कृषिरसायनों के सुरक्षित उपयोग का आग्रह करना चाहिये।  



कृषिरसायनों और उनके उपयोग से होने वाले लाभों को देखते हुए लोग इन भ्रांतियों से बचेंगे। हालिया अध्ययन बताते हैं कि फसलों को रोगों से बचाने के लिये कीटनाशक जरूरी हैं। कृषिरसायन फसलों के लिये वैसे ही हैं, जैसे फार्मास्युटिकल मानवों के लिये है, आयुर्वेद, होम्योपैथी और यूनानी जैसे विभिन्न उपचार उपलब्ध हैं, लेकिन अधिकांश लोग एलोपैथी ही अपनाते हैं।  कृषि का हमारी जीडीपी में महत्वपूर्ण योगदान है, इसलिये सरकार और नागरिकों को देश की कृषि उत्पादनशीलता बढ़ाने के लिये मिलकर काम करना चाहिये। धानुका एग्रिटेक लिमिटेड अग्रणी कृषिरसायन कंपनियों में से एक है, जो भारतीय किसान की उन्नति के लिये प्रयास करती है। कंपनी ने कृषिरसायनों के उपयोग के सम्बंध में जागरूकता फैलाने के लिये एक अग्रणी चैनल के साथ गठबंधन किया है। इसके हालिया एपिसोड में कृषिरसायनों के उपयोग से जुड़ी भ्रांतियों और तथ्यों पर चर्चा की गई और कई भ्रांतियों को दूर किया गया। कॉर्पोरेट्स द्वारा ऐसी पहलों से कृषि उद्योग निश्चित तौर पर आगे बढ़ेगा।

इस एपिसोड में डॉ. डी. कानूनगो, रिटायर्ड एडीजी (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय) एवं चेयरपर्सन, साइंटिफिक पैनल ऑन पेस्टिसाइड एंड एंटीबायोटिक रेसिड्यूज, एफएसएसएआई ने कहा, ‘‘कीटनाशकों के अवशिष्ट दैनिक आधार पर लेने योग्य मात्रा में होते हैं, क्योंकि एमआरएल ने दैनिक सेवन की सीमा को 100 गुना अधिक बताया है।’’ सामूहिक चर्चा में डॉ. (श्रीमति) संध्या कुलश्रेष्ठ, परामर्शदाता, स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक (सीआईबी और आरसी की भूतपूर्व सचिव) ने रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पर केन्द्रित होकर कहा, ‘‘कीटनाशक टॉक्सिक होते हैं, लेकिन सरकार इनकी सुरक्षा जाँच कर रही है और मापदंडो पर खरे होने के बाद ही सरकार इनके उपयोग की अनुशंसा करती है।’’ पेस्टिसाइड रेसिड्यू पर आईसीएआर-एआईएनपी के नेटवर्क कोऑर्डिनेटर डॉ. के. के. शर्मा ने कहा, ‘‘5 वर्षों में हमने सब्जियों के 50000 नमूनों की जाँच की है और केवल 2.5 प्रतिशत नमूने एमआरएल से ऊपर पाये गये। इसी प्रकार हमने लगभग 10000 फलों की जाँच की जिनमें से 1.5 प्रतिशत एमआरएल से ऊपर थे, जो कि अन्य देशों की तुलना में बहुत कम है।’’

हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने 28 फरवरी 2016 को एक सार्वजनिक सभा में वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की बात कही थी। माननीय प्रधानमंत्री ने डॉ अशोक दलवई को किसानों की आय दोगुनी करने पर बनी कमेटी का चेयरमैन नियुक्त किया था जिन्होंने अपनी रिपोर्ट को प्रकाशित किया है। इस रिपोर्ट में उन्होंने बताया कि कीटनाशक की लागत 0.4 प्रतिशत है, जबकि ब्राजील में 10 प्रतिशत है। संक्षिप्त में कहें, तो कीटनाशक बीजों, मशीनों, आदि की तरह कृषि के लिये अनिवार्य हैं। यह हमारे भोजन को बचाते हैं और किसानों की आय बढ़ाते हैं।
 
प्रोफेसर ओ.पी. सिंह
(पीएच.डी., एफपीपीएआई)
प्रेसिडेन्ट, धानुका एग्रिटेक लिमिटेड


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