खरबूजा की लाभदायक खेती

खरबूजा एक महत्वपूर्ण कद्दूवर्गीय फसल है, खरबूजे की खेती मुख्यतः उत्तरप्रदेश, पंजाब, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडू,, तेलंगाना, आदि राज्यों में की जाती है। खरबूजे के फलों का उपयोग सलाद के रूप में तथा कच्चे फलों का उपयोग ग्रामीण क्षे़त्रों में सब्जी के रूप में भी किया जाता है। खरबूजे के फलों को मुख्यतः ताजा खाया जाता है। कुछ ग्रामीण लोग इसके कच्चे फलों से सब्जी भी बनाते है। यह अपनी मिठास एवं स्वाद के लिये अत्यन्त लोकप्रिय है। खरबूजे के बीजों की गिरी की उपयोग पकवान तथा विभिन्न प्रकार की मिठाईयों में मेवे के रूप में किया जाता है। इसके बीजों में 40-50 प्रतिशत तेल पाया जाता है। खरबूजे के फलों का सेवन मूत्र विकार संबंधी रोगों में लाभकारी होता है। त्वचा रोग एक्जिमा में इसके फलों का रस लगाना लाभकारी होता है। खरबूजे में पोशक तत्व पर्याप्त मात्रा में पाये जाते है। इसमें कैल्शियम तथा विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में होता है।

जलवायु:- खरबूजे के सफल उत्पादन हेतु गर्म एवं शुश्क जलवायु की आवश्यकता होती है। फल पकने के समय विशेश रूप से तेज धूप, गर्म हवा, (लू) फलों में मिठास के लिए आवश्यक होती है लेकिन खरबूजे की फसल को पाले से अधिक क्षति होती है।

मृदा तथा उसकी तैयारी:- खरबूजा को विभिन्न प्रकार की मृदाओं में उगाया जा सकता है, लेकिन अच्छे उत्पादन हेतु रेतीली दोमट मृदाओं को सर्वोत्तम माना जाता है। इसकी खेती के लिए मृदा पी.एच. 6-7 अच्छा माना जाता है। नदियों के किनारे कछारी भूमि में भी खरबूजे को सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। खेत को तैयार करने के लिए एक बार मिट्टी पलटन वाले हल से गहरी जुताई करने के बाद 4 से 5 बार कल्टीवेटर या हैरो चलाकर पाटा लगा देना चाहिए।

बुवाई का समय:- पर्वतीय क्षेत्रों में खरबूजे की बुवाई अपै्रल-मई माह में की जाती है, जबकि मैदानी इलाकों में बुवाई मध्य जनवरी से मध्य मार्च तक की जाती है। नदी के तटवर्ती क्षेत्रों में इसे दिसम्बर माह में भी बोया जा सकता है।

बीजदर:- बीज बोने के लिए 1.5 मीटर चैड़ी तथा सुविधाजनक लम्बाई वाली क्यारियाँ बनाई जाती हैं। दो क्यारियों के बीच 60 सेंमी. चैड़ी नाली रखी जाती है। क्यारियों में दोनों किनारों पर 90 सेंमी. की दूरी पर बीज बोये जाते हैं। प्रत्येक थाले में 3 से 4 बीज लगभग 1.5 सेंमी. गहराई पर बोना चाहिए। जब पौधों में चार पत्तियाँ आ जाती हैं तो एक पौधे को छोड़कर बाकी कमजोर पौधों को उखाड़ देते हैं।

खाद एवं उर्वरक:- खरबूजे की फसल से अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए 200-250 क्विंटल गोबर की खाद तथा 40 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फॉस्फोरस तथा 50 किलोग्राम पोटाश का उपयोग प्रति हैक्टेयर की दर से करना चाहिए।

सिंचाई एवं जल निकास:- खरबूजे के सफल उत्पादन हेतु मृदा में नमी बनाए रखने की आवश्यकता होती है। नदी तट पर बोयी गयी फसल में सिंचाई की कम आवश्यकता होती है। गर्मियों में 5-7 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण:- खेत में दो से तीन बार निराई करके खरपतवार निकाल देने चाहिए। निराई करते समय बेलों की जड़ों पर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए।

रोग एवं नियंत्रण:-

- चूर्णिल आसिता:- यह फफूँदी जनित रोग होता है। इस रोग में पौधों के तनों पर तथा पुरानी पत्तियों के निचले भाग में गोल सफेद धब्बे दिखाई देते हैं, बाद में ये धब्बे बढ़कर पत्ती की पूरी सतह पर छा जाते हैं जिससे पत्तियों की सतह पर एक सफेद सा पाउडर दिखाई देता है।

नियंत्रण:- रोग के लक्षण दिखाई देने पर घुलनशील गंधक के चूर्ण का 0.5 प्रतिशत का छिड़काव 2 से 3 बार करना चाहिए।

- मृदुरोमिल आसिता:- यह रोग भी फफूँदी जनित है। यह रोग अधिक वर्षा और नमी वाले क्षेत्रों में होता है। इस रोग में पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं, जो बाद में भूरे रंग के हो जाते हैं।

नियंत्रण:-इस रोग के नियंत्रण हेतु डाइथेन एम.-45  नामक दवा की 2 किग्रा मात्रा को 800-1000 लिटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।

कीट एवं नियंत्रण:-

- रेड पम्पकिन बीटल:- ये लाल रंग के उड़ने वाले कीट होते हैं, जो पौधों के उगते ही फसल को खाना शुरू करते हैं।

नियंत्रण:- इस कीट के नियंत्रण के लिए सेविन 10 प्रतिशत धूल का 15-20 किलोग्राम बुरकाव प्रति हैक्टेयर की दर से करना चाहिए अथवा सेविन 50 प्रतिशत घुलनशील धूल के 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए।

- फल मक्खी:- यह कीट खरबूजे के लिए अत्याधिक हानिकारक कीट है। मादा मक्खी फलों में अण्डे देती है जिसके कारण फलों में सड़न पैदा होने लगती है।

नियंत्रण:-इस कीट के नियंत्रण हेतु मैलाथियान का 0.05 प्रतिशत की दर से छिड़काव करना चाहिए।

फलों की तुड़ाई:-साधारणतः फलों के पकने पर इनके रंग में परिवर्तन होने लगता है और उनसे तेज खुशबू भी आने लगती है तथा पके हुए फल डंठल से आसानी से अलग हो जाते हैं। खरबूजों की तुड़ाई के लिए सुबह का समय उपयुक्त होता है।

उपज:- खरबूजे की उपज निम्न कारकों जैसे-जलवायु, मृदा, खाद एवं उर्वरक तथा सिंचाई आदि पर निर्भर करती है। सामान्यतया खरबूजे की औसत उपज 150-200 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक प्राप्त हो जाती है।

खरबूजे की खेती करने से आर्थिक लाभ:- जुताई, बीज, खाद, उर्वरक, मजदूर एवं सिंचाई को मिलाकर खरबूजे की खेती में कुल अनुमानित लागत लगभग 40-45 हजार रूपये प्रति हैक्टेयर आती है, तथा इससे 2.5 -3 लाख रूपये तक कुल आय प्राप्त होती है जिसमें लागत को निकालकर कुल शुद्ध आय लगभग 2.1 -2.6 लाख रूपये तक हो सकती है।

 

ब्रजकिशोर शर्मा, डा. महेश सिंह (सहायक

प्राध्यापक) एवं अंकित कुमार गोयल

स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर आई.टी.एम.

विश्वविद्यालय ग्वालियर (म.प्र)

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